राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। बैहर विधानसभा क्षेत्र के तीन बार के विधायक संजय उइके की निष्क्रियता की वजह से जगला में बच्चों की मौत की कहानी बनी। और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी न आते तो आदिवासी गांव बैहर के जगला गांव में प्रशासन न आता। रोगग्रस्त जगला में श्रमजीवी पत्रकार संघ बालाघाट पहुंचकर पीड़ित परिवार के अलावा गांव के अन्य लोगों को जरूरत की सामग्री दी।यहां की समस्याएं बताती है यहां सरकार नहीं है।

पीड़ित गांव में राहत कार्य करेंगे
पीड़ितों की पीड़ा समझने के बाद मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ ने प्रभावित बैगा गांवो को गोद लेने का निर्णय लिया है। मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के जिलाध्यक्ष इंद्रजीत भोज ने बताया कि प्रदेशाध्यक्ष शलभ भदौरिया के के निर्देश पर संघ पिछले लगभग 25 वर्षों से पत्रकारिता के साथ.साथ समाजसेवा के क्षेत्र में भी कार्य करता आ रहा है। संघ ने अब बैगा बाहुल्य कोरका, बोंदारी, अडोरी, कुंडेकसा, तबलुटोला एवं जगला ग्रामों को गोद लेने का निर्णय लिया है। इन गांवों में संघ के पत्रकार साथी लगातार राहत कार्य करेंगे। जरूरतमंद परिवारों को दैनिक उपयोग की सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी तथा ग्रामीणों को शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास किया जाएगा।

तबुलुटोला में राहत सामग्री का वितरण
बैगा बाहुल्य ग्रामों की समस्याओं को शासन और प्रशासन तक पहुंचाकर उनके निराकरण के लिए लगातार आवाज उठाई जाएगी। पत्रकार संघ का यह प्रयास केवल राहत सामग्री वितरण तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं को सामने लाने और उन्हें शासन की योजनाओं से जोड़ने का प्रयास भी किया जाएगा।मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ द्वारा बैगा बाहुल्य ग्राम जगला एवं तबलुटोला में पहुंचकर महिलाएं बच्चों एवं बुजुर्गों को साड़ी, खाद्य सामग्री दैनिक उपयोग की वस्तुएं तथा प्राथमिक उपचार की दवाइयां वितरित की गईं।संघ ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं को संबंधित विभागों एवं शासन.प्रशासन के समक्ष प्रमुखता से रखा जाएगा।

जगला में सरकार नहीं दिखती
ग्राम जगला गांव की स्थिति को देखकर यही लगता है कि रात दिन विकास की बातें करने वाली बीजेपी सरकार यहां क्यों नहीं दिखती। यहां न स्कूल है न स्वास्थ्य केंद्र और न ही राशन दुकान। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्या जगला गांव मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का हिस्सा नहीं है। यदि है तो फिर यहां रहने वाले आदिम जनजाति के बैगा परिवार आज भी नारकीय जीवन जीने को विवश क्यों हैं। यह सवाल केवल जगला का नहीं बल्कि दक्षिण बैहर के उन तमाम बैगा बाहुल्य ग्रामों का हैए जहां विकास की बुनियादी सुविधाएं आज भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं।