डूबते किनारे \कहानी - rashtrmat.com

डूबते किनारे \कहानी

डॉ. रंजना जायसवाल की कहानीडूबतेकिनारेसिर्फ नाव और नाविक की नहीं है, बदलते समय में हाशिये पर छूटते आदमी की कहानी है। विकास जब आता है, तो वह कुछ लोगों के लिए सुविधा लाता है,लेकिन कुछ लोगों की पूरी दुनिया भी डुबो देता है। पुल, स्टीमर और आधुनिकता आगे बढ़ते समाज के प्रतीक हैं, मगर उनके बीच पुराने मेहनतकश लोग धीरेधीरे अप्रासंगिक होते जाते हैं।कहानी यह भी कहती है कि गरीबी इंसान को जोखिम और अंधविश्वास, दोनों की तरफ धकेल देती है। नाविक कील की अंगूठी में उम्मीद खोजने लगता है, क्योंकि

उसके पास वास्तविक सहारा नहीं बचा।

                               डूबते किनारे \कहानी

     डॉ. रंजना जायसवाल

“खट-खट…”

मोहन ने गंगा नदी के किनारे बालू और कीचड़ में सने लकड़ी के डंडे में फंसे रस्सी को खोला ही था कि नाव धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ गई। वह कूद कर आगे बढ़ा और नाव पर चढ़ गया। पूस की कोहरे भरी सुबह जैसे पूरा संसार सफेद चादर ओढ़ सो रहा हो।सुबह अभी भी रुआंसी सी थी। बर्फीले पानी में पैर पड़ते ही मोहन के मुँह से एक सिसकार निकल गई। पल भर को वह पीछे की ओर हटा फिर न जाने क्या सोच नाव पर चढ़  गया।शीत लहरी ने पूरे जोर से पकड़ बना रखी थी वैसे भी नदी किनारे ठंड का प्रभाव ज्यादा ही देखने को मिलता है।इस वक्त नाव भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी मोहन के जीवन की ही तरह..नाव थरथरा रही थी शायद शीत लहरी से या शायद ठंड से…या शायद उन असंख्य आशंकाओं से जो हर सुबह मोहन के साथ नदी में उतर आती थीं।

मोहन के नाव में बैठते ही लहरों की वज़ह से नाव आगे की ओर बढ़ गई, मोहन भी पीछे कैसे रह सकता था? वैसे भी जीवन के संघर्ष से भला पीछे कौन हट सकता है!उसे न चाहते हुए भी आगे बढ़ना ही था।इस पेट की खातिर परिवार की खातिर…पेट की आग और परिवार की जिम्मेदारी इनके आगे ठंड,डर,थकान सब बौने पड़ जाते हैं उसे न चाहते हुए भी आगे बढ़ना ही था। उसने आगे बढ़ना नाव से ही सीखा था जो लहरों से लड़ते हुए पानी के बहाव को काटते आगे बढ़ती रहती है।

उसने बगल वाले घाट पर नज़र डाली,कुछ साल पहले तक वह और उसके साथी अपनी-अपनी नावों के साथ उसी घाट पर सवारियों का इंतज़ार करते थे।सागौन,महोगनी, ओक और देवदार की मजबूत और पानी से बचाने वाली लकड़ियों से बनी नावें इन घाटों की शान होती थी।उनकी जगह फाइबर ग्लास, अल्युमिनियम स्टील और कंपोजिट मैटेरियल्स की बनी नाव ने जगह ले ली थी जो देखने में सुंदर, हल्की, मजबूत और जल प्रतिरोधक होती थी। ऊपर से उनके रंग-बिरंगे रंग सवारियों को आकर्षित करने के लिए काफी थे। कुछ नाविक ने तो अपनी नावों को सुंदर रंगीन कागजों,गद्दे और कुशन से भी सजा रखा था पर मोहन और उसके साथी इन सबके लिए पैसे भला कहाँ से लाते।वह पीढ़ियों से यह काम करते आ रहे थे उन्हें तो दूसरा काम करना भी आता नहीं था। मुट्ठी भर पूजी और सुरसा के मुँह की तरह जिम्मेदारियाँ हमेशा मुँह बाएं खड़ी रहती थी।

