डॉ उपासना दीक्षित की कविताएं - rashtrmat.com

डॉ उपासना दीक्षित की कविताएं

डॉ उपासना दीक्षित की कविता महादेवी वर्मा शैली के विरह भाव की याद दिलाती है, जहाँ प्रिय की अनुपस्थिति ही प्रेम की उपस्थिति बन जाती है। उनकी कविता रहती है प्रेम हमेशा साथ होने का नाम नहीं,कभी-कभी याद ही सबसे सच्चा साथ होती है। डॉ उपासना दीक्षित की कविताएं  स्मृति में जीवित प्रेम की आत्मीय कविता है कोमल, स्त्रीसुलभ और भावप्रधान।

डॉ उपासना दीक्षित की कविताएं

तेरी बातों में खोकर सुध-बुध खो बैठी

दुनियाँ कहती जाने मैं किस बात पे ऐंठी।।

अब तो तेरी याद में जीना याद में मरना

तेरी यादें अब इस दिल में गहरे पैठीं।।

तुझको अपना मान रचे हैं गीत अनेकों

शब्दों के धन से चमकाई मन की कोठी।।

शहद-से मीठे जाने कितने छंद रच गये

मिलने की जब की इच्छा तो किस्मत रूठी।।

चाँद को साक्षी मान प्रेम को है स्वीकारा

पहनी जो दी, हृदय रुप सी सजी अंगूठी ।।

तिल-तिल मरकर कितना तुझको याद करूँ

मैं आस तपे मन,विरह अग्नि की जले अंगीठी।।

2

तिरे  जैसा  कोई  दीवाना  नहीं  है

तू बहर ए गजल है, फसाना नहीं है

जो बख्शा खुदा ने सुकूँ आज हमको

वो  तो  कोई आसां  तराना  नहीं है

जो जन्नत से बेहतर मेरा आशियाँ है

कोई उससे उम्दा ठिकाना नहीं है।।

चलन प्यार का जिन दिलों में है जिंदा

कोई  उससे अच्छा  जमाना  नहीं है

  3

जहाँ सारा छोड़ो चले आओ तन्हा

कोई और मिलने का बहाना नहीं है।।

रोज देना पड़ता था,ज़िंदा होने का सबूत

इसीलिए कमबख्त खुद को मिटा रहा हूँ

खुशियों  से  तेरा  दर, हो जाए  मालामाल

सुबह-शाम दीपक-सा खुद को जला रहा हूँ

छोड़ो, जाओ, भूल  गए  क्या, जाने  भी

दो इन अल्फाजों से अब रिश्ता निभा रहा हूँ

बैठो पास या ना बैठो कोई गिला नहीं है

दूर अकेले रहकर खुद को सता रहा हूँ

 

काजल बन कर रहा बहुत दिन आँखों में

चुप से बहने  को अब  रस्ता बना रहा हूँ

तेरे वापिस आने  की अब  आस छोड़ दी

मैं रहता  मशरूफ यह  सबको बता रहा

डॉ उपासना दीक्षित,गाजियाबाद यूपी

Mo-9015292022