दो औरतें \कहानी - rashtrmat.com

दो औरतें \कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी दो औरतें सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना दोनों को छूती है। अक्सर कहानियों में सास-बहू का रिश्ता नकारात्मक दिखाया जाता है, लेकिन यहाँ सास एक माँ की तरह सोचती है। यह बहुत मजबूत और अलग दृष्टिकोण है।औरत का जीवन किसी एक घटना पर खत्म नहीं होता, उसे दूसरी शुरुआत का अधिकार है।लेकिन रास्ता अलग है,एक में बेटियाँ सहारा बनती हैं,दूसरी में सास सहारा बनती है।

                             दो औरतें \कहानी

कच्ची दीवारों और टीन की छत वाला वह घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों के दिल छोटे नहीं थे। रामलाल और उसकी पत्नी सीता ने जिंदगी भर मजदूरी करके अपना घर चलाया था। सुबह सूरज निकलने से पहले ही रामलाल अपने औजारों की थैली लेकर निकल जाता और सीता घर के कामों में लग जाती।

उनके चार बेटे थे,मोहन,सोहन,राकेश और सबसे छोटा दीपक। चारों बेटे बड़े होते-होते अपने पिता की तरह मेहनत करना सीख गए थे। कोई निर्माण स्थल पर काम करता, कोई दुकान में हेल्पर था, तो कोई ठेकेदार के साथ मजदूरी करता। सबसे छोटा बेटा दीपक हाई स्कूल तक पढ़ा था। इसलिए उसे एक सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी मिली गयी। सीता खुश थी कि चलो उसके चार बेटों में कोई तो नौकरी करता है।

घर में आमदनी बहुत ज्यादा नहीं थी,लेकिन इतनी जरूर थी कि सबका पेट भर सके और शाम को थकी हुई मुस्कान के साथ सब एक साथ बैठकर खाना खा सकें।समय के साथ बड़े बेटे मोहन की शादी हो गई। नई बहू सुनीता घर आई तो सीता को सहारा मिल गया। कुछ ही महीनों में वह घर के सारे काम सीख गई। फिर दूसरे बेटे सोहन की शादी हुई। दूसरी बहू रेखा भी अच्छी निकली। दोनों बहुएँ मिलकर घर संभालने लगीं।

सीता अक्सर पड़ोस की औरतों से कहती,“भगवान ने बहुएँ नहीं,बेटियाँ दी हैं मुझे।”

घर में रौनक थी, हल्की-फुल्की नोकझोंक भी होती,लेकिन वह घर की मिठास में ही घुल जाती।

कुछ साल बाद तीसरे बेटे राकेश की शादी तय हुई। जिस दिन नई बहू पूजा घर में आई, सबने सोचा था कि अब घर और भी खुशियों से भर जाएगा।लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा।पूजा का स्वभाव बाकी दोनों बहुओं से अलग था। उसे घर के कामों में मन नहीं लगता था। छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाना उसकी आदत थी।

घर में तीसरी बहू पूजा के आने के बाद शुरू के कुछ दिन तो सब ठीक रहा। लेकिन धीरे-धीरे उसके स्वभाव की झलक दिखने लगी।

एक सुबह रसोई में सुनीता चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी। पूजा पास में खड़ी थी। अचानक उसने कहा,“दीदी, मैं रोज इतनी सुबह नहीं उठ सकती। आप लोग उठ जाते हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं भी उठूँ।”

सुनीता ने समझाते हुए कहा,“ घर में खाने वाले कई लोग हैं। सब मिलकर काम करेंगे तभी काम जल्दी होगा।”

पूजा ने तुनक कर जवाब दिया,“तो आपने ही संभाल लिया है न इतने साल..अब भी संभाल लीजिए।”

सुनीता चुप हो गई, लेकिन बात उसके दिल में चुभ गई।

कुछ दिनों बाद आँगन में कपड़े धोते समय उसकी दूसरी जेठानी रेखा से बहस हो गई।

रेखा ने सिर्फ इतना कहा,“पूजा, अपने कपड़े अलग रख लिया करो,सबके साथ मिल जाते हैं।”

बस इतनी सी बात पर पूजा भड़क उठी,“मुझे कोई हुक्म मत दीजिए। मैं अपने हिसाब से रहूँगी।”

रेखा ने हैरानी से कहा,“अरे,मैंने तो बस कहा था।”

लेकिन पूजा की आवाज़ अब और तेज हो चुकी थी।

“मैं यहाँ किसी की नौकरानी बनकर नहीं आई हूँ।”

आँगन में खामोशी छा गई।

तीसरी बार बात तब बढ़ी जब सबसे छोटी जेठानी काजल ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की। काजल ने मुस्कुराते हुए कहा,“दीदी, अगर हम सब मिलकर काम करेंगे तो सासू माँ को भी आराम मिलेगा।”

पूजा ने तीखी नजरों से उसकी ओर देखा।

“तुम मुझे मत सिखाओ। अभी आई हो और मुझे समझाने लगी?”

