अर्चना त्यागी की कहानी ‘रॉकेट वाला’ मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। प्रतिभा किसी धर्म या आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। मेहनत, दृढ़ संकल्प और वैज्ञानिक सोच से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। त्योहार खुशियाँ बाँटने और आपसी प्रेम बढ़ाने का अवसर हैं, जो धर्म की सीमाओं से परे हैं।
रॉकेट वाला\ कहानी
” कई दिनों से बीस रुपए ही मिल रहे हैं, सुबह शाम अखबार बेचकर। दीवाली पर पटाखे कैसे खरीदेंगे इस बार?” यही सोच सोचकर परेशान थी बच्चों की एक टोली। सब अपनी अपनी राय दे रहे थे लेकिन कोई उचित रास्ता नहीं दिख रहा था। कुछ बच्चों ने समस्या को ख़त्म करने के इरादे से कहा,” दीवाली तो हिंदुओं का त्यौहार है। हम क्यों उसे मनाने के लिए इतने परेशान हो रहे हैं ? ईद पर ही पटाखे चलाएंगे तब तक और भी पैसे इकट्ठे हो जायेंगे” बात सही भी थी। वे सभी गरीब बच्चे मुस्लिम बस्ती में रहते थे। दूसरे बच्चों के जैसे उनके अच्छे घर नहीं थे। परिवार के सदस्य मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। बच्चे भी छोटे मोटे काम करके थोड़े बहुत पैसे कमा लेते थे और अपने परिवार का खर्च चलाने में मदद करते थे। अब्दुल उनमें सबमें ज्यादा होशियार था। दिन में काम भी खूब करता था और शाम को स्कूल भी जाता था। सुबह सुबह जब सभी बच्चे सोए रहते अब्दुल जल्दी उठता और अब्बू की साइकिल पर चढ़कर अखबार बांटकर आता। रोज बीस रुपए कमा लेता लेकिन सभी रुपए अपने पिता को दे देता। घर में कई भाई बहन थे, घर खर्च में पिता को मदद मिल जाती। पटाखे खरीदने और उन्हें चलाने का उसे बड़ा शौंक था। जबसे पटाखों की दुकानें सजती, बाजारों में दीपोत्सव की रौनक बढ़ती वह सपने बुनने लगता। हर रोज़ ज्यादा मेहनत करता और पैसे बचाने की कोशिश करता जिससे पटाखे खरीद सके। पिछले हफ्ते बहन बीमार हो गई तो बचाए हुए पैसे मां के हाथ में रख दिए। इस हफ्ते सोमवार से ही कोशिश शुरू कर दी। जल्दी उठना और तय संख्या से अधिक घरों में अखबार वितरित करना। हर दिन पांच रुपए अतिरिक्त कमाए और गुल्लक में डालता रहा कि दीवाली से पहले दिन अपनी पसंद के पटाखे खरीद पर चलाऊंगा। पूरी टोली उत्साहित थी। गरीब दोस्त पैसे से तो मदद नहीं कर सकते थे लेकिन हौंसला खूब बढ़ाते रहे थे। उन्हे पता था कि चलाने लायक पटाखे नहीं खरीद पाएंगे लेकिन अपने दोस्त को चलाते हुए देखना भी उन्हें रोमांचित कर रहा था। उत्साह और उलझन हर एक के मन में था। उलझन पैसे इकट्ठे करने की और उत्साह उनसे खरीदे पटाखे चलाने का।