बड़ी कम उम्र में ही मोहन बापू के साथ काम सीखने के लिए नाव पर जाने लगा था। वैसे भी घर बैठकर क्या ही करता। हाथों में लंबी सी रस्सी से बंधे चुंबक को गंगा मैया में डालकर वह गंगा मैया की गोद में फेंके गए भक्तों के विश्वास और मन्नतों के सिक्कों को निकालने की कोशिश करता और कभी-कभार कोई सिक्का जब उसके चुंबक से चिपक जाता तो वह खुशी से झूम उठता। उसे आज भी वह दिन याद है, जब उसने कलुआ के बापू की नाव देखकर कहा था।

“बापू हम सागौन की लकड़ी की नाव क्यों नहीं बनाते!”

बापू ने उसे समझते हुए कहा था,“बचुवा, यह सब चोंचले हैं। जामुन की लकड़ी से बढ़िया कोई लकड़ी नहीं,नाव की लकड़ी सड़ती भी नहीं और उसमें काई भी नहीं लगती।”

“पर बापू देखने में कितनी सुंदर लगती है, सवारियाँ भी उसी पर चढ़ने के लिए परेशान रहती है।हमारी नाव की तरफ कोई देखता भी नहीं…!”

“इन सब साज-सजावट में फालतू का कितना खर्चा आता है ऊपर से उनका रख-रखाव का खर्चा अलग…काम तो वो भी यही करती है जो हमारी नाव करती है।सस्ती की सस्ती और काम का काम..।”

मोहन का बाल मन बापू के तर्क को स्वीकार नहीं कर पा रहा था पर एक जगह पर आकर बापू के तर्क के आगे उसने हथियार डाल दिए, कहाँ समझ पाया था वह बापू की मजबूरी…बापू भी उससे कहाँ कह पाए थे कि उनकी रोजी-रोटी से इतना ही पैसा मयस्सर हो पता है कि वह जामुन की लकड़ी से बनी नाव को चला पाएं। वक्त बदला और वक्त के साथ बहुत कुछ बदला,मोहन के बापू सिर पर गमछा और शरीर पर बनियान-लुंगी पहनकर नाव चलाते थे पर मोहन नए जमाने का लड़का था वह सिर पर टोपी और शरीर पर लोवर और टी शर्ट पहनकर नाव चलाता था। अगर नहीं बदला था तो मोहन के बापू की नाव, वह आज भी जामुन की लकड़ी से बनी बापू की नाव को ही चलाता था।

“जय हो गंगा मैया की…।”

उसने अपनी आँखें मूंद लीं और धूप और पानी से काली और रूखे हो चुके अपने  हाथों को जोड़ ईश को याद किया उसके होंठ तेजी से बुदबुदा रहे थे उसने आँखें खोली और आकाश की ओर तकने लगा, एक अनकही उम्मीद के साथ कि शायद आज कोई अच्छी सवारी मिले!मोहन ने शरीर पर लपेटे गमछे को गोल-गोल घुमा कर सर पर बांध लिया और उसके ऊपर टोपी रख ली।एक ठंडी हवा का झोंका उसके तन को सहलाता हुआ चला गया  और उसका शरीर ठंड से कंपकंपा गया। नदी की सतह पर हल्की-हल्की लहरें कांप रही थी।मोहन यह देख मुस्कुरा दिया,“का हो गंगा मैया जड़ात हो का…!”

