डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी बता रहे हैं कि हिंदी साहित्य और भारतीय सिनेमा का रिश्ता केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि संवेदना और समाज का रिश्ता रहा है। शब्द जब परदे पर उतरते हैं तो वे केवल कहानी नहीं रहते, बल्कि समय, समाज और मनुष्य की जटिलताओं का दृश्य दस्तावेज बन जाते हैं।
किताब,कैमरा और बाजार\विशेष लेख
– डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी
“सिनेमा लोगों के दिलों दिमाग को, गढ़ेगा और उनके आचरण को प्रभावित करेगा। युवा वर्ग पर इसका दुष्प्रभाव नहीं पड़ सकता यदि वह स्वस्थ मस्तिष्क है। पर हर कला में अच्छी और बुरी दोनों तरह की शक्ति होती है।”(बर्नार्ड शॉ )
उस ज़माने को याद कर रहा हूँ जब सिनेमा देखने की मनाही होती थी। सिनेमा छिप -छिपकर देखा जाता था। पता चल जाय तो पिटाई भी हो सकती थी। फिल्में देखने की गलियां बंद रहतीं थीं।स्त्री पात्र काम नहीं करते थे बल्कि स्त्री के रोल पुरुष ही निभाते थे। रंगमंच में भी और फ़िल्मों में भी।ज़ाहिर है कि अच्छी फ़िल्में कोई पारखी ही बना सकता है।उसे मैं सेल्यूलाइट पर उतारी गई कविता के रूप में देखता रहा हूँ।कुछ अच्छी फ़िल्में छोटे लोकेशन पर फिल्माई गईं और सफल रहीं जैसे – ‘ दिल एक मंदिर’।उसी तरह उमराव जान।जिसको उपन्यासकार ने एक या दो रूपये में बेंच दिया था।बहुत कुछ कहने को है लेकिन फ़िलहाल ऐसा अवसर नहीं है। व्यापक परिप्रेक्ष्य को समेटने वाला यह विषय है। सिंगल लोकेशन पर फिल्माई गई फ़िल्में अच्छी खासी पटकथा के बिना संभव नहीं हो सकती. उसमें अभिनय के साथ ऐसी अनेक चीज़ें होनी चाहिए ताकि वो दर्शकों को संवेदित करते हुए आकर्षित भी कर सकें।भेजा फ्राई, उजाला, हड्डी, लुकाछिपी, तनु वेड्स मनु,ट्वीट एंग्री मैन, और कन्फेशन बहुत सीमित स्थानों, छोटे से जीवनपर फिल्माई गईं हैं।
कितनी अच्छी खासी किताबें होती हैं लेकिन सभी पर फ़िल्में निर्मित नहीं हो सकीं। मात्र श्रेष्ठता के आधार पर फ़िल्में नहीं बनाई जा सकतीं। उन पर किसी की नज़र नहीं जाती है।ज़ाहिर है निर्देशक बाज़ार को भी साधते हैं। फ़िल्में लाभ का भी जरिया बनती हैं.थोड़े से लोग बचते हैं जो जीवन और समय के कलात्मक सौंदर्य को एक साथ रखने का प्रयास करते हैं।उनके भीतर की ज़िद ऐसी पुस्तकों का सिनेमाईकरण करती है।राजेंद्र यादव का उपन्यास ‘ सारा आकाश ‘ को स्मरण कर रहा हूँ। दो आँखें बारह हाथ, और आंधी को भी।
अच्छी बात है कि फिल्म निर्माण में पुस्तकों की भूमिका के मुद्दे पर विमर्श हो रहा है लेकिन उस पर गहन चिंतन पटलों पर संभव नहीं हो सकता है। मेरे एक विद्यार्थी ने पी – एच .डी .के लिए एक विषय भी चुना था।काम भी किया था,पुस्तकों का सिनेमाईकरण।ज़ाहिर है कि विषय अच्छा है उस विषय को फैलाया भी जा सकता है लेकिन उसे सही ढंग से शायद समेटा नहीं जा सकता? क्योंकि उसका कोई शॉर्टकट संभव नहीं है।सिनेमा की एक टेक्नीक भी होती है और उसका संप्रेषण भी होता है। सिनेमेट्रोफी कोई सामान्य चीज़ नहीं है।