काजल सकपका गई। उसने धीरे से कहा,“मैं तो बस…।”

लेकिन पूजा ने बात बीच में ही काट दी,“मुझे किसी की सलाह की जरूरत नहीं।”

अब घर का माहौल बदलने लगा था।जहाँ पहले रसोई से हँसी की आवाजें आती थीं, वहाँ अब खामोशी रहने लगी।

सीता सब समझ रही थी, लेकिन वह हर बार यही सोचकर चुप रह जाती कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।लेकिन कभी-कभी एक छोटी सी दरार भी धीरे-धीरे पूरे घर की दीवार गिरा देती है।

एक दिन रसोई में ही पूजा की रेखा से कहासुनी हो गई।“मैं किसी की नौकरानी नहीं हूँ जो दिन भर रसोई में खड़ी रहूँ,” पूजा ने ऊँची आवाज़ में कहा।

रेखा चुप रही, लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। धीरे-धीरे झगड़े बढ़ने लगे। अब घर में अक्सर ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं।

एक शाम जब रामलाल मजदूरी से लौटा तो उसने देखा कि तीनों बेटे आँगन में खड़े आपस में बहस कर रहे हैं।

मोहन बोला,“अब यह रोज-रोज का झगड़ा नहीं सहा जाता। अलग-अलग रहना ही ठीक है।”

सीता का दिल बैठ गया। उसने धीरे से कहा,“अरे, घर टूटेगा तो दिल भी टूटेंगे बेटा।”

लेकिन हालात ऐसे बन गए थे कि बंटवारे की बात सामने आ ही गई।सीता ने बहुत सोचकर कहा“अभी छोटा बेटा दीपक कुंवारा है। उसकी शादी हो जाए,फिर जो ठीक लगे करना।”

सब मान गए। बंटवारा कुछ समय के लिए टल गया।कुछ महीनों बाद दीपक की शादी हो गई। नई बहू काजल घर आई। वह शांत स्वभाव की लड़की थी। सीता को लगा कि शायद अब घर का माहौल फिर पहले जैसा हो जाएगा।शादी के कुछ दिन बाद तक सब ठीक भी रहा।लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।एक दिन सीता ने देखा कि दीपक फिर गुटखा खा रहा है।

“कितनी बार कहा है बेटा,यह जहर मत खाया कर,” सीता ने डांटते हुए कहा।

दीपक हँसकर बोला,“अरे माँ, कुछ नहीं होता इससे। सब खाते हैं।”

सीता ने उसके हाथ से गुटखे का पाउच छीनकर फेंक दिया।

“एक दिन यही आदत तुम्हें रुलाएगी।”

दीपक मुस्कुराकर बाहर चला गया।उस दिन सीता की बात किसी ने गंभीरता से नहीं ली लेकिन किस्मत शायद उसी दिन चुपचाप अपना फैसला लिख रही थी। दीपक को अक्सर खाँसी रहने लगी। पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया।उसे लगा कि ऐसे ही होगा। आम खांसी होगी।

दीपक जिस स्कूल में चपरासी था,वहाँ उसके अलावा दो और लोग भी थे। जो साफ- सफाई का काम करते थे। वो अक्सर तंबाखू और गुटखा खाया करते थे। उनकी संगत में दीपक भी गुटखा खाना सीख गया था। उसके मुँह में छाला भी हो गया था। जिससे उसे खाने पीने में भी तकलीफ होती थी। बावजूद इसके गुटखा खाना बंद नहीं किया। धीरे- धीरे उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। एक दिन वह स्कूल में ही गिर पड़ा। उस दिन उस दिन प्रिंसपल ने कहा कि किसी डॉक्टर को दिखा लो। दिन प्रतिदिन दुबले होते जा रहे हो। तुम्हारी खांसी भी बढ़ती जा रही है। मुँह में छाले हो गए हैं तो बहुत पहले ही डॉक्टर को दिखाना चाहिए। अभी देर नहीं हुई है। घर में आकर दीपक ने अपनी पत्नी काजल और माँ को बताया। सीता घबरा गयी।