गंगा मैया चुपचाप वैसे ही बहती रहीं, जैसे मोहन की बात को समझ रही हों।मोहन ने ठंड से ऐंठती उंगलियों को कसकर रगड़ कर गर्म करने का निरर्थक प्रयास किया और अपनी लंबाई से भी लंबे चप्पुओं को पानी में उतार एक फिर गंगा मैया को याद किया।

“जय हो गंगा मैया की…।”

मोहन की जामुन की बनी नाव लहरों को काटती आगे की ओर बढ़ गई।सूर्यदेव का कहीं कोई अता-पता नहीं था।

“सोनुवा के बापू इतनी सुबह कौन सवारी मिलेगी जरा सूरज तो निकलने दो।”

“सोनुवा की अम्मा सूरज भगवान न निकलेंगे तो का सुबह न होगी। जरा बाहर निकल कर देखो दुनिया कब की जाग चुकी है। एक तो वैसे ही पुल बन जाने से मुश्किल से सवारी मिलती है, ऊपर से सूरज निकलने का इंतजार करेंगे तो मिल चुकी सवारी…।”

बात तो गलत नहीं कही थी मोहन ने पुल बनने के बाद लोगों को सुविधा मिल गई थी।लोग गाड़ी से समय पर और सुरक्षित अपनी मंजिल पर पहुँच  जाते थे। सुरक्षित तो वो भी पहुँचाते थे पर …।

दो साल पहले की बात है।चुनाव सर पर थे। दस साल से गंगा जी के ऊपर पुल बनने की योजना थी। शहर पर जनसंख्या का दबाव दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था। पिछली सरकार ने पुल बनाने का पैसा भी पास कर दिया था पर सरकारी योजना …योजना और पैसा खा-पी के ठंडे बस्ते में बंद हो गई। नई सरकार आई तो उम्मीद की लौ फिर से जगी। जनता खुश थी गंगा जी पर एक पुल पहले से था पर वह शहर से दूर पड़ता था। नेता जी ने जनता से वायदा किया था हमें जीता दीजिए इस बार पुल बनवा ही देंगे। नेता जी अपने इस वायदे के कारण जीत भी गए। पहले वाले की अपेक्षा थोड़ा ईमानदार भी निकले, खाते तो वह भी थे पर उनका पेट पहले वाले नेता जी की तरह कम बड़ा था सो चुनाव जीतते ही पुल का काम लग गया।

मोहन और उसके साथी इतने वर्षों से बेफिक्र थे कि सरकार का क्या है वह तो आती-जाती रहती है।वायदे भी बनते-बिगड़ते रहते हैं पर वह यह कहाँ जानते थे ये सरकार अपने वायदों की पूरी पक्की निकलेगी।पुल बनते ही मोहन और उसके साथियों के चेहरे उतर गए। होना भी था उनकी जीविका का यही तो एकमात्र साधन था।जीवन भर यही तो किया था, अब इस उम्र में भला और क्या ही करते पर ये उम्मीद थी कि पुल बनने में समय लगेगा सो इस बीच जितना कमा सकेंगे कमा लेंगे।

वो कमाने का महीना था।मोहन और उसके जैसे कितने ही मल्लाह साल भर इस दिन का इंतजार करते थे।इंतजार तो वो भक्त भी करते थे जो अपनी मन्नतों और विश्वास का बोझ लिए साल भर इस महीने का इंतजार करते थे।

नदी उस पार शीतला माता मंदिर पर सुबह से ही दर्शन-पूजन के लिए भीड़ थी। मोहन और उसके साथी सुबह से सवारी ढोते-ढोते थक चुके थे। नवरात्रि के दिनों में खूब भीड़ होती थी। बड़ी मान्यता थी, सुना था माँ के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं जाता था। शाम होने को आ गई थी पर भक्तों की भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। प्रशासन ने नदी किनारे दो होमगार्ड लगा रखे थे।

“भैया बहुत दूर से आए हैं।माँ के दर्शन बिना कैसे चले जाए?”

