इंजीनियर आशा शर्मा की कहानी आगेती फसल बताती है कि डिजिटल दुनिया पर अंधविश्वास ठीक नहीं। इंटरनेट, ऐप और ऑनलाइन सेवाएं कभी भी बंद हो सकती हैं, लेकिन मां की सीख, कुछ नकद पैसे, इंसानी मदद और अपने लोगों का साथ हमेशा काम आता है।तकनीक जीवन को आसान बनाती है, लेकिन जीवन का सहारा केवल तकनीक नहीं हो सकती।
आगेती फसल\ कहानी
जिनिया को नई पीढ़ी की आगेती फसल कहा जाए तो गलत नहीं होगा.आगेती यानी समय से पहले पकी हुई.इसमें भी शायद इंटरनेट की ही उत्प्रेरक भूमिका रही होगी.उत्प्रेरक यानी वे पदार्थ जो किसी क्रिया में प्रत्यक्ष भाग नहीं लेते लेकिन उनकी उपस्थिति क्रिया को तेज कर देती है.
जिनिया की पीढ़ी के अतिरिक्त सभी ऐसा ही मानते हैं.जिनिया ने हाल ही में अपना वोटर कार्ड बनवाया है लेकिन उसका कॉन्फिडेंस लेवल किसी सात साल पुराने वोटर से कम नहीं है. इंटरनेट की मदद से पूरी तरह आत्मनिर्भर पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती जिनिया को दुनिया अपने स्मार्ट फोन जितनी छोटी लगती है.
इस छोटी सी दुनिया में इतने अजूबे हैं कि बस पूछिए मत. एक बार कोई इसमें डूबे तो फिर गहरे…और गहरे…और भी अधिक गहरे…बस डूबता ही चला जाता है. ऐसे ही किसी एक दिन इसमें डुबकी मारती जिनिया के हाथ एक अजूबा शब्द लगा “सोलो ट्रेवलिंग”.. यह शब्द जब से उसे मिला है, दिलोदिमाग में हलचल मची हुई है.सोलो यानी अकेला…अपनी मर्जी का मालिक…अपनी सल्तनत का इकलौता बादशाह…और जिनिया की पीढ़ी को तो वैसे भी अपने मामलों में किसी दूसरे का नाक घुसाना माने पोक करना पसंद नहीं है.
तो खैर! दीवाने घुमंतुओं के ट्रेवलॉग पढ़ते-पढ़ते उसे भी सोलो ट्रिप का नशा चढ़ गया. मां ने समझाने का बहुत प्रयास किया कि नए उगे पौधे बाहर की तेज धूप में मुरझा सकते है, एक बार जमीन में जड़ पकड़ लें तब उन्हें क्यारी से गमले में शिफ्ट करना ठीक रहता है लेकिन यह नई पीढ़ी जब अपने आप की ही नहीं सुनती तो फिर मां की क्या सुनती. ठान लिया सो करना ही है. ऐसे में माँ को ही खुद को समझाना पड़ेगा और वही उन्होंने किया भी. वैसे इसके अतिरिक्त कोई दूसरे चारा उनके पास था भी नहीं. हाँ, एक वहम अवश्य था कि दो-चार दिन में यह उत्साह अपने आप ही ठंडा पड़ जायेगा लेकिन उनका वहम केवल वहम ही साबित हुआ.
इधर जिनिया ने लद्दाख, केदारनाथ से लेकर अंडमान, पांडिचेरी तक सारे विकल्पों पर मंथन कर लिया.लेकिन उसे किसी का लिखा याद आया कि पहला इन्वेस्टमेंट छोटा करना चाहिए ताकि नुकसान हो तो छोटा ही हो, और इसी सिद्धांत पर अमल करते हुए उसने अपनी कल्पनाओं के पंख थोड़े से समेटे और हरिद्वार, जयपुर, शिमला आदि अपेक्षाकृत नजदीकी पर्यटन स्थलों पर विचार करने लगी. और फिर एक दिन -“मैं इस वीकेंड शिमला जा रही हूं.” जिनिया ने घोषणा की. मां घोर आश्चर्य में डूब गई.