निर्देशक यदि बाज़ार से बाहर निकलकर फिल्मांकन नहीं करता तो वह फ़िल्म व्यावसायीकरण में फंस कर समाप्त भी हो जाती है। इसीलिए तो समानांतर सिनेमा आया था. जिसने सामाजिक सांस्कृतिक सच्चाइयों को पर्दे पर उठाया।पार, दामुल , अर्द्धसत्य, बाज़ार , अंकुर, मंथन, भूमिका और मंडी जैसी फ़िल्में पर्दे में उतरीं और लोगों ने जीवन के उन क्षेत्रों को सेल्यूलाइट रूप में विकसित होते हुए सिनेमा के पटल पर देखा भी। यहाँ बाज़ार का अघोरी संसार नहीं था। महात्मा गांधी पर बनी रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म गांधी (1982) का उल्लेख ज़रूरी है। जो उनके जीवन पर बनी बायोपिक है। जिसमें गांधी का रोल बेन किंग्सले ने किया था।जिसे आठ ऑस्कर मिले थे।
सिनेमा के बारे में आप हड़बड़ी में बातें नहीं कर सकते।बहुत गंभीर कला है यह। बाज़ार बहुत निर्मम होता है और अच्छी खासी कहानियों और उपन्यासों की मूल आत्मा और भावनाओं तक को कुचल देता है। चंद्रधरशर्मा गुलेरी ‘ उसने कहा था ‘ कहानी की जो दुर्गति हुई, जितना उसने दर्शकों को निराश किया वो सभी को पता है।अच्छी खासी फ़िल्में शीघ्र ही सिनेमा घरों से उतर जाया करती हैं क्योंकि वो मसाला और मनोरंजन फ़िल्में नहीं होतींं। जीवन का यथार्थ बड़ा कड़वा सच होता है।राज कपूर की फ़िल्म ‘ मेरा नाम जोकर’ यह हश्र देख चुकी है। जिसमें राज कपूर जैसा आदमी कंगाल हो गया था लेकिन वही फ़िल्म अब बार- बार दर्शकों को संवेदित करती है और देखी जा रही है। उसे देखते हुए मुझे हमेशा महान कलाकार चार्ली चैप्लिन याद आते रहे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। रिचर्ड एटनबेरो की गांधी पर बनी फिल्म को कौन भूल सकता है।
समानांतर सिनेमा ने प्रायः बाज़ार की हदबंदियां तोड़ी थी,लेकिन उस दौर में जीवन की जद्दोजहद, मुश्किलात ,हक़ीक़तों ,जटिलताओं को प्रत्यक्ष और जीवंत किया था।तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम क्लैसिक फ़िल्म है । अभिनय क्या होता है?उसमें काम करने वाले कलाकारों जैसे राजकपूर, वहीदा रहमान और अन्य को देखकर लगता है।उसी तरह आर. के .नारायण लिखित गाइड भी जो अंग्रेजी में सफल नहीं हो पाई लेकिन हिंदी में अविस्मरणीय हो गई।एक ऐसी ही फ़िल्म है। गर्म हवा, पा ,मिर्च मसाला, बैंडिट क्वीन, गंगाजल, ब्लैक, थ्री ईडियट, लगान, सावन को आने दो , पान सिंह तोमर जैसी फिल्में मानक हैं।अमृता प्रीतम द्वारा लिखित पिंजर हिंदी में भी बनी और पाकिस्तान में घुग्गी नाम से सीरियल में भी आई। वो भारत विभाजन की त्रासदी पर है।और अनुभवों की आँच में तपकर आई है।तमस (भीष्म साहनी)की फ़िल्म नहीं बल्कि चौदह किश्तों में निर्मित अद्भुत धारावाहिक है। ‘ भारत एक खोज ‘ भी फ़िल्म नहीं आँखें खोल देने वाला जीवंत सीरियल है।सत्यजित रे, ऋत्विक घटक, श्याम बेनेगल, और मणि कौल को कौन भूल सकता है। जिक्र अनेक फ़िल्मों का किया जा सकता है। दो बीघा ज़मीन, आवारा, जागते रहो, मुगले आज़म, प्यासा, काग़ज़ के फूल आदि। अनुभव, मोहन जोशी हाज़िर हो, आनंद, भुवन शोम, आदि। पश्चिमी संसार की कुछ अद्भुत फ़िल्में हैं उसी तरह भारतीय भाषाओं की अद्भुत भूमिका है।