दूसरे दिन उसे अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने कई जाँचें कराईं। रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा,“इसे कैंसर है..और बीमारी काफी बढ़ चुकी है।”

यह सुनते ही सीता के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“डॉक्टर साहब..कोई इलाज नहीं है क्या?” उसकी आवाज काँप रही थी।

डॉक्टर ने धीरे से कहा,“इलाज है..लेकिन बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी है। क्या ये गुटखा या तंबाखू खाया करते थे\

सीता ने डॉक्टर को बताया दीपक को गुटखा खाने की बुरी आदत थी। शायद उसी ने उसे अंदर ही अंदर खोखला कर दिया था।पास खड़ी काजल का हाथ दीपक के हाथ में था।उसने पहली बार महसूस किया कि उसका संसार धीरे-धीरे उससे दूर जा रहा है।अस्पताल की सफेद दीवारें उस दिन बहुत ठंडी लग रही थीं।

अस्पताल के लंबे गलियारों में कई दिन गुजर गए। काजल दिन-रात उसके सिरहाने बैठी रहती। सीता भगवान से प्रार्थना करती रहती,“हे प्रभु, मेरी उम्र भी मेरे बेटे को दे दे।”

लेकिन बीमारी किसी की प्रार्थना से नहीं रुकती।कुछ ही महीनों में दीपक दुनिया छोड़कर चला गया।घर में जैसे सन्नाटा उतर आया।काजल की आँखों में अब स्थायी खालीपन था। उसकी उम्र ही क्या थी,बस पच्चीस साल।

एक दिन तीनों भाई घर के आँगन में खड़े थे।

मोहन ने कहा,“अब अलग-अलग रहना ही ठीक है।”

सीता ने दुखी होकर कहा,“बेटा, घर दीवारों से नहीं,साथ रहने से बनता है। दीपक की मौत होते ही ऐसा क्यों बोल रहा है? लेकिन उस दिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।थोड़ी देर बाद आँगन में एक लकीर खींच दी गई,और उसी लकीर ने सालों से बसे घर को दो हिस्सों में बाँट दिया।

दीपक की मौत के बाद आखिरकार घर का बंटवारा हो गया।तीनों बड़े बेटे अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अलग रहने लगे।अब उस पुराने घर में सिर्फ रामलाल, सीता और उनकी जवान विधवा बहू काजल रह गए।

रामलाल बूढ़ा हो चुका था। पहले जैसी मजदूरी अब उससे नहीं होती थी। सीता भी उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच गई थी,जहाँ शरीर साथ छोड़ने लगता है।लेकिन सीता के मन में एक और चिंता घर कर गई थी,काजल की।

एक रात काजल चुपचाप बैठी थी।सीता उसके पास आकर बोली,““अगर मैं तुम्हारी दूसरी शादी कर दूँ तो?”

काजल चौंक गई।

“माँ..लोग क्या कहेंगे?”

सीता ने गहरी साँस ली।“लोग तो बहुत कुछ कहते हैं…पर मैं इतना जानती हूँ कि मेरी बेटी सारी उम्र अकेली नहीं रह सकती।”

उस रात काजल बहुत देर तक रोती रही…और सीता पहली बार उसे अपनी बहू नहीं, बेटी की तरह गले लगाकर बैठी रही। मन ही मन उसने तय किया कि किसी दिन रामलाल से इस बारे में बात करनी चाहिए।

एक रात  खाने के बाद सीता ने  रामलाल से कहा,“हम कब तक जिएँगे? हमारे बाद काजल का क्या होगा?”

रामलाल चुप रहा। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

सीता ने धीरे से कहा,“मैं चाहती हूँ कि इसकी दूसरी शादी हो जाए। अभी उम्र ही क्या है इसकी?”

रामलाल ने सिर हिलाया,“बात तो सही है..लेकिन शादी के लिए पैसे भी तो चाहिए।”

सीता देर तक जागती रही। आखिर उसने मन ही मन एक फैसला कर लिया।अगली सुबह वह पास की कॉलोनी में काम ढूँढने निकल पड़ी।उसकी चाल धीमी थी, लेकिन इरादा मजबूत।एक बड़े मकान के सामने रुककर उसने दरवाज़ा खटखटाया।अंदर से एक महिला बाहर आई।

“क्या बात है?” उसने पूछा।

सीता ने झिझकते हुए कहा,“बहन जी..कोई काम मिल जाए तो बता दीजिए। झाड़ू-पोछा, बर्तन जो भी हो।”

महिला ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“तुम्हारी उम्र तो काफी है,काम कर पाओगी?”

