क्यों देती हैं सुकून बदला लेने वाली फिल्में - rashtrmat.com

क्यों देती हैं सुकून बदला लेने वाली फिल्में

राष्ट्रमत न्यूज,मुंबई(ब्यूरो)। ग़जनी’ फिल्म में जब संजय सिंहानिया ग़जनी को मारता है तो हमें सुकून मिलता है कि कल्पना की मौत का बदला पूरा हुआ? ‘शोले’ में जब गब्बर मरता है तो तालियां गूंज उठती हैं।‘कहानी’ फिल्म में जब विद्या बागची अपना नकली पेट निकालती है तो हम सब सन्न रह जाते हैं और क्लाईमैक्स हमें अंदर तक सुकून पहुंचाता है।परदे पर बदला सुकून देता है, क्योंकि वहां दर्द दो घंटे में खत्म हो जाता है। असल जिंदगी में दर्द का कोई इंटरवल नहीं होता… वहां रिवेंज नहीं, हीलिंग ही असली जीत होती है।

बदला लेने वाली फिल्मों का मनोविज्ञान

‘बदलापुर’ हो या ‘सिंघम’ या फिर ‘एक विलेन’… जब-जब अन्याय का बदला लेते हम एक्टर्स को परदे पर देखते हैं राहत की सांस लेते हैं। कभी नोटिस किया है कि इसकी वजह क्या हो सकती है?क्या हमें जस्टिस पसंद है या फिर रिवेंज का थ्रिलर… चलिए समझते हैं बदला लेने वाली फिल्मों का मनोविज्ञान।

सिनेमा हमें तुरंत क्लोजर देता है

हम इंसान प्राकृतिक रूप से न्याय चाहते हैं, जहां रियल लाइफ में जस्टिस डिले होता है, सालों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने के बाद भी न्याय नहीं मिल पाता है… लोग धोखा देकर आगे बढ़ जाते हैं, हमारा फायदा उठाकर हमें अकेला छोड़ जाते हैं… वहीं सिनेमा हमें तुरंत क्लोजर देता है। जिससे हमारे दिमाग को सुकून मिलता है।हमारा दिमाग अधूरी कहानियां बर्दाश्त नहीं कर पाता। उसे क्लोजर चाहिए और सिनेमा वही देता है। इसी वजह से कई बार ओपन एंडिंग वाली फिल्में हमारे दिमाग को लंबे समय तक परेशान करती रहती हैं।

हम सब संतुष्ट हो जाते हैं

हमारे साथ जीवन में कई बार बहुत अन्याय होते हैं मगर – सिस्टम, दबाव या फिर सम्मान की वजह से हम अपना गुस्सा सीधे एक्स्प्रेस नहीं कर पाते हैं, जब हीरो बदला लेता है, हम कैथार्सिस महसूस करते हैं – यानी दबा हुआ गुस्सा सुरक्षित तरीके से बाहर निकल जाता है।‘बदलापुर’ में जब रघु अपनी पत्नी और बच्चे की मौत का बदला लेता है तो हम सब संतुष्ट हो जाते हैं।फिल्मों में जब हीरो विलेन को सजा देता है तो हमें लगता है कि दुनिया बैलेंस हो गई। ‘रंग दे बसंती’ में जब करप्ट नेताओं से देश के युवा बदला लेते दिखते हैं तो हमें लगता है कि सिस्टम साफ हो गया, हमें जस्टिस मिल गया।

ओटीटी ने डार्क कंटेंट को स्पेस दिया

हिंदी सिनेमा में बदला लेने वाली फिल्में लंबे समय से चलती आ रही हैं, ‘शोले’, ‘खून भरी मांग’, ‘त्रिशूल’, ‘दीवार’ ये सारी फिल्में हीरो/हीरोइन के बदले की ही कहानी है, लेकिन मॉडर्न सिनेमा में रिवेंज का तरीका बदल चुका है। क्योंकि अब विलेन कोई एक इंसान नहीं बल्कि सिस्टम या फिर खुद हमारी सोच होती है।अब सोसायटी में फ्रस्टेशन बढ़ चुका है, सिस्टम पर लोगों का भरोसा कम हो रहा है। इसके अलावा ओटीटी ने डार्क कंटेंट को स्पेस दिया है।

वो सुकून परमानेंट हो…

परदे पर रिवेंज देखना आसान है, क्योंकि वहां लार्जर दैन लाइफ हीरो के लिए सही-गलत के बीच की लाइन धुंधली पड़ जाती है। मगर रियल लाइफ में ऐसा होना जरूरी नहीं है। ‘बाज़ीगर’ में जब बदला लेने के लिए अजय शर्मा, सीमा को मार देता है तो वहां रिवेंज सिर्फ जस्टिस नहीं इगो और ऑब्सेशन बन जाता है।हम रियल लाइफ में ‘बाज़ीगर’ की तरह किसी से बदला नहीं ले सकते हैं… ना ही ‘बदला’ के बादल गुप्ता की तरह चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी कराकर रिवेंज ले सकते हैं… और मान लो हमने किसी से बदला ले भी लिया तो शायद उस वक्त सुकून मिल जाए लेकिन जरूरी नहीं कि वो सुकून परमानेंट हो… बदला लेने के भी अपने नुकसान होते हैं।सिनेमा रिवेंज को ग्लोरिफाई करता है मगर रियल लाइफ में क्लोजर और हीलिंग अलग प्रोसेस है।

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