प्रेमचंद की गोदान असफल फ़िल्म है लेकिन सत्यजित रे ने सवा सेर गेहूँ, सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी जैसी उल्लेखनीय फ़िल्में प्रेमचंद की कहानियों पर बनाईं हैं।जो सामाजिक ताने- बाने को तार – तार करती हैं. और जीवन यथार्थ को समझने में भरपूर मदद करती हैं. मोहन राकेश की कहानी पर बनी ‘ उसकी रोटी, जिसे मणि कौल ने बनाया था।उसी तरह 1981 में ‘ कला फ़िल्म चक्र ‘ आई थी जो गरीबी के भयावह रूप को गंभीरता और ईमानदारी से दिखाती है। पुरानी फ़िल्म ‘ मदर इंडिया’ को स्मरण कर रहा हूँ जो अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो की मदर इंडिया पर बनी क्लासिक फ़िल्म थी। जो हमारे सामाजिक सांस्कृतिक सच्चाइयों की आईना कही जा सकती है।
किताबों पर कई फ़िल्में बनी हैं ‘ कोहबर की शर्त ‘ पर नदिया के पार और हम आपके हैं कौन है।जो उपन्यास से अलग रुख अपनाती हैं। भारी टूट फूट के साथ।गुनाहों का देवता पर बनी फ़िल्म एक थी सुधा एक था चन्दर। लेकिन वो उथली फ़िल्म है।फ़िल्में तो व्यावसायिक किताब पर बनी थी जिसकी आकांक्षा बाज़ार की खनक थी जैसे गुलशन नंदा की कटी पतंग, सांवली रात से प्रेरित पत्थर के सनम और नील कमल।खिलौना और शर्मीली आदि।निर्देशक की समझ बाज़ार को कैसे साधने में सफल हो सकती है। यह इनसे देखा समझा जा सकता है।
कुछ आर्ट फ़िल्मों की चर्चा ज़रूरी है जो प्रायः कम देखीं गईं हैं और व्यावसायिक सिनेमा की तरह चर्चित भी नहीं हुईं।ये मसाला फिल्में नहीं थी. जैसे मुक्तिबोध की कई रचनाओं पर आधारित ‘ सतह से उठता आदमी, विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास पर बनी फ़िल्म नौकर की कमीज़। उसी प्रकार कई वर्षों तक सेंसर बोर्ड से टकराकर बाहर आई काशीनाथ सिंह की चार पाँच रचनाओं पर आधारित मोहल्लाअस्सी।उनका मूल उपन्यास काशी का अस्सी रह गया. नई फ़िल्में जिनको याद कर रहा हूँ जैसे भेजा फ्राई, विक्की डोनर, ए वेडनेस डे ।
व्यवसायीकरण ने अच्छी कृतियों को औंधा कर दिया और निर्देशकों ने उससे तिजोरियां भर लीं।अक्सर ऐसा होता है कि अच्छी कहानियों उपन्यासों पर फ़िल्में तो बनती हैं लेकिन उनका कथ्य सुविधानुसार बदल दिया जाता है।यह सब कुछ विस्तृत बाज़ार के कारण ही होता है. फ़िल्में अब भी अच्छी बन रही हैं लेकिन उनसे गाँव क़स्बे और जीवन यथार्थ लगभग गायब हो रहा है जैसे हमारे लेखन से प्रायः लुप्त और गुप्त हो रहा है।
अब फ़िल्मों की भूमिकाएं बदल रही हैं।सरकारें अपने प्रचार- प्रसार और विज्ञापनों के लिए भी फिल्मांकन कराती हैं जिसमें एकदम फ्राड और झूठ पलते हैं।खैर, अनेक महान फ़िल्में हैं और भारतीय भाषाओं में बनी बेजोड़ फ़िल्में भी। जो मेरी स्मृति में घिरा वही चीज़ें यहाँ हैं।
डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी
MO- 7987921206



