अम्मर बाई कथे’: कहावतों और जीवन-दर्शन का काव्य\किताब समीक्षा - rashtrmat.com

अम्मर बाई कथे’: कहावतों और जीवन-दर्शन का काव्य\किताब समीक्षा

लोकभाषा की मिठास, अनुभव की गहराई और सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य समेटे केदार दुबे की कृति ‘अम्मर बाई कथे’ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और समकालीन जीवन का सशक्त काव्यात्मक दस्तावेज है।

अम्मर बाई कथे’: कहावतों और जीवन-दर्शन का काव्य\किताब समीक्षा

छत्तीसगढ़ के लोकजीवन ने अपनी सहजता, अनुभव और जीवन-दृष्टि के आधार पर अनेक कहावतों और मुहावरों को जन्म दिया है। ये कहावतें केवल बोलचाल का हिस्सा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित अनुभवों की अनमोल धरोहर हैं। इनमें जीवन की सीख है, विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा है और सही मार्ग चुनने का विवेक भी। अनुभव की कसौटी पर खरी उतरी ये लोक उक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं। प्रत्येक कहावत अपने भीतर एक दृश्य, एक प्रसंग और एक गहरा जीवन-दर्शन समेटे हुए है।

कवि केदार दुबे की कृति ‘अम्मर बाई कथे’ इसी लोकपरंपरा की भावभूमि पर रची गई ऐसी काव्यकृति है, जो छत्तीसगढ़ के सहज, सरल और यथार्थपरक जीवन को उसकी मौलिकता के साथ प्रस्तुत करती है। इसमें लोकानुभव, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक दृष्टि और समकालीन जीवन की विसंगतियाँ एक-दूसरे से जुड़कर अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति पाती हैं।

कवि की विशेषता यह है कि वे लोकभाषा के प्रचलित कथ्यों को केवल दोहराते नहीं, बल्कि उनके माध्यम से जीवन की जटिलताओं को समझने का रास्ता भी दिखाते हैं। उनकी पंक्तियों में छत्तीसगढ़ी जनजीवन की सहज लय है, अनुभवों की गहराई है और मनुष्य को भीतर तक झकझोर देने वाली संवेदना भी।

मोह-माया के बीच विवेक का संदेश

जीवन की आपाधापी में मनुष्य अनेक बार मोह-माया के जाल में उलझकर अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है। ऐसे में लोकानुभव से उपजा विवेक उसे सावधान करता है। कवि इसी भाव को इन पंक्तियों में अभिव्यक्त करते हैं—

“बिच मझधार मा चतुरा खेलत भंवना बूड़ जाबे

मोह माया के बाँधना बंधे.राम रमैया कहाँ ले गाबें।”(पृष्ठ 10)

इन पंक्तियों में जीवन को मझधार में फँसी नाव की तरह देखा जा सकता है। मनुष्य यदि समय रहते अपनी स्थिति को नहीं समझता और मोह-माया के बंधनों में उलझा रहता है, तो उसके लिए जीवन की चुनौतियों से पार पाना कठिन हो जाता है। यह कथ्य केवल धार्मिक या आध्यात्मिक चेतावनी नहीं है, बल्कि अपने विवेक को जाग्रत रखने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानने का संदेश भी है।

विपत्ति में विवेक की परीक्षा

विपरीत परिस्थितियाँ मनुष्य के धैर्य और विवेक की परीक्षा लेती हैं। संकट के समय कई बार बुद्धि साथ छोड़ देती है और व्यक्ति ऐसी भूल कर बैठता है, जिसकी कल्पना सामान्य परिस्थितियों में नहीं की जा सकती। कवि इस मनोवैज्ञानिक सत्य को रामायण के प्रसंग से जोड़ते हुए कहते हैं—

“बिपत आय के बेरा मति धलो नंदा जाथे

सोन के मिरगा बरराम असन मोहा जाथे।”(पृष्ठ 17)

स्वर्णमृग के आकर्षण में पड़ने का प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि विपत्ति और मोह के सम्मिलित प्रभाव में विवेकशील व्यक्ति भी भ्रमित हो सकता है। कवि लोकानुभव के सहारे इस गहरी बात को सहज शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। इन पंक्तियों का संदेश है कि कठिन समय में धैर्य बनाए रखना और निर्णय लेने से पहले परिस्थितियों को समझना अत्यंत आवश्यक है।