“शहर के मार्केट में तो अकेली जा नहीं सकती, शिमला कैसे जाओगी? यहां तो सब्जी वाले से बात करने में तुम्हें पसीने आ जाते हैं, अकेली जाओगी तो जानती हो ना कितने लोगों से बात करनी पड़ती है?” मां ने उसके अंतर्मुखी होने के जिन्न को निकालकर उसके सामने खड़ा कर दिया लेकिन जिनिया के पास उसका भी ताबीज था.
“आज के समय में किसी को किसी से बात करने की जरूरत नहीं पड़ती. सब काम स्मार्ट तरीके से होते हैं.” जिनिया ने अपना स्मार्ट फोन मां के सामने लहराते हुए अपना पत्ता फेंका. मां जान गई थी कि जिनिया उस मिसाइल की तरह है जो एक बार अपने लक्ष्य को बेधने के लिए निकल पड़ी तो फिर इसका जनक भी उसे उसके लक्ष्य से विमुख नहीं कर सकता. यानी अब तय था कि जिनिया शिमला जायेगी तो बस जाएगी.
जिनिया ने अपना स्मार्ट फोन निकाला और शिमला जाने के लिए साधन तलाश करने लगी. स्मार्ट फोन ने तुरंत ही उसे बता दिया कि बस, ट्रेन, हवाई जहाज और टैक्सी जैसे तमाम साधन दिल्ली से शिमला के लिए उपलब्ध हैं. अब ये आपकी जेब पर निर्भर करता है कि आप क्या चुनते हो.
स्मार्ट जिनिया ने अपना बजट पहले से ही बना कर रखा हुआ था. उस बजट के हिसाब से टैक्सी और हवाई यात्रा के लिए फिलहाल उसकी चादर थोड़ी छोटी थी.पांव या सिर सिकोड़कर वह अपने लिए बदन दर्द का खतरा मोल नहीं लेना चाहती थी. टैक्सी तो सुरक्षा की दृष्टि से भी उसे ठीक नहीं लगी. ट्रेन की डिटेल्स देखी तो अधिकांश ट्रेन केवल चंडीगढ़ तक ही जा रही थी, उसके आगे की यात्रा के लिए फिर से किसी दूसरे साधन की तलाश करो… यानी अंधा न्यौतो और दो बुलाओ…मां चाहे कितनी भी समझे लेकिन इतनी भी नासमझ नहीं थी जिनिया. कुल मिलाकर नतीजा यह रहा कि जिनिया ने अपने लिए डीलक्स बस में एक सीट बुक करवा ली. रेड बस पर छूट का कूपन लगाने पर उसे दस प्रतिशत की अतिरिक्त छूट भी मिल गई.
जैसा कि जिनिया ने कहा था, यह सब काम उसके फोन ने स्मार्टली करवा दिए. न लाइन में लगना… ना किसी से पसंद की सीट के लिए आग्रह करना… और ना ही छुट्टे पैसों का कोई झंझट… जिनिया को इन्टरनेट के आविष्कार पर गर्व हुआ.
“शिमला में तेरे पापा के दोस्त कपूर अंकल रहते हैं. उनका नंबर और एड्रेस नोट कर ले. क्या पता क्या जरूरत पड़ जाए.” मां ने जिनिया को सुझाव दिया लेकिन इस तरह उसके आत्मविश्वास को कम आंकने वाले सुझाव जिनिया को भला कैसे पसंद आ सकते हैं?
“क्यों बिना मतलब किसी को परेशान करना.आजकल किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं होती और ना ही किसी को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में किसी का दखल पसंद आता है. और वैसे भी मेरी सारी बुकिंग हो चुकी है, एडवांस पेमेंट सहित.” जिनिया ने मां को भरोसा दिलाया लेकिन मां की तो फितरत ही अविश्वास वाली होती है. उन्होंने बिना जिनिया को बताए एक कागज पर मिस्टर कपूर का पता और फोन नंबर लिखकर जिनिया के पर्स में डाल दिया.