भक्तों के झुंड ने मोहन और उसके साथियों को घेर लिया।उनकी आँखों में माँ के दर्शन की लालसा टपक रही थी।मोहन और उनके साथियों के दोनों हाथ चप्पू चलाते-चलाते थक चुके थे…मोहन थकान से हांफ रहा था।

“मोहन तू रुक हम दर्शन करवा के आते है।”

कलुवा ने चप्पू संभालते हुए कहा,देखते ही देखते नाव भक्तों से भर गई। मोहन की नज़र नाव के निचले हिस्से पर गई।उसने कलुआ को इशारा किया।नाव का एक अच्छा-खासा हिस्सा पानी में डूब गया था।

“पुलिस वाले चक्कर मार रहे हैं जरा देख संभल के…।”

कलुवा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी

“चाय-पानी का दे दिया है, बस यह आख़िरी चक्कर है।”

कलुआ पर पैसे कमाने की धुन सवार थी। दस आदमी की नाव में उसने सत्रह लोगों को बैठा लिया। भक्त खुश थे बहुत खुश…क्योंकि उन्होंने उम्मीद छोड़ दी थी कि माता के दर्शन हो पाएंगे।आस्था अंधी होती है,भक्त सोच रहे थे थे माता रानी स्वयं चाहती हैं कि वह उन्हें दर्शन दे। शायद इसीलिए न-न करते हुए भी नाव वाला उन्हें बैठाने को तैयार हो गया था पर उनके शरीर से भी अधिक भारी था उनकी मन्नतों का बोझ… शायद इसीलिए बीच नदी में आकर नाव अचानक से पलट गई। चारों तरफ कोहराम मच गया। घाट किनारे नदी में डूबते सूरज का आनंद लेते हुए लोग और मल्लाह की जमात चिल्ला पड़ी।

“अरे देखो नाव पलट गई।”

मोहन और उसके साथी ने आव देखा न ताव और वह गंगा की तेज धार में कूद पड़े ।मछली की तरह विपरीत धारा में तैरते हुए वह आगे की ओर बढ़ने लगे।गाड़ियों में सवार नन्हे-नन्हे बच्चे जिन्हें अभी जीवन के न जाने कितने रंग देखने थे गंगा माँ की गोद में समा चुके थे।मोहन तैरता हुआ बीच धारा में पहुँचा और अपना सिर पानी में घुसा दिया।एक वृद्ध औरत पानी पीकर नीचे बैठ चुकी थी। मोहन का पैर उसके पेट से टकराया वह तिलमिला उठा। जो लोग अभी जीवित थे हॅंस मुस्करा रहे थे अब वह मर चुके थे। मल्लाहों और स्थानीय लोगों के प्रयास से दस लोगों को जीवित निकाल लिया गया पर सात लोग इस जीवन से विदा हो चुके थे। नदी के अंतिम छोर पर सूरज डूब रहा था, लोगों के जीवन का सूरज भी डूब चुका था।

हफ्तों तक घाट के रास्ते बंद कर दिए गए।मरने वाले मर चुके थे पर जो जीवित थे वह अपनी जीविका के लिए छटपटा रहे थे। आखिर उनके घर में भी लोग थे जिन्हें पेट भरने के लिए कुछ न कुछ तो चाहिए ही था।सरकार इस घटना के बाद चौकन्नी हो गई।आखिर उन्हें अगला चुनाव भी जितना था, अखबार मृतकों के खून से लाल था।

प्रशासन इस घटना के बाद से सख्त हो चुका था।मानसून के मौसम में उफनती नदियों में जान-माल की हानि से बचने के लिए प्रशासन की नज़रों का हमेशा पहरा लग जाता था। मल्लाहों को नदियों में जाने से रोका जाता था। हर वर्ष की तरह शीतला माता के दर्शन का पावन महीना भी आता था पर अब शीतला माता के दर्शन के लिए गिनती की नाव होती थी जिन्हें दिन भर में पाँच चक्कर की ही अनुमति थी। बड़े-बुजुर्ग ऐसे ही नहीं कह गए करेला ऊपर से नीम चढ़ा…मोहन और उसके साथियों के जीवन की मुश्किलें क्या कम थी, प्रशासन ने सरकारी नाव का इंतजाम कर दिया था, जिन पर चक्कर लगाने का कोई दबाव नहीं था। वह कितने भी चक्कर लगा सकते थे।डीजल से चलने वाली यह नाव मोहन और उसके साथियों की लकड़ी की नाव का सामना भला कैसे कर पाती।फाइबर और अल्युमिनियम से बनी रंग-बिरंगी नाव पानी की तेज़ धारा को काटती इठलाती-बलखाती आगे बढ़ती जाती। वह लोगों की पसंद का केंद्र बन गई थी।

