हमारे समय की शिनाख्त है बज़्म-ए-हयात - rashtrmat.com

हमारे समय की शिनाख्त है बज़्म-ए-हयात

  पत्रकार रमेश कुमार‘रिपु’ का यह दूसरा ग़ज़ल संग्रह है। रिपु’ जितना पत्रकारों के बीच लोकप्रिय हैं उतना ही लेखन की दुनिया में भी जाने जाते हैं। साहित्य की किसी भी विधा में लिखने वाले कलमकार की पहली कसौटी है कि वो अपने दौर की नब्ज को समझ सके। अपने समय की शिनाख्त करने में महारत हासिल हो। हम जिस दौर में जी रहे हैं उस दौर की शिनाख्त है बज्म-ए-हयात

यह रमेश कुमार ‘रिपु’ का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है। पत्रकार होने के नाते आम आदमी के दर्द,तकलीफ,प्रपंची सियासत को अच्छी तरह जानते हैं। उर्दू जबान में ग़ज़ल लिखते वक्त कौन सी जरूरी बातें हैं उसे उन्होंने ध्यान रखा है। ग़ज़ल लिखते वक्त लिखने वाले की पहली कसौटी है कि वो समय के साथ चलना जानता हो। यही वजह है कि हमारे समय का आईना प्रस्तुत करती रमेश कुमार ‘रिपु‘ की ग़ज़लें जो उनकी ग़ज़ल संग्रह बज्म-ए-हयात के जरिये सामने आई है। अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की झलक कई जगह दिखती है। उनकी ग़ज़ल आम आदमी के साथ है। मसलन-
मैं सादगी से मिलूंगा,तो कोई हाथ नहीं मिलाएगा
ये नए दौर के लेाग है,इनकी तरह मिलना पड़ेगा
एक बच्चे से सियासी झंडा, मांग लाए थे
हम किसी पार्टी केदफ़्तर से नहीं आए थे

बज़्म-ए-हयात में कहीं प्रयोग तो कहीं सामाजिक और राजनीति की गहरी परछाई दिखती है। कई जगह ग़ज़ल सीधे बोलचाल लहजे़ में लिखी गयी है। यानी कह सकते हैं कि गद्यात्मक शैली में है। मगर बात में वजन है-
अच्छे दिन आने की ख़बर, जबसे सुनी है
मेरी माॅ,घर का दरवाज़ा खुला रखने लगी है
वो झूठ बोलकर सबको परेशान कर देता है
अंध भक्त कहते हैं,वाह भाई वाह कमाल है
यह संग्रह ग़ज़ल के लहजे की दृष्टि से नया रंग लिये हुए है। जिसमें नयी बात है। खनक है।लय है। नया सब्जेक्ट है। कुछ शेर ऐसे हैं जिन्हें पढ़ते ही समझ में आ जात है कि किसके लिए लिखा गया है। किस संदर्भ में लिखा गया है। व्यवस्था पर करारी चोट की गयी है।
संसद की मजबूरी,ये कह भी नहीं सकती
कुर्सी के लिए कौन,दंग फ़साद कराता है
सियासत के लबों पर, नारों की मुस्कान
रोटी के लिए,अनशन पर बैठा हिन्दुस्तान

शायर ने तमाम शेरों में एंग्री पीढ़ी के अंदर के दर्द को रेखांकित किया है। उनके शेरों में फैटेसी भी है। शायर बदलाव और अकुलाहट को बयान करने वाला शायर है। कई जगह ऐसा लगा कि दुष्यंत की ग़ज़ल मैं पढ़ रही हूँ या फिर अदम गोंडवी को महसूस कर रही हूँ । पीड़ा,दर्द और सुख की अनुभूति हर कोई अलग-अलग और कभी कभी एक सा करता है।
शोहरत ज़रूरी है हयात में,पर खरीदी नहीं
जो शोहरत मिली थी,उसे कभी बेची नहीं
बज़्म-ए-हयात की ग़ज़ल में कई मान्यताएं भी टूटती नजर आयी हैं। खबरों पर शायर ने शेर कहे हैं। केदारनाथ की कविता की एक लाइन का बहुत अच्छा प्रयोग किया गया है-
तेरे शहर में क कहूं तो, कत्ल हो जाता है
अल्फाजों के बस्ते में मौत कहां से आती है
अनु की ज़िन्दगी से कभी गुजर के देखो
बेवफ़ाई में ज़िन्दगी बेहतरीन हो जाती है
वे कहते हैं,सीमेंट ही रीवा में विकास है
घूसखोरी,कालाबाजारी,जुर्म भी इतिहास है

रचनाकार ने दिल की बात भी की है।छोटी बड़ी अनुभूतियों को देसी अंदाज में व्यक्त किया है। यही वजह है कि रूमानियत में मिठास का एहसास होता है मगर अलग अंदाज में –
नैनों की दोहनी में है चाहत का दूध
तन की देहरी पर दिल की बात होगी
आओ अपने आंसू प्यासे पेड़ को दें दें
ज़िन्दगी रही तो, फिर बरसात होगी

संगह की बहुत सारी ग़ज़लों के शेर डायरी में लिखने लायक है। मुझे बहुत सारे शेर पसंद है। संग्रह में 133 ग़ज़ल है। कोई भी इस संग्रह को पढ़कर निराश नहीं होगा। बज़्म-ए-हयात की ग़ज़ल आम आदमी के पक्ष में आवाज़ उठाती है इसलिए पसंद की जायेगी।-
सुकरात की मौत मुझे,मरने नहीं देगा
मारना चाहता है,मुझे सिंकदर बनाकर
सामने वाले को अजब तरीके से डराता है
वो बात बात पर अपना आस्तीन चढ़ाता है
जब से मेरे दुश्मनों की आँखों का पानी मर गया
घर पहुंचने तक माॅ, सबके लिए दुआएं मांगती है

कौशलेश तिवारी,रायपुर छग

MO-07828128796

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