बस में सीट बुक करने के बाद अब जिनिया को अपने रहने की व्यवस्था करनी थी. जिनिया ने अपना अलादीन का चिराग निकाला और उसे रगड़ने लगी. चिराग वाले जिन्न ने एक से बढ़कर एक होटल और रिजॉर्ट स्क्रीन पर लाकर रख दिए. जिनिया एक-एक को देखने-परखने लगी. उसने कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ते और फ्री वाईफाई वाले होटल वरीयता से देखे. दिमाग के एक हिस्से में बजट भी घूम रहा था. उसे याद आया कि उसने किसी ट्रेवलॉग पर “जॉस्टल” का नाम पढ़ा था. जॉस्टल यानी होटल और हॉस्टल का मिलाजुला स्वरुप. क्रोम पर टाइप किया तो शिमला शहर के कुछ जॉस्टल स्क्रीन पर दिखने लगे.
पहाड़ी पर बना एक जॉस्टल “हिल व्यू” उसे बहुत पसंद आया. इसकी स्टार रेटिंग भी अच्छी थी और कस्टमर रिव्यू भी… जॉस्टल के वेब पेज पर अपलोड तस्वीरों के अनुसार एक डोम में आठ बंक बेड लगे हुए थे. हरेक बेड के साथ एक लॉकर की व्यवस्था थी. एक किचन भी थी जिसमें आप अपना सामान लेकर खाना नाश्ता भी बना सकते हो. अन्यथा कैंटीन की व्यवस्था तो थी ही जहां ऑर्डर पर खाने-पीने की साधारण सुविधा थी. लेट बाथ कॉमन ही थे. कीमत मात्र पांच सौ रुपए प्रति दिन…एडवांस बुकिंग पर कोई पैसा नहीं…इतना सस्ता और सुन्दर ऑफर भला जिनिया अपने हाथ से कैसे फिसलने देती! उसने तुरंत एक बेड तीन दिन के लिए बुक करवा लिया.
अब उसे अपने सामान की पैकिंग करनी थी. जिनिया अपनी पूरी अलमारी खोलकर बैठ गई. जींस, टॉप, कुर्ते, शॉर्ट्स आदि सब उसके सामने बिखरे पड़े थे. जिनिया क्या रखूं… क्या ना रखूं… वाली स्थिति में थी तभी मां आ गई.
“देखो जिनिया! माना कि भौतिक रूप से सबकुछ बहुत बदल गया है लेकिन समाज की सोच में अभी इतना बदलाव नहीं आया है जितना तुम्हारा यह स्मार्ट फोन दावा करता है. कपड़े ऐसे लेकर जाना जो तुम्हें भीड़ से अलग नहीं बल्कि भीड़ का हिस्सा दिखाए. विशेष दिखने के चक्कर में कोई मुसीबत मोल मत ले लेना. बाकी तुम देख लेना. समझ रही हो ना मेरी बात?” मां ने अपना माँ वाला फर्ज निभाया. बात शायद जिनिया को भी समझ में आ रही थी इसलिए उसके हाथ जींस और कुर्तों की तरफ बढ़ गए.
“कुछ छुट्टे पैसे हाथ में रख लेना, काम आयेंगे.” मां ने नसीहत देना जारी रखा.
“शायद बच्चों को नसीहत देना अभिभावकों के डीएनए में ही होता होगा.” जिनिया ने सोचा फिर लापरवाही से सिर झटकते हुऐ कहा, “मां प्लीज… आजकल गोलगप्पे के ठेले पर भी पेटीएम चलता है.”
“कम सामान सफर आसान” वाली तर्ज पर सामान के नाम पर जिनिया ने केवल एक बैक पैक और एक टॉड बैग ही रखा. वैसे भी जिनिया का मानना है कि जब प्लास्टिक मनी और स्मार्ट फोन साथ हो तो किसी भी सामान की व्यवस्था हो सकती है.
बस का रात को साढ़े नौ बजे दिल्ली से रवाना होकर सुबह साढ़े छः बजे शिमला पहुंचने का समय तय था. रात का खाना खाकर जिनिया अपने पहले सोलो ट्रिप के लिए तैयार थी.