पर फिर भी लोगों को गाहे-बगाहे मोहन जैसे लोगों की याद आ ही जाती।कल शाम की ही तो बात है, एक अधेड़ महिला उन रंग-बिरंगी नावों को छोड़ कच्चे घाट जहाँ मोहन और उसके साथी अपनी नाव लिए सवारियों का इंतज़ार करते रहते थे बढ़ी चली आ रही थी। मोहन और उसके बाकी साथियों के आँखों के जुगनू चमक उठे।वो मन ही मन सोच रहे थे इन ताम-झाम वाली नावों में वो बात कहाँ आज भी लोग पुराने नाव को प्राथमिकता देते हैं वैसे भी सोने की क़दर सुनार को ही होती है।

“कहाँ जाना है माता जी?”

मोहन ने अपने शब्दों को शहद में घोल मिठास से भर उस महिला के सामने पेश कर दिया।

“कहीं नहीं बेटा…।”

औरत के कहने भर की देर थी सभी की आँखों के जुगनू धप्प से बंद हो गए।वे सब इधर-उधर छिटक गए मानो किसी बच्चे के हाथ से अचानक गुल्लक छूट कर फुट गई हो और सिक्के छन्न से इधर-उधर बिखर गए हो पर मोहन वहीं खड़ा रहा शायद वह कुछ-कुछ समझ रहा था।

“कुछ काम था?”

मोहन ने सधी हुई आवाज़ में कहा

“बेटा, मेरा एक ही बेटा है।सालों से बीमार चल रहा है।पंडित जी को कुंडली दिखाई तो पता चला कि उसके ऊपर साढ़े साती चल रही है।”

“ओह फिर…।”

मोहन की आवाज़ में चिंता और सहानभूति थी।

“पंडित जी ने नाव की कील की अंगूठी पहनने को कहा है अगर एक कील…।”

शब्द महिला के गले तक आकर रुक गए।

“मैं पैसा देने के लिए तैयार हूँ।”

“एक कील का आप क्या देंगी माता जी, आप ऐसे ही लेते जाइए।”

अधेड़ महिला ने राहत की सांस ली शायद उन्हें इस बात की उम्मीद कम ही थी कि उन्हें कील इतनी आसानी से मिल जाएगी। अधेड़ महिला ने दार्शनिक होते हुए कहा

“अरे नहीं बेटा, घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या…कहते है डॉक्टर से मुफ्त में इलाज़ करवाओ तो दवा नहीं लगती,फ़ायदा नहीं होता।”

महिला की बात सुन मोहन के चेहरे पर मुस्कान आ गई।वह दौड़कर बगल वाले घाट पर बने चाय की टपरी से भगोने को पकड़ने वाली पकड़ को ले आया और उसने पूरी ताकत से नाव की कील खींच कर बाहर निकाल दिया। अधेड़ महिला के चेहरे पर अभी तक जो चिंता का भाव दिख रहा था अब वहाँ पर संतुष्टि पसरी थी। मोहन ने गंगा के पवित्र जल में कील को धोकर उस महिला को पकड़ा दिया।

महिला ने मोहन के हाथों में सौ का मुड़ा-तुमड़ा नोट पकड़ाते हुए कहा,“बेटा मना नहीं करना, मैं इसे ऐसे नहीं ले सकती। बस भगवान से प्रार्थना करो, मेरा बेटा ठीक हो जाए।”

