आस क्या विश्वास क्या, सोचें कहाँ तक \ गीत - rashtrmat.com

आस क्या विश्वास क्या, सोचें कहाँ तक \ गीत

राम रक्षा मिश्र विमल के गीत जीवन की अनिश्चितताओं, पीड़ा और संघर्ष के बीच मनुष्य की जिजीविषा को व्यक्त करता है। दर्द, भ्रम और टूटते भरोसों के बीच भी आशा और साहस की लौ जलती दिखाई देती है।कवि ने संवेदना, तर्क और आत्ममंथन को सुंदर बिंबों में पिरोया है।

आस क्या विश्वास क्या, सोचें कहाँ तक

आस क्या विश्वास क्या, सोचें कहाँ तक
क्या मिलेगा या बचेगा, सब अनिश्चित।

जिस जलन को चाहिए थी मेडिसिन
छटपटाहट, दर्द ही उसका वतन
वेदना है भेदती गहराइयों में
आँसुओं से हो रही कुछ कम जलन
चपल है संवेदना चातुर्य पूरित
प्रेम की करता सवारी व्यक्ति का हित।

जो मिला पथ पर कभी तो छूटना है
हर भरोसे का सुनिश्चित टूटना है
स्वप्न आँखों में मगर है नींद विचलित
दर्द को भी हर समय क्यों रूठना है
भाव से ही दर्द, फिर भी मन न छोड़े
सुखद भ्रम का उलझना ही बन गया हित।

राह में काँटे मिले, पग भी छिले हैं
अर्थ बदले धूप-छाया के नए हैं
हार से सीखा पुनः उठना सँभलना
ठोकरों में गढ़ चले स्वर नित नए हैं
हर कदम संघर्ष से घिसता हुआ यह
फुसफुसाता मन करे क्या और अर्जित।

रात काली थी, सितारे दूरियों पर
प्रश्न मन में, उत्तरों के शोर बाहर
भाग्य की हर रेख में रूठी हुई जय
साहसी मन तर्क देता हम न कायर
सुदृढ़ निश्चय से भिड़ी जब भी विपद हो
काल का अवरोध बनता मन सुचिंतित।

जब बुलाया दर्द ने, मन रुक न पाया
सच कहूँ तो मौन ने ही पथ दिखाया
भीड़ स्मृतियों की, भिंगोते मन नयन अब
निर्णयों ने बिन समय खोए जगाया
समय में ठहराव कैसा, गति बदलकर
चल पड़ा मन छूटते अब बिंदु गर्हित।

GEET

– रामरक्षा मिश्र विमल
 rmishravimal@gmail.com 

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