“सुबह नाश्ते के लिए दो परांठे बनाकर पैक कर दूं क्या?” मां ने पूछा तो जिनिया मां की कम अक्ली पर मुस्कुरा दी. फिर मजाकिया लहजे में बोली “केवल सुबह के नाश्ते से क्या होगा, पूरे तीन दिन का खाना बनाकर पैक कर दो.” सुनकर मां कुछ नहीं बोली तो जिनिया को लगा शायद उसने मां के मां वाले फैक्टर को चोट पहुंचा दी.
“मैं वहीं कुछ खा लूंगी. आप परेशान मत हों.” कहकर जिनिया ने मां के गले में हाथ डालकर उन्हें राजी करने की कोशिश की. मां ने उसके हाथ गले से हटाते हुए पूछा ” शिमला में क्या देखना है, उसकी लिस्ट बना ली क्या?” जिनिया ने मुस्कुराते हुए एक बार फिर उनके सामने स्मार्ट फोन लहरा दिया. इसी बीच मां ने दो परांठों में अचार दबाकर जिनिया के बैग की साइड वाली पॉकेट में रख दिया. झुंझलाई जिनिया पैकेट वापस निकालने लगी तो मां ने कहा,” रखा रहने दे, तुझे नहीं खाना हो तो कल किसी जरूरतमंद को दे देना.” जिनिया ने नाखुशी के साथ परांठे रख लिए.
बस का समय होने लगा था मां ने पापा से जिनिया को बस स्टैंड छोड़ आने के लिए कहा लेकिन जिनिया ने साफ मना कर दिया. वह आज बल्कि अभी से आत्मनिर्भर होना चाहती थी इसलिए उसने तुरंत अपना स्मार्ट साथी निकाला और उसे एक कैब बुक करने का आदेश दिया. एप ने उसे सूचना दी कि आपका वाहन केवल पांच मिनट की दूरी पर है इसलिए आप तैयार रहें वरना इंतजार करने का किराया भी आपको ही देना होगा.
जिनिया ने बैक पैक को पीठ पर और टॉड बैग को आगे की तरफ कंधे पर लादा और मां पापा को बाय कहती हुई नीचे सड़क पर आ गई. बस तैयार ही खड़ी थी. जिनिया ने अपना सामान जमाया और अपनी सीट पर बैठकर एक लम्बी राहत वाली सांस ली. अब तक सब उसके प्लान ने अनुसार ही हो रहा था.
बस अपने निर्धारित समय पर चल दी. जिनिया ने अपना फोन निकाला और सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट करने लगी. पहली बार अकेली घूमने जा रही थी तो जाहिर सी बात है कि बधाइयों के साथ बहुत से दोस्तों की नसीहतें भी इनबॉक्स में आ रही थी. किसी ने उसके निर्णय को हिम्मतवाला तो किसी ने निरी बेवकूफी बताया.
“जलते हैं सब.” सोचकर जिनिया ने मुंह बिचकाया और बधाई वाले कॉमेंट्स पर रिप्लाई करने लगी. रात दो बजे तक उसके अकाउंट पर ट्रैफिक जाम ही रहा. इसके बाद यातायात कुछ कम हुआ तो जिनिया की आंखों में भी नींद उतरने लगी. सुबह जब बस के कंडक्टर ने जगाया तब उसकी आंख खुली. देखा तो बस शिमला के बस स्टैंड पर खड़ी थी. जिनिया ने अपने बैग पहले की तरह ही अपने कंधे पर लादे और बस से उतरकर इधर-उधर देखने लगी. कल तक दिल्ली की आसमान छूती इमारतों के बीच रहने वाली जिनिया आज खुद को गगनचुंबी पहाड़ियों के बीच पाकर विश्वास नहीं कर पा रही थी.
“कहां जाना है मैडम?” एक ऑटो वाले ने पूछा.
“कौन किराया तय करने के लिए मगजमारी करे. कैब बुक करने के लिए उसका स्मार्ट दोस्त है ना उसके साथ.” सोचते हुए जिनिया ने ऑटो वाले को इग्नोर कर दिया. इधर चाय की तलब भी हो रही थी और सामने एक अच्छी खासी भीड़ वाली चाय की टपरी भी दिख रही थी. नाम देखा “एमबीए चाय वाला” पढ़कर जिनिया मुस्कुरा दी और एक चाय ऑर्डर कर दी. चाय पीकर समय देखा. साढ़े आठ बज रहे थे. चेक इन का समय दस बजे का था इसलिए जिनिया वहीं बैठकर इंतजार करने लगी. चाय के पैसे भी नहीं दिए.
