सिस्टम वीक तो पेपर लीक \ व्यंग्य - rashtrmat.com

सिस्टम वीक तो पेपर लीक \ व्यंग्य

गिरीश पंकज बता रहे हैं कि देश में कोई भी पेपर लीक कैसे होता है। और पेपर लीक करने के बाद सरकार करती क्या है। पेपर लीक अब  धंधा बन गया है। इसमें सरकार में बैठे लोग और उनके आदमी दोनों मजा करते हैं। नीट पेपर लीक को सामने रखकर पढ़िये इस व्यंग्य को और आनंद लीजिए।

सिस्टम वीक तो पेपर लीक \ व्यंग्य

गर्मी के समय पानी की टंकी में कहीं लीकेज नज़र आए तो लोग घबरा जाते है। कहीं टंकी न गिर जाए। कहीं बूंद-बूंद पानी लीक हो कर टंकी ही न खाली हो जाए और प्यास का संकट झेलना पड़ जाए. उसी तरह परीक्षा का समय आते ही और किस्म के लीकेज की समस्या बढ़ जाती है।

कभी-कभी कुछ नकलची बच्चों की जेबों से नकल मारने के लिए बड़े श्रम के साथ तैयार की गई पर्चियां लीक होती हैं। लेकिन मैं दूसरे किसम के लीकेज की बात कर रहा हूँ।

उफ, अब आप यहाँ यह समझ रहे होंगे कि मैं कमजोर विद्यार्थियों के पेट खराब होने के कारण बार-बार दिशा-मैदान जाने वाले लीकेज की बात कर रहा हूँ, लेकिन ऐसा नहीं है। बच्चों के पेट तो ठीक होते हैं लेकिन नंबर दो की कमाई करने वाले लीक-लीक खेलने लगते हैं। वर्षों से ही पेपर लीक करने की कला में माहिर शूरवीर किस्म के लोग साल भर शहर में अपराध करते रहते हैं और परीक्षा के समय पेपर उर्फ परचा सेटिंग करने वालों के साथ सेटिंग करके प्रश्न-पत्र हथिया लेते हैं। फिर खा-पीकर अघा, पढ़ाईचोर किस्म के बच्चों से मोटी रकम ऐंठ कर उन तक पेपर पहुँचा देते हैं। अकसर तो मामला दब जाता है लेकिन कभी-कभी सामने आ जाता है, और मीडिया में छा जाता है।

हमारा सिस्टम जब वीक होता है,

तभी कोई-न-कोई

पेपर भी लीक होता है।

हालांकि यह जो होता है

वह ठीक होता है।

क्योंकि इसी बहाने सिस्टम में घुसे लोगों के चरित्र के बारे में भी सबको पता चल जाता है कि इन सब शातिरों के कारण ही कारण ही पेपर लीक हुआ या पेपर लीक हुए।

मजे की बात यह है कि जिन लोगों के कारण पेपर लीक होते हैं, वे ही लोग मीडिया के सामने आकर के मनोरंजक बयान देते हैं कि “पेपर लीक करने वाले अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा।… उन्हें कड़ी-से-कड़ी सजा मिलेगी।”

सामने वाले सोचते हैं कि देखो कितना ईमानदार आदमी है। कितनी बेबाकी के साथ कह रहा है कि पेपर लीक करने वाले दंडित होंगे। लेकिन फिर देर रात वही डॉन पेपर लीक करने वालों से कहता है, “बेटे, अभी तुम दो महीने के लिए फरार हो जाओ। तब तक हम लीपापोती कर लेते हैं। जाँच कमेटी बैठा देंगे। वह जाँच करती रहेगी। लेकिन जाँच से तुम पर कोई आँच नहीं आएगी। बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय। हम तो हूँ। बस, तुम ईमानदारी से हमें हमारा हिस्सा पहुँचाते रहना।”

सिस्टम के चालाक बंदे कुछ छोटे-मोटे गुर्गों को पकड़कर जनता के सामने पेश कर देते हैं। बाद में सबूत के अभाव में सब छूट जाते हैं। अपने यहाँ तो यह बड़ी पुरातन सी परम्परा है। कुछ अंतराल के बाद नई परीक्षाएँ होती हैं। बाकी बच्चे मन लगाकर पढ़ाई करते हैं और बात आई-गई हो जाती है।

सिस्टम के चूहे बार-बार वादा करते हैं कि अगली बार पूरी तरह से सख्ती बरती जाएगी। और एक भी पेपर लीक नहीं होगा।

और सचमुच ….कुछ लीक नहीं होता। अंदर-ही-अंदर इतनी बारीक बुनावट के साथ खेल होता है कि शतरंज के बड़े-बड़े शातिर भी नहीं समझ पाते। पेपर डट के लीक होता है। हजारों-लाखों रुपए की कमाई हो जाती है। और किसी को पता ही नहीं चलता। कुछ सेठों के पढ़ाईचोर बच्चे पेपर को हासिल करके परीक्षा देते हैं और अच्छे नंबरों से पास भी हो जाते हैं। वही समारू और बुधारू के बच्चे पूरी किताब रटते हैं और समझ नहीं पाते कि कौन-कौन-से पाँच महत्वपूर्ण सवाल आएँगे। वे ठीक से उत्तर नहीं दे पाते। कुछ फेल हो जाते हैं, कुछ तृतीय श्रेणी में पास हो कर के किस्मत को सराहते हैं। वहीं पेपर को खरीदने वाले धनपशुओं के बच्चे टॉप करते हैं और रात को बीयर बार में बैठकर चीयर्स करके खुशी का इजहार करते हैं।

….. और सुरूर में आने के बाद सिस्टम जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाते हैं।

गिरीश पंकज,वरिष्ठ साहित्यकार

रायपुर, छत्तीसगढ़

M0-9425212720

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