मोहन ने सौ का नोट अपने माथे से लगाते हुए शर्ट की ऊपरी जेब में सरका दिया।

“माता जी अब तो गंगा मैया का भी आशीर्वाद मिल गया। आपका बेटा जल्दी ठीक हो जाएगा।”

उस महिला ने कील को संभाल कर अपने पर्स में रखा और वापस लौट गई। मोहन बहुत देर तक उस औरत को जाते हुए देखता रहा, जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई। वह सोच रहा था उसकी और उसके साथियों के ऊपर जिस शनि की ग्रह दशा कुंडली मार कर बैठ गई थी, काश कोई ऐसी कील कोई ऐसा तोड़ कोई पंडित उसे भी बताता जिससे उसके और उसके साथियों के दिन बहुर जाते। एक हफ़्ते पहले भी विश्वास का दामन पकड़े एक व्यक्ति अपने घर के गृहप्रवेश के लिए घर के चार कोनों में गाड़ने के लिए कील और गंगा मैया की बीच धारा में लगी कुश को पूजन के लिए ले कर गया था। इंसानों के ये छोटे-छोटे विश्वास के पूर्ण करने के लिए खर्च की गई पूंजी किसी के घर के चूल्हे जलाने और उनकी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी होती है ।

मोहन का कई बार मन करता कि कह दे कि इसके लिए क्या पैसा लेना पर जब कई-कई दिनों तक कोई सवारी नहीं मिलती तब यही छोटी सी पूंजी उसके घर का चूल्हा जलाने के काम आती थी। वैसे भी जब से पुल बना था श्मशान घाट के टाल वाले ट्रक से लकड़ियाँ मंगवाने लगे थे।मोहन और साथियों ने सालों-साल इन्हीं नावों पर लकड़ियाँ पहुचाईं थी और मृतकों की अंतिम यात्रा को सुगम बनाया था।आज उन्हीं सुगम बनाने वाले हाथों के जीवन के रास्तों पर कांटे उग आए थे।

तभी अचानक से पास वाले पक्के घाट पर चहल-पहल हो गई। शादी के बाद गंगा मैया के दर्शन के लिए नए जोड़ा परिवार के साथ आया था। बच्चे झुंड बनाकर फोटो खींच रहे थे तो कभी सूरज और नदी की तस्वीरें उतार रहे थे। तभी  गेंदे के फूलों की कई टोकरी लिए कई लोग रंगीन नावों पर चढ़ने लगे।

“शायद किसी की मन्नत पूरी हुई है !”

बिरजू ने मोहन से कहा। मोहन सोच में डूब गया। अम्मा बताती थी मोहन जब छोटा था तब उसे बड़ी माता निकल आई थी। तेज़ बुखार से तपता बदन और मोहन की लाल-लाल आँखों देख अम्मा ने घबरा कर गंगा मैया से मन्नत मांगी थी। उनका लल्ला ठीक हो जाएगा तो वह उनको चुनरी चढ़ाएगी और फूल की माला से आर-पार नपवाएगी। शायद आज भी किसी माँ की मन्नत पूरी हुई थी।

तभी उसे दूर से सफ़ेद कफन में लिपटी कोई चीज़ अपनी ओर बहती आती नज़र आई।मोहन अपनी सोच के दायरे से बाहर आ गया

“हे भगवान! सुबह-सुबह बस यही देखना रह गया था?”