दस बजे जिनिया ने अपना मोबाइल निकाला और जॉस्टल के लिए कैब बुक करने लगी. पहली बार में कैब बुक नहीं हुई. दूसरी और तीसरी बार में भी नहीं हुई तो जिनिया थोड़ी परेशान हुई. उसने दो-तीन बार नेट कनेक्शन को रिफ्रेश किया लेकिन हर प्रयास फेल… मोबाइल की स्क्रीन पर घूमते चक्कर को देखकर जिनिया को चक्कर आने लगे.
“यहां शायद नेटवर्क कमजोर होगा, थोड़ा आगे जाकर कोशिश करती हूं.” सोचकर जिनिया चाय के पैसे चुकाने लगी. पेटीएम ऑन किया तो उसने भी पेमेंट करने से इंकार कर दिया. जिनिया समझ नहीं पा रही थी कि एक क्लिक के साथ हाजिर होने वाले उसके स्मार्ट दोस्त आज इतने भाव क्यों खा रहे हैं!
“आज और कल, दो दिन यहां कोई सरकारी परीक्षा है. आए दिन पेपर आउट होते रहते हैं इसलिए सरकार ने एहतियात के लिए दो दिन के लिए इंटरनेट बंद कर दिया है.” चाय वाले ने उसे परेशान होते देखा तो बताया. सुनते ही जिनिया के पांवों तले जमीन खिसक गई. हाथ पांव कांपने लगे. अब क्या करेगी जिनिया? जिन दोस्तों पर उसने अपने आप से ज्यादा भरोसा किया वे तो पराश्रित निकले.
जिनिया ने अपना पर्स खोला जिसमें मां की जिद के कारण थोड़े से फुटकर पैसे रखे थे, चाय वाले को भुगतान किया. अब जॉस्टल कैसे जायेगी? उसे तो जॉस्टल की लोकेशन भी नहीं मालूम. सब कुछ इन्टरनेट के माध्यम से बुक हुआ था इसलिए सारी जानकारी उसकी मेल में थी और बिना इन्टरनेट मेल चल नहीं सकता. नाम से पूछा तो किसी ने उसका पता नहीं बताया.
“यह हिल स्टेशन है दीदी, यहां घर-घर में ऐसी व्यवस्था है. एक नाम के कई होटल मिल जायेंगे. बिना लोकेशन तो तलाश करना मुश्किल है.” हरेक ऑटो वाले का यही जवाब था.
ग्यारह बजने को आए. नहाना तो दूर, अभी तो ठीक से कुल्ला तक नहीं हुआ था. पर्स में देखा तो केवल सौ रुपया नगद था. जिनिया बस स्टैंड पर बने सुलभ कॉम्प्लेक्स की तरफ बढ़ गई. बीस रुपए देकर हाथ मुंह धोए और फ्रेश हुई तो भूख लगने लगी. मां के रखे परांठे याद आ गए.
“इस वक्त मुझसे अधिक जरूरतमंद कौन होगा!” मन ही मन माँ को धन्यवाद देते हुए जिनिया ने परांठे निकाले और बिना चाय कॉफी ही खाने लगी. अचार में सने वे परांठे आज उसे दुनिया की सबसे अधिक स्वादिष्ट डिश लग रही थी.
“आज के आपातकालीन काम तो निपट गए लेकिन अब आगे का क्या? ये स्थिति तो अभी दो दिन और रहने वाली है.” जिनिया सोचने लगी. कहते हैं कि मुसीबत के समय दिमाग अधिक सक्रिय हो जाता है. जिनिया का दिमाग भी अब बेलगाम घोड़े की तरह इधर-उधर भागने दौड़ने लगा. सामने एटीएम देखा तो दिमाग के घोड़े ठिठक कर ठहर गए.
