गर्मियों की छुट्टियाँ \ बाल कहानी - rashtrmat.com

गर्मियों की छुट्टियाँ \ बाल कहानी

सौम्या पांडेय गर्मियों की छुट्टियों की कहानी के जरिये बता रही हैं कि बच्चों को सामाजिक  सरोकार से जोड़ने के लिए अभिभावकों को स्वयं आगे आना होगा। उन्हें अपने बच्चों को जीवन के मूल्यों से परिचित कराने के लिए अपने साथ लेकर चलना चाहिए।

   गर्मियों की छुट्टियाँ \ बाल कहानी

आज बहुत दिनों के बाद टिन्नी बड़ी खुश थी । पूरे घर में फुदक-फुदक कर सबको बता रही थी कि उसकी गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गई हैं । कभी माँ का आँचल खींचती तो कभी पिताजी के गले में बाहें डाल कर पूंछती-पिताजी.. इस बार हम छुट्टियों में कहाँ जाएंगे…?

पिताजी-अरे टिन्नी.. अभी तो छुट्टियाँ शुरु हुई हैं और तुम अभी से घूमने जाने की जिद कर रही हो ।

अब तुम छठी कक्षा में पहुंच गई हो तो थोड़ा पढ़ाई पर भी ध्यान दो बिटिया   पिताजी उसे चिढ़ाते हुए बोले तो टिन्नी रूठ गई ।

बड़ी देर तक पिता-पुत्री की नोंक-झोंक चलती रही..फिर अंत में तय हुआ कि इस बार कुछ नया करेंगें,जिससे छुट्टियाँ भी अच्छी बीतें और कुछ नया भी सीखने को मिले, पर करना क्या है.. यह पिताजी ने टिन्नी को नहीं बताया था ।

आज छुट्टियों का पहला रविवार था। पिताजी ने टिन्नी और उसकी माँ को तैयार रहने को कहा, फिर आधे घंटे बाद वो तीनों कार में बैठकर कहीं चल दिये ।

टिन्नी बड़ी उत्साहित थी। उसने पिताजी से पूंछा कि हम कहाँ जा रहे हैं तो उन्होंने कुछ नहीं बताया,करीब आधे घंटे बाद टिन्नी की कार एक बड़े से अहाते में प्रवेश कर गई। टिन्नी ने देखा वहाँ बहुत सारे बच्चे दिखाई दे रहे थे, उसने सोंचा..कि शायद यह कोई खेलने की जगह है ।

पिताजी ने गाड़ी किनारे खड़ी करी और टिन्नी व उसकी माँ कार से उतर गए । पिताजी ने देखा टिन्नी आश्चर्य से उस जगह और सारे बच्चों को देख रही थी । पिताजी ने टिन्नी का हाथ पकड़ा और अंदर चले गए ।

वो एक ऑफिस था, वहाँ एक महिला सामने बैठी थीं। टिन्नी के पिताजी ने उनका अभिवादन किया फिर कुछ बात की, पर टिन्नी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । टिन्नी को असमंजस में देखकर पिताजी उससे बोले-टिन्नी बेटी, यह एक एन. जी. ओ. है, यहाँ पर अनाथ और गरीब बच्चों की देखभाल की जाती है। इन बच्चों की पढ़ाई की अभी व्यवस्था नहीं हो पाई है, इसलिए हमलोग हर रविवार को यहाँ आकर इन बच्चों को पढ़ाएंगे और उनके साथ ढेर सारी बातें करेंगे, जिससे उनका ज्ञान भी बढ़े औऱ उनका मनोरंजन भी होजाए, बोलो क्या तुम मेरे साथ यह सब करोगी..?

