ममता गुप्ता की कविता संतोष, कर्म और मानवीय संवेदना का संदेश देती है। कवि ने जीवन के सुख-दुख को ईश्वर की व्यवस्था मानते हुए शिकायत के बजाय स्वीकार्यता का भाव रखा है। विशेष रूप से अंतिम अंतरा प्रभावशाली है, जहाँ मंदिर-मस्जिद जाने से अधिक भूखे और लाचार लोगों की सेवा को महत्व दिया गया है।
सबको कहाँ कभी राम मिला है…..
जितना लिखा रब ने उतना मिलेगा,
सुनहरी सुबह, स्याह रात मिला है।
कर न तू कोई गिला और शिकवा,
सबको कहाँ यहाँ कभी राम मिला है।
अपने क़िस्मत से होते हैं अमीर-ग़रीब,
मिलता यहाँ सब हिसाब-किताब से।
कभी दो वक़्त, कभी ख़ाली पेट,
ज़िंदगी में रोज़ यही सिलसिला है।
जाते हैं हम सब मंदिर-मस्जिद में,
भूखे लाचारों की सेवा करें तो भला है।
पेड़ देते हैं फल-फूलों का दान,
बिना सोचे-समझे तभी तो खड़ा है।
राहें बहुत हैं, मुश्किल है डगर,
कंकड़-पत्थर हर बार मिलेंगे।
चलते जाओ तुम निष्ठुर होकर,
तब ही भाव-सागर से तुम तरोगे।
रोके कहाँ रुकी हैं नदियाँ कभी,
मीठा जल समुद्र से हर बार मिला है।
मुस्कुरा देते हो मेरा हाथ पकड़कर,
चल पड़ा लगातार यही सिलसिला है।
जल्दी नहीं पढ़ता कोई किताब खरीदकर,
कहानियों और कविताओं का भरमार पड़ा है।
बाँट दी अब हमने अपनी सब पुस्तकें,
मुफ़्त में पढ़कर वाह-वाह किए जा रहे हैं।
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बहुत कम लोग होते हैं
जो हमारे दिल के इतने पास होते हैं।
वे सुबह के सूरज की रोशनी बनकर
धीरे-धीरे जीवन में उतरते हैं
और अपनी लालिमा से
तन-मन के चारों ओर उजास बिखेर देते हैं।
उनकी बातों की ख़ुशबू
मन को आनंद से भर देती है
और भीतर जमी निराशाओं को दूर कर
आशा के दीप जला देती है।
वे केवल सुबह की भोर ही नहीं होते,
बल्कि तब भी साथ रहते हैं
जब दिन ढल जाता है
और अमावस की अंधेरी रात
मन को उदासी से भर देती है।
उस अँधेरे में भी
उनका एहसास एक दीप-सा टिमटिमाता रहता है,
उनकी चाँदनी
मन के आकाश पर बिखरती रहती है।
कोई तो है-
जो हर बार मुझे
फिर से सुबह होने का एहसास कराता है,
धधकते मन के ज्वार-भाटे को
अपनी शीतलता से शांत कर देता है—
अपनी बातों से,
अपनी आवाज़ से।
ममता गुप्ता,टंडवा झारखंड
+91 7645-902687