“ये मुझे याद क्यों नहीं आया! सबसे पहले तो एटीएम पर जाकर कैश निकाला जाए. जेब में पैसा होगा तो आधी परेशानी दूर हो जाएगी. जॉस्टल ना सही, कोई होटल ले लूंगी.” ऐसा विचार आते ही जिनिया को थोड़ी राहत मिली. उसने एटीएम कार्ड निकालने के लिए अपना पर्स खोला. पूरा पर्स उलट पलट करने के बाद भी उसे एटीएम कार्ड नहीं मिला.
“ओफ्फो! टॉड बैग में सामान शिफ्ट करते समय शायद कार्ड घर पर पुराने वाले पर्स में ही रह गया.” जिनिया ने अपना माथा पीट लिया. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे… किससे मदद मांगे…
फिर उसने तय किया कि जो हुआ सो हुआ, आज का दिन क्यों खराब किया जाए. जिनिया पैदल ही मॉल रोड़ पर घूमने लगी. तरह-तरह के सामान से अटी दुकानें उसे बुला रही थी. कहीं लकड़ी का सजावटी सामान तो कहीं गर्म कपड़े… जिनिया मन ही मन अपनी शॉपिंग लिस्ट याद कर रही थी. यहां हर तीसरी दुकान कोई रेस्टोरेंट या ढाबा थी जिनसे उठती लज़ीज़ खाने की महक उसका ध्यान भटका रही थी लेकिन खाली जेब और “नो इंटरनेट” का मैसेज उसे अपने आप पर नियंत्रण रखने के लिए मजबूर कर रहा था.
दोपहर के तीन बजने को आए. एक पानी की बोतल के सहारे उसने इतना समय निकाल दिया. चाय की तलब भी हो रही थी और पेट भी अपनी जरूरत का नोटिफिकेशन दे रहा था. पर्स में पैसे थे केवल अस्सी रुपए. एक बार तो मन किया किया कि मां को फोन करके कपूर अंकल का नंबर मांग ले लेकिन पीढ़ियों का अंतराल एक फोन कॉल से थोड़ी पाटा जा सकता है. वैसे भी आजकल के बच्चे कहां इतनी जल्दी हथियार डालते हैं. वे तो खाली हाथ भी जंग जीतने का दावा करते हैं. अभी जिनिया सोच ही रही थी कि मोबाइल बजा. नम्बर तो अनजान ही था लेकिन उसने उठा लिया.
“हेलो मैडम, मैं “हिल व्यू” जॉस्टल से बात कर रही हूं. आपकी आज की बुकिंग थी. आप पहुंची नहीं अभी तक.” उधर से किसी महिला की आवाज थी. सुनते ही जिनिया को लगा मानो किसी मुरझाते हुए पौधे पर बारिश की बूंदें गिर पड़ी हों. जिनिया ने उसे अपनी परेशानी बताई और मदद करने के लिए आग्रह किया. उस महिला ने पहले तो उसकी लापरवाही पर आश्चर्य किया फिर उसे जॉस्टल की लोकेशन बताई और रास्ता भी समझाया. जिनिया ने जॉस्टल के लिए ऑटो किया और चल दी. बचा हुआ कैश ऑटो वाले को देकर अब जिनिया बिल्कुल खाली पर्स थी. जॉस्टल में चेक इन करने के बाद जिनिया ने एक बाउल मैगी और एक कप चाय लिया और बिस्तर पर पसर गई. पेट शांत हुआ तब कहीं जाकर दिमाग जागृत हुआ.
“रहने-खाने का इंतजाम तो हो गया लेकिन बाकी खर्चों के लिए पैसे कहां से आयेंगे!” जिनिया सोच रही थी. उसकी परीक्षा अभी समाप्त कहां हुई थी. जिनिया ने रिसेप्शन पर जाकर अपनी समस्या बताई.
“क्या आप लोग मुझे कुछ कैश दे सकते हैं? आप तो जानती होंगी कि आजकल कैश कोई साथ नहीं रखता. अब नेट ही बंद हो गया तो फिर हम क्या कर सकते हैं. परसों जैसे ही नेट चालू होगा, मैं आपको पेमेंट कर दूंगी.” जिनिया ने जॉस्टल में मदद मांगी.