सीता हल्की मुस्कान के साथ बोली,“कोशिश करूँगी बहन जी..मजबूरी है।”

महिला ने पूछा,“घर में और कौन है?”

बस इतना पूछना था कि सीता की आँखें भर आईं। उसने धीरे-धीरे अपनी सारी कहानी बता दी,चार बेटे, घर का बंटवारा,छोटे बेटे की बीमारी और जवान बहू का विधवा होना।

महिला चुपचाप सुनती रही।

फिर उसने पूछा,“तुम्हें काम की इतनी जरूरत क्यों है?”

सीता ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए कहा,“मैं कुछ पैसे जोड़ना चाहती हूँ..ताकि अपनी बहू की शादी कर सकूँ।”

महिला चौंक गई,“बहू की शादी?”

सीता की आवाज़ में ममता थी।

“हाँ बहन जी,वह अभी बहुत जवान है। कब तक ऐसे ही अकेली रहेगी? लोग कहते हैं बहू पराया घर होती है..पर मैं उसे बेटी बनाकर ही तो घर लाई थी। बेटी को यूँ अकेला कैसे छोड़ दूँ?”

कॉलोनी की उस महिला की आँखें भी नम हो गईं।उसने तुरंत कहा,“तुम कल से काम पर आ जाना।”

सीता ने सिर झुका लिया। उसके चेहरे पर पहली बार हल्की सी शांति दिखाई दी।

शायद उसे लगा कि उसने सचमुच एक माँ का फर्ज निभाने की दिशा में पहला कदम उठा लिया है।और उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते,कभी-कभी इंसानियत भी उन्हें जन्म देती है।जिस आँगन में कभी चारों भाइयों की हँसी गूँजती थी,वहाँ अब सन्नाटा था।

दीपक की चारपाई खाली पड़ी थी।काजल उस चारपाई के पास बैठी देर तक उसे देखती रहती।सीता ने एक दिन धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा।

काजल फूट पड़ी,“माँ..अब मैं क्या करूँ?”

सीता के पास कोई जवाब नहीं था।उसने बस उसे अपनी गोद में खींच लिया।सुबह का समय था। कॉलोनी की सड़कों पर हल्की धूप उतर रही थी। सीता ने अपनी पुरानी साड़ी का पल्लू ठीक किया और हिचकते हुए एक बड़े से मकान के सामने रुक गई।

कुछ पल तक वह दरवाज़े को देखती रही। जैसे भीतर जाने से पहले हिम्मत जुटा रही हो।आख़िर उसने धीरे से घंटी बजा दी।दरवाज़ा खुला। सामने लगभग पचास साल की एक सुसंस्कृत महिला खड़ी थी।

“हाँ, क्या बात है?” उसने सहज स्वर में पूछा।

सीता ने झुककर कहा,“बहन जी..कोई काम मिल जाए तो बता दीजिए। झाड़ू-पोछा, बर्तन.. जो भी हो कर लूँगी।”

महिला ने आश्चर्य से उसे देखा।

“तुम्हारी उम्र तो काफी है, काम कर पाओगी?”

सीता हल्की मुस्कान के साथ बोली,“कोशिश करूँगी बहन जी… मजबूरी है।”

महिला ने उसे अंदर बरामदे में बैठने को कहा।

“कहाँ रहती हो? घर में कौन-कौन है?”

बस इतना पूछना था कि सीता की आँखें भर आईं।कुछ देर तक वह चुप रही, फिर धीमे-धीमे बोलने लगी।“चार बेटे थे मेरे..सबकी शादी कर दी..घर अच्छा चल रहा था..पर छोटे बेटे को कैंसर हो गया। गुटखा खाता था बहुत…।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“कुछ ही महीनों में चला गया,उसकी बीवी रह गई,अभी उम्र ही क्या है उसकी।”

महिला अब पूरी गंभीरता से उसकी बात सुन रही थी।

“तो तुम काम क्यों करना चाहती हो?” उसने धीरे से पूछा।

सीता ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और बोली,“मैं कुछ पैसे जोड़ना चाहती हूँ..ताकि अपनी बहू की दूसरी शादी कर सकूँ।”

महिला चौंक गई।

“बहू की शादी?”

सीता ने सिर झुका लिया, जैसे कोई अपराध स्वीकार कर रही हो।

“लोग कहेंगे पगली हो गई हूँ,लेकिन बहन जी,वह अभी जवान है। सारी उम्र कैसे काटेगी अकेले?”