बिरजू ने अपनी आँखों को बड़ा करते हुए कहा। मोहन ने अपनी नाव उस कफ़न की ओर बढ़ा दी। न जाने किसके घर का चिराग था। लोग ठीक से मिट्टी भी नहीं बहा सकते।शायद रस्सी टूट गई और मिट्टी पत्थर से अलग होकर ऊपर आ गई।हो सकता है किसी का पाप हो और उसने अपने पाप को धोने के लिए उसे गंगा के पवित्र और शीतल धार में प्रवाहित कर अपने पाप से मुक्ति पा ली हो पर क्या सचमुच उसके इस कृत्य के लिए गंगा मैया ने माफ कर दिया होगा।

मोहन तेज़ी से आगे की ओर बढ़ा, सफेद कफ़न में लिपटी वह मिट्टी उसकी नाव से आ कर टकरा गई। मोहन ने चील की तरह झपट्टा मारा और उस कफ़न से ढकी मिट्टी को उठा लिया।मिट्टी पानी का सहारा पाकर फुल गई थी उसने नदी के किनारे अपनी नाव को लगाया और कफन में लिपटी रस्सी में एक भारी पत्थर बांध बीच नदी में जाकर उसे फिर से प्रवाहित कर दिया है।

“गंगा मैया इसकी आत्मा को शांति देना।”

मोहन ने हाथ जोड़े,उसके होंठ तेज़ी से कुछ बुदबुदा रहे थे और मन-मस्तिष्क कुछ और ही बुन रहा था।

“न जाने किसकी कर्मों की सजा थी शायद इस मिट्टी का जीवन इस धरती पर इतना ही लिखा था। शायद पिछले जन्मों के कर्म इस रूप में बाहर आए थे। शायद! शायद…।”

इस “शायद” को सोच कर उसका मन-मस्तिष्क भन्ना गया।मोहन हमेशा सोचता था उनके पूर्वजों ने भगवान को नदी पार कराई थी तो क्या भगवान उसकी नैया पार नहीं कराएंगे।भगवान को पार कराने वाले का भाग्य उनके कर्म आखिर ऐसे कैसे खराब हो गए? बापू हमेशा कहते थे जल पौधों को जीवन देता है और वही पौधा जब बड़ा होकर पेड़ बनता है तो उसकी लकड़ियों से नाव बनती है।शायद इसीलिए लकड़ी जल के किए गए उपकार को भूल नहीं पता और उसे डूबने नहीं देता। मोहन को एक उम्मीद थी कि गंगा मैया मोहन और मोहन जैसे लोगों को भी डूबने और मरने नहीं देगी।उसने बड़ी उम्मीद से गंगा जी की ओर देखा। गंगा जी की लहरें तेज़ी से उसकी नाव से आकर टकराई और उन लहरों के साथ मुट्ठी भर सुकून मोहन की तरफ सरका दिया। मोहन उस सुकून को अपनी आत्मा में उतार आगे की ओर बढ़ गया।

“गड़-गड़,गड़-गड़…।”

तभी सवारी से भरी एक बड़ी सी नाव मोहन की नाव को पीछे छोड़ दहाड़ती हुई पुल की ओर बढ़ी।नाव का विशाल और रौद्र रूप देख गंगा की जल धारा डर से पीछे हटी और उन लहरों में एक कम्पन पैदा हुआ जिससे गंगा की लहरें ही नहीं मोहन की नाव भी कांप उठी।पता नहीं यह भ्रम था या सच शायद मोहन की तरह नाव को भी अपना अस्तित्व खतरे में महसूस हो रहा था। मोहन ने पवित्र गंगा की ओर देखा। लहरें जाकर नाव से टकराई जैसे कुछ कहना चाहतीं हो, फिर फिसल कर आगे बढ़ गई। उसे सन्नाटे में मोहन ने महसूस किया कि गंगा बह रही है,पुल खड़ा है, बड़ी नाव दौड़ रही हैं डूब सिर्फ उसकी तरह के लोग रहे हैं।नाव हल्की सी डगमगाई मोहन ने चप्पू कसकर थाम लिया, जब तक उसके हाथों में दम है नाव नहीं डूबेगी। बस यही विश्वास उसे आगे बढ़ाए लिए जा रहा था।

डॉ. रंजना जायसवाल,लाल बाग कॉलोनी

छोटी बसही,मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश

पिन कोड 231001

मोबाइल न-9415479796

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