चंपा की व्यथा और उपेक्षा का यथार्थ

प्रकृति में प्रत्येक फूल की अपनी सुंदरता और विशिष्टता होती है। फिर भी आकर्षण की दुनिया में कुछ रंग और रूप अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं, जबकि कुछ अपनी खूबियों के बावजूद उपेक्षित रह जाते हैं। कवि ने चंपा के माध्यम से इसी विडंबना को स्वर दिया है—

“चंपा के फुलवा मां रूप रंग बस होथे

कोनो पुछारी नइये कहिके मने मन रोथे।” (पृष्ठ 19)

चंपा का फूल अपनी सुंदरता और सुगंध के बावजूद उपेक्षित होने की पीड़ा अनुभव करता है। इन पंक्तियों में प्रकृति का चित्रण करते हुए कवि मानवीय समाज की उस प्रवृत्ति पर भी संकेत करते हैं, जहाँ बाहरी आकर्षण और लोकप्रियता को अधिक महत्त्व मिलता है।

चंपा की यह व्यथा केवल एक फूल की पीड़ा नहीं रह जाती। वह उन लोगों का प्रतीक बन जाती है, जिनमें गुण और प्रतिभा तो हैं, लेकिन जिन्हें उचित पहचान नहीं मिलती। इस प्रकार प्रकृति का एक साधारण-सा दृश्य सामाजिक यथार्थ का मार्मिक रूपक बन जाता है।

बदलते समय का फैशन और लोकजीवन

समय के साथ जीवनशैली, पहनावे और सामाजिक व्यवहार में बदलाव स्वाभाविक है। लेकिन जब बाहरी दिखावे की होड़ अपनी सांस्कृतिक सहजता पर हावी होने लगे, तब वह व्यंग्य का विषय बन जाती है। कवि बदलते परिवेश को इन पंक्तियों में रेखांकित करते हैं—

“ऐ जमाना के चाल चलन देख तो मुसकुल होगे

जिंस-सर्ट पहिर के फुलकैना चमकुल होगे।”(पृष्ठ 32)

इन पंक्तियों में आधुनिक पहनावे और बदलती जीवनशैली पर लोकभाषा के माध्यम से व्यंग्य किया गया है। कवि की दृष्टि में बदलाव मात्र समस्या नहीं है; चिंता तब पैदा होती है, जब दिखावे की प्रवृत्ति व्यक्ति की सहजता और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने लगती है।

छत्तीसगढ़ी शब्दों की चुटीली अभिव्यक्ति इन पंक्तियों को प्रभावशाली बनाती है। यही लोकभाषा की ताकत है कि वह गंभीर सामाजिक टिप्पणी को भी सहज हास्य और व्यंग्य के माध्यम से पाठक तक पहुँचा देती है।

कबीर की वाणी और समाज का आडंबर

संत कबीर ने अपने समय में धार्मिक आडंबर, पाखंड और सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते हुए मनुष्य को सत्य तथा सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी। उनकी वाणी आज भी समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि उपदेश सुनने और उन्हें जीवन में उतारने के बीच की दूरी आज भी बनी हुई है।

कवि इसी विरोधाभास को सामने रखते हुए कहते हैं—

“कबीर साहेब घरे लुवाठी कहते कहत रेंग दिहिस

फेर वाह रे ऐ दुनिया न तो मानिस ने चलित।”(पृष्ठ 36)

इन पंक्तियों में कबीर की वैचारिक परंपरा और समाज के आचरण के बीच का अंतर उजागर होता है। सत्य और सदाचार की बातें करना आसान है, लेकिन उन्हें अपने जीवन में अपनाना कठिन। कवि का व्यंग्य इसी दोहरेपन पर केंद्रित है।यह कथ्य हमें सोचने के लिए विवश करता है कि समाज में परिवर्तन केवल महान विचारों को सुनने या उनका गुणगान करने से नहीं आता। उसके लिए उन विचारों को व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है।

पश्चिमी प्रभाव और पर्यावरण की चिंता

कवि की दृष्टि केवल सामाजिक व्यवहार और आध्यात्मिक चेतना तक सीमित नहीं है। वे प्रकृति, पर्यावरण और बदलती जीवनशैली के बीच के संबंधों को भी गंभीरता से देखते हैं।पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव, खानपान में आए बदलाव और स्थानीय पर्यावरण के प्रति बढ़ती उपेक्षा पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं—

“विदेशी मन चाय लान केआँत मा अंगरा धरागिस

मेड़ो तीर पैडगरी बिच गाजर घास गॅजागिस।”(पृष्ठ 45)

इन पंक्तियों में कवि ने विदेशी प्रभाव और स्थानीय पर्यावरण में फैलती गाजर घास को एक साथ रखकर व्यंग्यात्मक अर्थ रचा है। चाय के प्रचलन का उल्लेख बदलती जीवनशैली की ओर संकेत करता है, जबकि खेतों की मेड़ों और पगडंडियों पर फैलती गाजर घास पर्यावरणीय असंतुलन की ओर ध्यान खींचती है।

यहाँ कवि का सरोकार किसी एक पेय या संस्कृति के विरोध तक सीमित नहीं है। इन पंक्तियों को व्यापक संदर्भ में देखें तो वे स्थानीय जीवन-पद्धति, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी बदलती दृष्टि पर सवाल उठाती हैं। विकास और आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति के साथ हमारे संबंध किस तरह बदल रहे हैं, यह चिंता उनकी अभिव्यक्ति में स्पष्ट दिखाई देती है।

भाषा में लोक की मिठास, कथ्य में जीवन की गहराई

‘अम्मर बाई कथे’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहज, ठेठ और प्रवाहमान छत्तीसगढ़ी भाषा है। कवि ने लोकजीवन में प्रचलित शब्दों, कहावतों, मुहावरों और सांस्कृतिक प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया है कि कविता पढ़ते हुए पाठक अपने आसपास के जीवन के दृश्यों से जुड़ने लगता है।

यहाँ भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने का साधन भी है। लोकभाषा की मिठास के साथ जीवन के यथार्थ और आध्यात्मिक चिंतन को जोड़ना कवि की रचनात्मक उपलब्धि है।

कृति में सामाजिक विसंगतियों, आडंबर, बदलती जीवनशैली और पर्यावरणीय संकट पर व्यंग्य के साथ चेतावनी का स्वर भी सुनाई देता है। कवि अनेक बार प्रकृति के साधारण दृश्यों और लोक में प्रचलित कथ्यों के सहारे ऐसी बातें कह जाते हैं, जो पाठक को अपने जीवन और समाज पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।

कुछ स्थानों पर प्रतीकात्मकता भावों को सघन बनाती है। हालाँकि, कहीं-कहीं कथ्य की स्पष्टता और अधिक होती तो अभिव्यक्ति का प्रभाव बढ़ सकता था। फिर भी लोकजीवन की सूक्ष्मताओं को सरल, सहज और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करना इस कृति का महत्त्वपूर्ण गुण है।

परंपरा और समकालीन चेतना का संगम

‘अम्मर बाई कथे’ छत्तीसगढ़ी लोकपरंपरा और समकालीन सामाजिक चिंताओं के बीच एक सार्थक संवाद स्थापित करती है। इसमें कहावतें केवल अतीत की स्मृतियाँ बनकर नहीं आतीं, बल्कि वर्तमान जीवन को समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं। लोकानुभव से उपजा जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक व्यंग्य और पर्यावरण के प्रति चिंता इस कृति को बहुआयामी बनाते हैं।

कवि केदार दुबे ने लोकभाषा के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि जीवन की गहरी बातें कहने के लिए कठिन शब्दावली या जटिल शिल्प की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी लोकजीवन में प्रचलित एक सहज कथन ही मनुष्य को उसके व्यवहार, विवेक और सामाजिक दायित्वों का बोध करा देता है।‘अम्मर बाई कथे’ छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की जीवंतता, अनुभव की प्रामाणिकता और सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति करने वाली एक पठनीय तथा विचारोत्तेजक कृति है।

अम्मर बाई कथे’ कवि केदार दुबे 

ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन,नवी बाग, भोपाल

मूल्य 200 रूपये, पृष्ठ 72

रविन्द्र गिन्नौरे

MO-9300233707

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