त्यौहारों पर कुछ लोग अपने लिए काम करने वाले लोगों को उपहारस्वरूप कुछ सामान या पैसे भी देते थे लेकिन वो सब त्यौहार के दिन ही मिलता था, उससे पहले नहीं। इसलिए उम्मीद तो थी परंतु खुद से मांगने को ईमान तैयार नहीं था। इसी उठा पटक में पूरा सप्ताह बीत गया और टोली के पास कुल मिलाकर तीस रुपए जमा हो गए। बड़ी शान से सब के सब दुकान पर पहुंच गए। ” पटाखे खरीदने हैं।” समवेत स्वर में सबने कहा। दुकान वाले ने फुलझडियां और कुछ पटाखे सामने रख दिए। सबने एक दूसरे की ओर देखा।
” ऐसे छोटे मोटे पटाखे नहीं, रॉकेट चाहिए रॉकेट।” अब्दुल ने सबसे आगे बढ़कर कहा। ” रॉकेट तो महंगा है, तुम नहीं खरीद पाओगे।” कहकर दुकान वाला दूसरे लोगों को सामान देने लगा। ” मेरे पास भी पैसे हैं। पैसे देकर ही रॉकेट खरीदूंगा। बताओ तो कितने का है रॉकेट।” अब्दुल ने ऊंची आवाज़ में कहा। दुकान वाला पास में आकर बोला ,” पचास रुपए का एक है। पैसे हैं तो लाओ और जितने चाहो ले जाओ।” अब्दुल का चेहरा उतर गया। तुरंत जवाब नहीं दे पाया। दुकान वाले को दूसरी ओर मुड़ते देखकर थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोला ,” तीस रुपए अभी दे सकता हूं। बाकी के दीवाली के तुरंत बाद देकर जाऊंगा।”
दुकान वाला हंसकर बोला,” मैंने तो पहले ही कहा था, तुम ही ज़िद पर अड़े थे। देखो भाई हमारा भी त्यौहार है, कुछ मुनाफा हमें भी कमाना है। और त्यौहार पर कोई उधारी नहीं चलती।” दुकान वाले की दो टूक बात सुनकर बच्चे दुकान से बाहर आ गए। सबके सब मायूस थे। दूसरे बच्चों को अपने माता पिता के साथ पटाखे खरीदते हुए देख रहे थे। अब्दुल कुछ सोच रहा था। बिना कुछ कहे फिर से दुकान पर चला गया। ” देखो चाचा, रॉकेट नहीं दे सकते हो तो तीस रुपए के सस्ते पटाखे दे दो।” दुकान वाला फिर से हंस पड़ा ,” तुम तो रॉकेट खरीदने आए थे फिर अब सस्ते पटाखे क्यों मांग रहे हो? मेरा इतना समय बरबाद कर दिया।” उसने इशारा किया और दुकान पर काम करने वाला एक छोटा बच्चा पटाखे का डब्बा उठा लाया। अब्दुल ने तीस रुपए देकर वो डब्बा खरीद लिया। बच्चे वापिस चल दिए। पटाखे मिलने की खुशी तो थी लेकिन रॉकेट नहीं खरीद पाने का मलाल भी था। ” क्यों उदास हो तुम सब ? पटाखों के बारूद से मैं खुद एक रॉकेट बनाऊंगा। इस दीवाली पर रॉकेट ही चलाएंगे।” बच्चों के चेहरे पर रौनक लौट आई। सबने एक दूसरे से हाथ मिलाया और मोहल्ले के बाहर बने चबूतरे पर आकर बैठ गए। सबने मिलकर पटाखे तोड़कर बारूद बाहर निकाल लिया। अब्दुल पिछले साल चलाया हुआ एक रॉकेट उठाकर लाया जिसे उसने संभालकर रखा था कि उसके जैसा नया खरीद लायेगा। सारा बारूद उसमें भर दिया। एक पतला कागज लपेटकर उसे चिपका दिया ताकि बारूद बाहर नहीं निकल पाए।

दीवाली की जगमगाहट से शहर रोशन था। गली, मोहल्ले घर, दुकान और सड़कें रोशनी से नहाए हुए थे। शाम से ही पटाखों की आवाज़ आनी शुरू हो गई थी। बच्चे खुश होकर आकाश में ऊंचे उठते हुए धुंए को देख रहे थे। एक रॉकेट था जो उस दीवाली पर सबसे अधिक ऊंचाई तक उठा था और सबसे अधिक देर तक जिसका बारूद जला था वो अब्दुल का बनाया हुआ रॉकेट था जो उसने अपने दोस्तों की मदद से बनाकर उसी चबूतरे पर बैठकर चलाया था। उस दिन किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं गया लेकिन सालों बाद जब उसने मिसाइल बनाई तब पूरी दुनिया ने उसे देखा और भारत के महान वैज्ञानिक को सलाम किया। गरीब मुस्लिम बस्ती में रॉकेट बनाने वाला कोई और नहीं मिसाइल मैन डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम ही थे जिन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिक परीक्षणों से दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया। कठिन परिश्रम और खुद पर भरोसा रखने से असंभव भी संभव हो जाता है। धर्म कोई भी हो यदि वो मिसाइल बनाने की प्रेरणा देता है तो उससे बेहतर कौन सा धर्म है ? त्यौहार किसी का भी हो अगर वो जीवन को रोशन करता है तो हर रोज़ उसे मना लेना चाहिए।

अर्चना त्यागी
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