राष्ट्रमत न्यूज,नई दिल्ली (रमेश कुमार ‘रिपु’)। नंदीग्राम का नतीजा एक सीट का फैसला करेगा।लेकिन वहां चुनाव जिस माहौल में होता हैए वह शायद बंगाल से बाहर भी बहुत कुछ कहेगा।शायद यही वजह है कि नंदीग्राम को आज सिर्फ उपचुनाव नहीं आने वाली भारतीय राजनीति की एक खिड़की की तरह देखा जा रहा है।

नंदीग्राम में अभी मतदान नहीं हुआ है लेकिन चुनाव से पहले ही राजनीति कई सवालों के घेरे में आ गई है। ममता बनर्जी के गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नाम वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की और कुछ ही घंटे बाद मिलन प्रधान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसी दौर में चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके पारंपरिक ष्फूल और घासष् चुनाव चिह्न को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों के लिए फ्रीज कर दिया।

एक दिन में बदल गई पूरी तस्वीर
मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का पक्ष है कि उनके खिलाफ लंबित वारंट था और कार्रवाई उसी के आधार पर हुई। दूसरी ओर ममता बनर्जी और कांग्रेस ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्टों के अनुसार नाम वापसी के कुछ घंटों बाद ममता ने समर्थन की घोषणा की और उसके करीब दो घंटे बाद पुलिस ने मिलन प्रधान को गिरफ्तार किया।अगर वारंट पुराना थाए तो उसकी कार्रवाई चुनाव के ठीक पहले क्यों हुईघ्इस सवाल का जवाब पुलिस को कानून के आधार पर देना है और राजनीतिक दलों को अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण देने हैं। किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मान लेना पत्रकारिता नहीं होगी।लेकिन समय का सवाल पूछना भी जरूरी है।

और फिर फ्रीज हो गया जोड़ाफूल
इस पूरे घटनाक्रम से पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया था।आयोग के सामने पार्टी के भीतर दो गुटों का दावा था। इसलिए अंतरिम व्यवस्था के तहत ममता बनर्जी के गुट को ष्ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेसष् नाम और ष्फुटबॉल खिलाड़ीष् चिह्न दिया गयाए जबकि दूसरे गुट को ष्डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेसष् और ष्लिफाफाष् चिह्न मिला। मूल नाम और चिह्न का विवाद अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।यहीं इस मामले की गंभीरता बढ़ जाती है।क्योंकि चुनाव चिह्न महज कागज पर बना निशान नहीं होता। वर्षों की राजनीतिक पहचान उसी से जुड़ी होती है। ग्रामीण मतदाता के लिए पार्टी का नाम भूल जाना संभव हैए लेकिन उसका चुनाव चिह्न याद रहता है।इसलिए चुनाव के ठीक पहले किसी स्थापित दल की पहचान बदलना स्वाभाविक रूप से बड़ा राजनीतिक प्रभाव पैदा कर सकता है।
आयोग का कहना है कि यह अंतरिम व्यवस्था पार्टी के अंदर चल रहे विवाद के कारण की गई है। ममता पक्ष इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम बता रहा है।दोनों पक्षों के दावों के बीच अंतिम निर्णय संस्थागत और न्यायिक प्रक्रिया से होना है।
क्या इसे अघोषित इमरजेंसी कहा जाए
संवैधानिक अर्थ में इसे इमरजेंसी कहना उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र केवल आपातकाल घोषित होने या न होने का नाम भी नहीं है।लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता को चुनौती देने वाली ताकतों को समान राजनीतिक अवसर मिलता है या नहीं।इसीलिए नंदीग्राम में असली सवाल यह है क्या कानूनए प्रशासन और चुनावी संस्थाओं की हर कार्रवाई ऐसी पारदर्शी है कि उसके पीछे राजनीतिक पक्षपात का संदेह पैदा न हो अगर किसी उम्मीदवार के खिलाफ अदालत का वारंट है तो पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए।अगर किसी राजनीतिक दल में वास्तविक विभाजन है तो चुनाव आयोग को फैसला करना चाहिए।लेकिन दोनों मामलों में समयए प्रक्रिया और कारणों की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।क्योंकि लोकतंत्र केवल निष्पक्ष होना नहीं चाहिएए उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
ममता बनर्जी के समर्थक इन घटनाओं को भाजपा के राजनीतिक दबाव और संस्थाओं के कथित दुरुपयोग से जोड़ रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने भी चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक आरोप के रूप में देखती है।
नंदीग्राम क्यों महत्वपूर्ण है
नंदीग्राम बंगाल की राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। 2007 का भूमि अधिग्रहण आंदोलन ममता बनर्जी के राजनीतिक उभार की बड़ी वजह बना। 2021 में इसी सीट पर ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच सीधा मुकाबला राष्ट्रीय राजनीति का विषय बना।अब 2026 में फिर नंदीग्राम राष्ट्रीय चर्चा में है।
इस बार लड़ाई सिर्फ उम्मीदवारों की नहीं है।यह राजनीतिक पहचानए संगठन और विपक्षी एकजुटता की भी परीक्षा है।ममता बनर्जी का अपनी उम्मीदवार के हटने के बाद कांग्रेस के मिलन प्रधान को समर्थन देना बताता है कि चुनावी राजनीति में पुराने समीकरण कितनी तेजी से बदल सकते हैं।लेकिन समर्थन के कुछ घंटों बाद उम्मीदवार की गिरफ्तारी ने उस समीकरण को और असामान्य बना दिया।

क्या नंदीग्राम यूपी का ट्रेलर है
पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं।लेकिन राजनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में नंदीग्राम को उत्तर प्रदेश के लिए जरूर पढ़ा जा सकता है।अगर क्षेत्रीय दलों को तोड़नेए उनके संगठन और पहचान को चुनौती देनेए चुनाव चिह्न पर विवाद खड़ा होने और विपक्षी दलों के बीच नए समीकरण बनने की राजनीति आगे बढ़ती हैए तो इसका असर दूसरे राज्यों की चुनावी रणनीतियों पर भी पड़ सकता है।इस अर्थ में नंदीग्राम एक सवाल छोड़ रहा है क्या आने वाले चुनाव केवल वोटों की लड़ाई होंगे या राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उनकी पहचान की भी लड़ाई बनेंगे।
आखिरी सवाल
नंदीग्राम में मतदान से पहले घटनाओं की जो श्रृंखला बनी हैए उसने लोकतंत्र की एक बुनियादी कसौटी सामने रख दी है। क्या राजनीतिक मुकाबले का मैदान सभी के लिए बराबर है किसी पार्टी के खाते पर कानूनी विवाद होए किसी विधायक या सांसद पर मामला होए किसी उम्मीदवार के खिलाफ वारंट हो या किसी दल के नाम.चिह्न पर विवाद कानून अपना काम करे।लेकिन कानून की कार्रवाई और राजनीतिक प्रक्रिया के बीच भरोसे की दीवार कमजोर नहीं होनी चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट केवल चुनाव हारना नहीं है।सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब जनता को यह संदेह होने लगे कि चुनाव से पहले ही मैदान किसी एक के लिए तैयार कर दिया गया था।