कैसे-कैसे दु:ख' - rashtrmat.com

कैसे-कैसे दु:ख’

रश्मि लहर की कैसे कैसे दुख कथा बहुत मार्मिक है। ऐसी कहानियाँ समाज में रोज घटती हैं,बस लिखी नहीं जातीं। यह कथा सिर्फ दो औरतों की नहीं,मनुष्य के भीतर बैठे अहंकार,असुरक्षा और देर से जागी पश्चाताप,बुद्धि की कहानी है। सबसे बड़ा शोक मृत्यु नहीं,अनकहे प्रेम और अनमांगी क्षमा का रह जाना होता है। इसे पढ़ें और महसूस करें, कहीं आप के घर में भी तो ऐसा नहीं हो रहा है।

                                                         कैसे-कैसे दु:ख’ \ कहानी

 मन्दिर चलना है “

रूपा ने धीरे से किशोर से कहा ।

“क्या ?” चौंकते हुए किशोर ने पक्का करना चाहा कि वो जो सुन रहा है क्या वास्तव में सही है!

“जी, मुझे मन्दिर जाना है, चलिए”।

“ओह” मन ही मन खुशी से पगलाया किशोर विवाह के बीस वर्षो बाद अपनी नास्तिक पत्नी को मन्दिर ले जाते समय थोड़ा सशंकित रहा कि कहीं वो रास्ते में रोक न दे।

पर नहीं, रूपा ने प्रसाद लिया, मूर्ति के सामने पहुँचकर ऑंचल सर पर लिया और माथा टेककर फूट-फूट कर रो पड़ी।

किशोर की कुछ समझ में नहीं आ रहा था।  पुजारी ने धीरे से उसके माथे पर मोरपंखी वाला पंखा छुआया।

पीछे से किशोर ने उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा-“क्या हुआ रूपा सब ठीक तो है न ?”

“मुझे माफ कर दो किशोर ! मैंने जीजी को घर से निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी!”

“क्या हुआ रूपा ?  ऐसा क्यों कह रही हो तुम?”

रूपा का एक नया रूप देख कर किशोर थोड़ा असमंजस में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ तो कल  रूपा अपनी पतली-पतली कलाईयों को रंग-बिरंगी चूड़ियों से सजा रही थी। उसके गुदाज-गोरे हाथों पर मेहंदी का सुर्ख़ रंग देखकर किशोर उन्हें अपने हाथों से छुपाए बैठा-बैठा रूपा के चेहरे पर अपने प्रेम की ललाई देख भावविभोर हो रहा था, कहा आज रूपा इस अवस्था में? हे भगवन्! क्या हो गया आख़िर?” सोचते हुए किशोर ने रूपा से पूछा –

“क्यों परेशान हो तुम? तुमने नहीं निकाला उनको, वे तो स्वयं ही चली गई थीं रूपा! तुम तो उनसे अधिक बात भी नहीं करती थीं पगली!”

“यह सच नही है किशोर! मुझे बहुत ग्लानि हो रही है! कल उनकी लिखी एक चिट्ठी मुझे मिली जो वे जाते समय कुल-देवता के मंदिर के गुल्लक के नीचे रख गई थीं”

“क्या लिखा था उसमें रूपा” ? किशोर अब थोड़ा खिसिया चुका था।

“किशोर! तुम्हें याद है, अपने बेटे के जन्म के एक दिन बाद ही भाभी को मरा हुआ बेटा पैदा हुआ था? पूरे परिवार में शोक की लहर दौड़ गई  थी।”

“हाँ, मुझे सब याद है। पर भाग्य का लिखा कौन बदल सकता है रूपा!” कहते हुए किशोर मन्दिर से बाहर जाने का उपक्रम करने लगा।

“किशोर! वो मरा हुआ बेटा उनके नहीं, मेरे पैदा हुआ था ” कहते-कहते रूपा बिलख पड़ी।

“ओह ! तो वो मरा हुआ बेटा मेरा था | इतना बड़ा त्याग कर के भी भाभी चुप रहीं। कभी कुछ  जताया तक नहीं? इतना बड़ा पाप हमसे हो गया!”

“”हाँ किशोर ! और मैं उन्हें जब-तब बे-औलाद होने का ताना देती रहती थी! ”

तुम्हें नहीं पता किशोर! मैं सदैव उनको अपमानित करती रहती थी। जब उन्होने अनाथालय से ऋषिका को गोद लिया तो मैंने  अपना  पैतृक घर ‘पूरा अपना’ समझ कर उनसे घर छोड़ कर जाने के लिए कह दिया था।”

यह सब सुनकर किशोर स्तब्ध रह गया। रूपा की की बड़ी-बड़ी ऑंखें अश्रु से भरी देखकर किशोर भी रो पड़ा।

“वे गईं तो मैंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि  वे कैसे रहीं बिना दद्दा के!  उन्होने कितना कष्ट उठाया होगा किशोर” !

किशोर की आँखों से आँसू बहते रहे।

“तो इसीलिए वो मुझसे मिले बिना चली गई थीं। मुझसे वो कभी झूठ नहीं बोल पाती थी।  हाय ! इतना बड़ा पाप हो गया हमसे? चलो आज ही उनके घर चलो रूपा, मुझे उनसे माफी मांगनी है”

कहते हुए किशोर हिचकी ले कर रोने लगा।

“मैंने कभी यह जानने का प्रयास तक नहीं किया कि दद्दा की मृत्यु के पश्चात वे लखनऊ को छोड़कर  कानपुर क्यों चली गईं । वहाँ तो उनका कोई अपना भी नहीं था। मैं अपने टूरिंग जॉब में उलझता गया, बेटू के सुखद भविष्य की कल्पना में खोता रहा और इधर भाभी..उफ़! मैं इतना स्वार्थी कैसे बन गया था रूपा?

किशोर थके-थके स्वर में बोला।

“चलो रूपा! हम उन्हे लिवा कर ले आएंगें , वे  मना नहीं करेंगी, मुझे विश्वास है। वे मेरी बात अब भी नहीं टालेंगी। उन्होने मुझे सदैव पुत्रवत स्नेह दिया है।”

“अब जाने से कोई फायदा नहीं किशोर ! पिछले  वर्ष ऋषिका की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी है। जीजी को भी तो ब्लड-क़ैसर हो गया था। परसों उनका भी  देहान्त हो गया। उन्होने अपना शरीर अस्पताल को दान कर दिया था ! अस्पताल वालों का आज सुबह फोन आया था, तब मुझे यह पता चला। उनके सामान के नाम पर बस अस्पताल का यह कागज़  और यह लाकर की चाभी, एक अस्पताल के स्टाफ का लड़का दे गया था!”

कहते हुए रूपा वहीं बैठ गई।

किशोर जीवन में आए इस आकस्मिक सदमें से चेतनाशून्य सा हो गया। उसको सीने पर कुछ भारीपन लगने लगा। भाभी की ममतामयी छवि उसके समक्ष आने लगी।

चौदह वर्षीय किशोर को मनुहार कर नाश्ता देती, पढ़ाती, गायत्री मंत्र का जाप करवाती। दद्दा तो व्यवसाय में ही उलझे रहते थे। बाबू जी की सारी ज़िम्मेदारी उन्होने ओढ़ रखी थी। किशोर को अपने माँ-बाप की याद ही नहीं! जो थे बस  दद्दा थे।

किशोर अतीत की कंदराओं में विचरण करने लगा। वो अतीत, जो उसके भविष्य का निर्माता था! दद्दा के विवाह के दस वर्षों तक कोई औलाद नहीं हुई। किशोर के विवाह के बाद ही भाभी भी गर्भवती हुईं।

“और भाभी का बेटा…उफ” ! किशोर का मन फटने सा लगा था।

भारी कदमों से घर लौटे वे दोनों। वह रात आंखो में कटी।

“आखिर भाभी लाकर की चाभी क्यों दे गईं?

यही सोचते-सोचते वे दोनों सवेरे की प्रतीक्षा करने लगे थे।

दुर्घटना के बाद का दूसरा दिन बहुत व्याकुल होता है। वे दोनों दूसरे दिन ही बैंक पहुँच गए ।  किशोर भाभी के साथ का पुराना अकाउंट देखकर चकित रह गया। पुराने  ज्वाइन्ट अकाउंट में कुछ न कुछ ट्रान्जेक्शन हुआ था। एकाऊन्ट चालू था। किशोर ने काँपते हाथों  लाकर खोली। एक फाइल थी, एक डिब्बी में वे टाप्स रखे थे जो किशोर ने अपनी नौकरी लगने पर भाभी को दिए थे। एक चेन थी जो दद्दा अपने पास यह कहकर रखते थे कि वो बाबू जी की निशानी थी। एक ताबीज़, जो किशोर के बचपन का था, जिसे एक बार किशोर ने गुस्से में फेंक दिया था। और उस फाइल में शहर से बाहर की संपत्ति का पूरा ब्यौरा  लिखा था। कहाँ क्या है, सुनियोजित ढंग से सदैव की भाँति भाभी ने लिख रखा था। भाभी ने अनछुई संपत्ति को सदैव सॅंभाले रखा।

उफ ! किशोर अपनी नासमझी पर, अपने नाशुक्रे रवैये पर क्षुब्ध हो उठा। इतने बड़े शहर में, अपने बड़े से घर में, किशोर को लग रहा था वह सबसे ज्यादा अकेला व्यक्ति हो गया है। वाह अपने हाथों में अपना चेहरा छुपा कर रो पड़ा।

सहसा उसको अपने पैरों पर एक छुवन की  अनुभूति हुई। उसने देखा रूपा ज़मीन पर बैठकर “मुझे माफ़ कर दीजिए जीजी!” बुदबुदा रही थी।

”मुझे माफ कर दो भगवान ! मैंने उन्हे जाने क्या-क्या कहा और वे मेरा जीवन सॅंवारती रहीं।  मैं अभागिन ! अपनी कैलकुलेशन में लगी रही।” कहते-कहते रूपा चीख-चीख कर रोने लगी।

सब कुछ होते हुए भी आज किशोर और रूपा अपने को अपराधी मानते हुए पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे तथा अचानक मिले इस  दुःख से वे दोनों स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे थे!

रश्मि लहर

MO -7565001657

 

 

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