कुछ पल के लिए वहाँ खामोशी छा गई।फिर सीता ने धीमे स्वर में कहा,“जब वह इस घर में आई थी,तब मैंने उसे बहू नहीं बेटी मानकर अपनाया था,अब उसका जीवन यूँ सूना कैसे देख सकती हूँ?”

यह कहते-कहते उसकी आवाज़ टूट गई।लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।

“बस बहन जी..अगर कहीं काम मिल जाए.. तो शायद कुछ पैसे जोड़ सकूँ…।”

कॉलोनी की उस महिला की आँखें भी भीग गई थीं।उसने आगे बढ़कर सीता का हाथ पकड़ लिया।

“तुम कल से काम पर आ जाना,” उसने कहा।

सीता ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता और संतोष दोनों थे।उस क्षण वह एक मजदूर औरत नहीं लग रही थी…वह सिर्फ एक माँ थी,जो अपने अधूरे फ़र्ज़ को पूरा करने के लिए जीवन की आखिरी ताकत तक लड़ने को तैयार थी।

सीता जब उस घर से बाहर निकली तो धूप थोड़ी तेज़ हो चुकी थी। उसने आसमान की ओर एक बार देखा और धीरे-धीरे कॉलोनी की सड़क पर आगे बढ़ने लगी। उसके कदम थके हुए थे,लेकिन मन में एक अजीब-सी शांति थी। शायद पहली बार उसे लगा कि वह अपने बेटे के जाने के बाद भी एक जिम्मेदारी निभाने की राह पर चल पड़ी है। लोग अक्सर कहते हैं कि बहू पराया घर होती है, लेकिन उस दिन सीता ने मन ही मन सोचा,अगर वह परायी होती,तो उसके भविष्य की चिंता मेरे दिल को इस तरह क्यों चुभती? शायद रिश्ते खून से नहीं, दर्द और जिम्मेदारी से बनते हैं। और “उस दिन एक सास नहीं, एक माँ अपनी विधवा बहू के लिए नई ज़िंदगी ढूँढने निकल पड़ी थी।”

“रिश्ते खून से बनते होंगे, पर उस दिन एक बूढ़ी औरत ने साबित कर दिया कि माँ बनने के लिए जन्म देना जरूरी नहीं होता।”

सीता जब कॉलोनी से लौटकर घर पहुँची तो शाम उतरने लगी थी। आँगन में हल्की धूप बची हुई थी।काजल वहीँ चुपचाप बैठी थी, जैसे कई दिनों से बैठती आई थी। सामने दीपक की खाली चारपाई पड़ी थी।सीता कुछ पल उसे देखती रही,फिर धीरे से उसके पास जाकर बोली,““बहू..कल से मैं काम पर जाऊँगी।”

काजल ने चौंककर उसकी ओर देखा।

“आप…? इस उम्र में?”

सीता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,““हाँ..कुछ पैसे जोड़ने हैं।”

“क्यों माँ?” काजल ने धीरे से पूछा।

सीता की आँखों में ममता भर आई।

“ताकि तुम्हारी दूसरी शादी कर सकूँ..मेरी बेटी।”

यह सुनते ही काजल की आँखों से आँसू बह निकले। वह कुछ देर तक सीता को देखती रही। फिर धीरे-धीरे उठकर उसके पास आ गई।

“माँ..आप अकेली काम करने क्यों जाएँगी?”

सीता ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।

काजल ने दृढ़ स्वर में कहा,“मैं भी आपके साथ चलूँगी। यहाँ अकेले बैठकर कब तक रोती रहूँगी?

अगर आपने मेरे जीवन को बदलने का फैसला कर ही लिया है,तो उस रास्ते पर मैं भी आपके साथ चलूँगी।”

सीता की आँखें भर आईं। उसने काजल को गले लगा लिया।उस छोटे से आँगन में उस दिन दो औरतें एक-दूसरे का सहारा बनकर खड़ी थीं,एक माँऔर एक बेटी।

और शायद उसी क्षण उनके टूटे हुए घर में नई ज़िंदगी की शुरुआत हो रही थी।

“उस दिन एक विधवा बहू और उसकी सास नहीं,बल्कि दो औरतें साथ-साथ अपनी नई जिंदगी की ओर चल पड़ी थीं।”

जब घर टूट जाते हैं, तब भी अगर दो औरतें एक-दूसरे का हाथ थाम लें तो ज़िंदगी फिर से शुरू हो सकती है।

रमेश कुमार ‘रिपु’
अवधपुरी कालोनी,सुन्दरनगर,राममंदिर के पास
भाटागांव,रायपुर,छत्तीसगढ़
मो. 7974304532