इलाहाबाद की बकैती में गजब का लोकतंत्र है।यहाँ प्रोफेसर, छात्र, रिक्शेवाला, पानवाला सब बराबरी से ज्ञान देते हैं।कोई किसी से कम नहीं।और सबसे मजेदार बात जानते हैं?इलाहाबाद का आदमी अपनी बकैती पर शर्मिंदा नहीं होता।उसे गर्व होता है।क्योंकि यहाँ बकैती सिर्फ टाइमपास नहीं है गुरु…यहाँ यह जीवन पद्धति है।
इलाहाबाद की बकैती में गजब का लोकतंत्र \ व्यंग्य
व्हाटसएप यूनिवर्सिटी से
इलाहाबाद संगम की नगरी है। और साहित्य के साथ हाई कोर्ट के लिए जाना जाता है।आप सिर्फ इतना ही जानते होंगे।लेकिन इलाहाबाद इन सबके अलावा दो ऐसी चीजों के लिए भी जाना जाता है,जिन्हें सुनकर आप भी दंग रह जाएंगे। वो दो चीज ऐसी है जो कभी खत्म नहीं होती। एक प्रतियोगी छात्र।दूसरी बकैती।
यहाँ गंगा का पानी घट-बढ़ सकता है, लेकिन चाय की दुकान पर ज्ञान की धारा चौबीसों घंटा बहती रहती है।
यूनिवर्सिटी रोड निकलिए।हर तीसरा लड़का ऐसे चलता मिलेगा जैसे अभी UPSC का इंटरव्यू देकर कैबिनेट सचिव बनके लौट रहा हो। पीठ पर बैग, हाथ में इंडियन पॉलिटी, आँख में नींद, और चेहरे पर ऐसा भाव कि देश हमीं से चल रहा है गुरु…!
कमरे पर वही बनियान में पड़ा मिलेगा। पंखा चर्र-चर्र कर रहा होगा, टेबल पर आधा खाया समोसा, और दीवार पर मोटे अक्षर में लिखा होगा: Dream Big.
हमारे एक मित्र हैं। पाँच साल से सीरियस प्रिपरेशन कर रहे हैं। इतने सीरियस कि किताब खोलते ही नींद आ जाती है। लेकिन बनारसी की चाय की दुकान पर बैठ जाएँ तो ऐसा विश्लेषण देंगे कि लगता है UPSC वाले इन्हीं से पूछकर पेपर बनाते हैं।
एक दिन बोले, “देखो भइया, इस देश में टैलेंट की कोई कदर नाहीं है।”
हमने पूछा, “भैया, पिछले प्री में कितना आया था?”
बोले, “बस एक नंबर से मेंस चूक गया।”
अब इलाहाबाद में “बस एक नंबर” का मतलब समझिए। यहाँ आदमी रेलवे स्टेशन से फाफामऊ पहुँच जाए तो भी कहेगा “बस थोड़ा आगे आ गए।”
और चाय की दुकान!अरे गुरु, इलाहाबाद की असली संसद वही है।
यूनिवर्सिटी रोड की चाय की दुकान पर चार बकैत बैठ जाएँ तो संयुक्त राष्ट्र भी शरमा जाए।
एक बोला, “गुरु अमेरिका का पतन तय है।”
दूसरा बोला, “हम तो पहले से कह रहे हैं।”
तीसरा बीच में सिगरेट सुलगाते हुए बोला, “असल खेल चीन समझ रहा है।”
और चौथा, जो अभी तक उधार की चाय पी रहा था, धीरे से बोला, “पप्पू, एक बिस्कुट अउर देना… खाते में लिख लो।”
इलाहाबाद में सबसे मजबूत चीज़ आदमी का आत्मविश्वास होता है। जेब में पैंतीस रुपया रहेगा लेकिन बात ऐसे करेगा जैसे RBI का गवर्नर उसी से सलाह लेता हो।
हमारे मोहल्ले के तिवारी चाचा हर बात में बोलते हैं, “जब हम यूनिवर्सिटी में थे न…”
अब उनका यूनिवर्सिटी जीवन इतना लंबा था कि लोग शक करते हैं कि डिग्री कर रहे थे या मुगल साम्राज्य चला रहे थे।
एक दिन किसी लड़के ने पूछ दिया, “चाचा, पढ़ाई कैसी करनी चाहिए?”
बस फिर क्या। तिवारी चाचा ने 1974 से कथा शुरू कर दी। जेपी आंदोलन, छात्र राजनीति, कॉफी हाउस, प्रेम पत्र, लाठीचार्ज… सबका वर्णन। बीच-बीच में ऐसे रुकते जैसे इतिहास चैनल पर विज्ञापन आ गया हो।
उधर लड़का बेचारा आधे घंटे बाद बोला, “चाचा ठीक है, लेकिन रीज़निंग कैसे पढ़ें?”
चाचा बोले, “मैथ्स बाद में… पहले वैचारिक स्पष्टता जरूरी है।”
इलाहाबाद का आदमी कहीं भी चला जाए, उसकी बकैती नहीं जाती।
दिल्ली में मिलेगा तो बोलेगा, “दिल्ली ठीक है, लेकिन बात इलाहाबाद जैसी कहाँ…”
मुंबई में मिलेगा तो बोलेगा, “यहाँ पैसा है गुरु, शांति नाहीं है।”
और गाँव लौटेगा तो कहेगा, “हम शहर देखकर आ रहे हैं।”
यहाँ प्रेम भी बड़ा बकैती वाला होता है।लड़का छह महीने तक सिर्फ कोचिंग के बाहर लड़की को देखकर लौट आएगा।
दोस्त पूछेंगे, “बात किए?”
बोलेगा, “अभी सही टाइम नै न आवा बे।”
फिर वही लड़का रात में फेसबुक पर लिखेगा, “कुछ प्रेम अधूरे ही अच्छे लगते हैं…”
और नीचे कमेंट करेगा उसका दोस्त, “पहले बात तो कर ले बे।”
इलाहाबाद में रिक्शेवाले भी दार्शनिक होते हैं।
एक बार हम बैठे तो रिक्शेवाला बोला, “बाबू, जिंदगी में आदमी को शांत रहना चाहिए…”
हम प्रभावित हो गए। तभी सामने से एक ई-रिक्शा कट मार दिया। रिक्शेवाला तुरंत चिल्लाया, “अबे मरबे का बे! पूरा खानदान लेकर निकल पड़े हो का?”
इलाहाबाद की बकैती में गजब का लोकतंत्र है।
यहाँ प्रोफेसर, छात्र, रिक्शेवाला, पानवाला सब बराबरी से ज्ञान देते हैं।कोई किसी से कम नहीं।और सबसे मजेदार बात जानते हैं?इलाहाबाद का आदमी अपनी बकैती पर शर्मिंदा नहीं होता।उसे गर्व होता है।क्योंकि यहाँ बकैती सिर्फ टाइमपास नहीं है गुरु…यहाँ यह जीवन पद्धति है।
व्हाटसएप यूनिवर्सिटी से
MO-9810015517