“मैडम, हम तो अपना पूरा पेमेंट ही एडवांस लेते हैं. अब चूंकि आपकी समस्या वाजिब है इसलिए आपको समय दिया जा सकता है अन्यथा जॉस्टल में पर्यटकों का कोई भरोसा नहीं होता. कहीं घूमने जाने का बहाना बनाकर बिना बिल चुकाए ही निकल लिए तो?” रिसेप्शन पर बैठी महिला ने सहानुभूति के साथ साथ उसे हकीकत भी दिखाई.
जिनिया के पास अब कोई विकल्प नहीं था. या तो मां को सब सच बता दे या फिर नेट के चालू होने का इंतजार करती यहीं बैठी रहे. सोचते-सोचते दिमाग थकने लगा तो नींद ने घेर लिया. आंख खुली तो शाम पहाड़ियों से नीचे उतर आई थी. जिनिया ने टॉड बैग कंधे पर टांगा और आसपास घूमने के लिए पैदल ही पहाड़ी से उतरने लगी. तभी मां का फोन आ गया.
“कैसा चल रहा है? तूने पहुंचने का फोन भी नहीं किया?” मां ने खैरियत पूछने के साथ-साथ उलाहना भी दिया. दिन भर की परेशान जिनिया अब टूट चुकी थी. उसने मां को सारी बात बता दी.
“अरे, इतनी परेशानी थी तो पहले क्यों नहीं बताया? नेट ही बंद था ना, नेटवर्क तो नहीं. अच्छा सुन, परेशान मत हो. अपने बैग की पिछली जेब में देख, मैंने उसमें एक हजार रुपए रखे थे. तेरे फुटकर में काम आ जायेंगे. उनके साथ ही एक पेपर पर लिखा हुआ कपूर अंकल का एड्रेस और फोन नंबर भी है, जरूरत पड़ने पर उनसे मदद लेने में संकोच मत करना.” मां ने उसे बताया तो जिनिया को मां और उनके तजुर्बे पर बहुत प्यार आया. उसने बैग की पिछली जेब टटोली तो मां का बताया सब वहां सुरक्षित रखा था. जिनिया को आज रेगिस्तान में नखलिस्तान वाली कहावत का असल मतलब समझ में आया था.
दूसरे दिन उसने कपूर अंकल को फोन लगाया. अपना परिचय देने के बाद जब उसने अपनी परेशानी बताई तो आधा घंटे में ही कपूर अंकल उसके पास खड़े थे. वे उसे अपने साथ घर ले जाना चाहते थे लेकिन जिनिया को तो अपने अनुभव आप हासिल करने थे इसलिए उसने अंकल को मना कर दिया. अंकल ने उसकी मर्जी का सम्मान करते हुए पांच हजार रुपए उसे थमा दिए. जिनिया के लिए फिलहाल यह एक बड़ी मदद थी.
रुपए हाथ में आते ही जिनिया का आत्मविश्वास भी लौट आया. उसने पूरा दिन मजे से घूमा. इंटरनेट बंद होने के कारण सोशल मीडिया पर खर्च होने वाला उसका सारा समय बच गया. यह समय जिनिया ने अपने आप को दिया. उसने स्थानीय लोगों से बातचीत की. प्रकृति को नजदीक से महसूस किया. हर जगह की जानकारी पूरे मन से ली और वहां की बहुत सी खूबसूरत तस्वीरें क्लिक की. अगले दिन सुबह आठ बजे इंटरनेट सेवाएं बहाल हो गई तो जिनिया अपनी ली हुई तस्वीरें “एक्सप्लोरिंग शिमला” नामक एल्बम बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगी.
कैप्शन, “केवल आभासी सोशल नेटवर्क ही नहीं, वास्तविक सोशल नेटवर्क भी बहुत जरूरी है…” के साथ एल्बम की पहली तस्वीर कपूर अंकल के साथ उसकी सेल्फी थी. जिनिया यह देखकर मुस्कुरा दी क्योंकि एल्बम पर सबसे पहला लाइक मां ने ही किया था.
इंजी. आशा शर्मा
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MO-9413369571