टिन्नी यह सब सुनकर उदास हो गई। उसने आंसू भरी आँखों से पिताजी को देखा और बोली-पिताजी,यह आप क्या कह रहे हैं, इस तरह तो मेरी सारी छुट्टियाँ बेकार हो जाएंगी । मुझे तो घूमने जाना था ।

पिताजी बोले-टिन्नी, घूमने तो हम हर साल जाते हैं और आगे भी जाते रहेंगे, लेकिन इन बच्चों के पास तो कोई अवसर नहीं है,तो क्या हमें इनकी मदद नहीं करनी चाहिये ?

टिन्नी बोली-पर पिताजी, हम लोग ही क्यों करें, इनकी मदद तो कोई भी कर सकता है ?

पिताजी बोले-बस तुम्हारी यही सोंच मैं बदलना चाहता हूँ, सारे लोग अगर यही सोंचेंगे कि हम क्यों करें,कोई और क्यों नहीं, तो फिर इनकी या किसी की भी मदद कैसे होगी । हमें दूसरों को नहीं अपनी जिम्मेदारी को देखना चाहिए, क्या पता तुम्हें देखकर और लोग भी इनकी मदद करने लग जाएं ।

टिन्नी बोली-पिताजी,बात तो आप बिल्कुल सही कह रहे हैं,मैं कोशिश करूंगी…लेकिन अगर मुझे अच्छा नहीं लगा तो फिर मैं यहाँ नहीं आऊँगी।

पिताजी बोले- ठीक है ।

फिर उन्होंने कार में से टिन्नी की पुरानी किताबें निकालीं, और बच्चों से मिलने चले गए । सब बच्चे टिन्नी और उसके माता-पिता से बहुत अच्छे से मिले, जब टिन्नी के पिताजी ने उन्हें किताबें दीं तो वे खुशी से चहक उठे ।

थोड़ी ही देर में टिन्नी भी उन बच्चों के साथ घुल मिल गई। वो बच्चों को किताबों से पढ़कर कहानियाँ सुनाने लगी… सबको बहुत अच्छा लगा। शाम को टिन्नी अपने माता-पिता के साथ घर वापस लौट आई।

पिताजी ने टिन्नी से कुछ नहीं पूंछा कि उसे वहाँ कैसा लगा । रात के खाने के समय टिन्नी ने अपने पिताजी से कहा -पिताजी, अब से मैं हर रविवार को वहाँ जाकर उन बच्चों के साथ समय बिताऊँगी ।

पिताजी बोले -क्यों,अब तुम्हें कहीं घूमने नहीं जाना ?

टिन्नी-नहीं पिताजी, घूमने तो हम कभी भी जा सकते हैं, पर आज उन बच्चों के साथ समय बिताकर मुझे पता चला कि हमें अपने साथ-साथ दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए। अब मैं अपने दोस्तों से भीकहूँगी कि वो भी हमारे साथ वहाँ चलें, क्या पता हमारे वहाँ जाने से उन बच्चों के जीवन में सुधार आ जाए ।

फिर कुछ सोंचकर अपने पिताजी से बोली- पिताजी, क्या आप मेरे दोस्तों को भी साथ में वहाँ ले चलेंगे पिताजी बोले- हाँ, हाँ…क्यों नहीं.. फिर मुस्कुराकर बोले  इसके साथ ही मैं तुम्हें छुट्टियों केआखिरी सप्ताह में;नैनीताल; भी घुमाने ले जाऊँगा।

यह सुनकर टिन्नी उछल पड़ी और दौड़कर अपने पिताजी से लिपट गई -आप दुनियां के सबसे अच्छेपिताजी हो ।

पिताजी  ;औऱ मेरी टिन्नी, दुनियां की सबसे प्यारी बेटी है ।

घर में टिन्नी की हँसी गूंजने लगी । इस प्रकार टिन्नी की गर्मियों की छुट्टियाँ भी मजे से कट गईं औऱ उसने दूसरों की मदद करने का पाठ भी सीख लिया ।

 सौम्या पाण्डेय ,ग्रेटर नोएडा

soumya24p@gmail.com

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