राष्ट्रमत न्यूज नई दिल्ली(ब्यूरो)। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में मतभेद है। सरकार का अपना तर्क है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा जब सीबीआई डायरेक्टर के चयन पैनल में सी जेआई हो सकते हैं तो चुनाव आयुक्तों के पैनल मे से उन्हें क्यों हटाया गया।देश भर में इस मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई। राष्ट्रमत भी अपने पाठकों से उनकी राय जानना चाहता है। क्या वो सरकार के अभिमत से सहमत हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट के तर्क से। कमेंटस में बताएं।

कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को विभाजित फैसला सुनाया। मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने था। केंद्र सरकार ने मांग की थी कि इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। जस्टिस दत्ता ने केंद्र की यह मांग खारिज कर दी, जबकि जस्टिस शर्मा ने माना कि मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल शामिल है, जिसे बड़ी पीठ को तय करना चाहिए।
बड़ी पीठ का फैसला जरूरी
जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को मामला भेजने की केंद्र की मांग को खारिज किया और 2023 के कानून को चुनौती देने पर अपनी प्रथम दृष्टया राय भी रखी।जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता की टिप्पणियों से असहमति जताई और कहा कि मामले में ऐसा महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है, जिस पर बड़ी पीठ का फैसला जरूरी है।

अब इस मामले में आगे क्या होगा?
दोनों जजों की राय अलग होने के बाद मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास भेजा जाएगा। सीजेआई यह तय करेंगे कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ बनाई जानी चाहिए या नहीं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि पांच दिन से ज्यादा समय तक मामले की सुनवाई हुई और संस्थागत एकजुटता के लिए दोनों जजों की एक राय बेहतर होती, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि सांविधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि शासक कानून से बंधे होते हैं और कानून से ऊपर नहीं होते।
मामले से जुड़ी बड़ी बातें
- मामला अब सीधे सीजेआई के सामने जाएगा, जहां यह तय होगा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े इस कानूनी विवाद के लिए संविधान पीठ गठित की जाए या नहीं।
- जस्टिस दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को केवल वास्तविक रूप से ही नहीं, बल्कि लोगों को दिखाई देने वाली स्वतंत्रता के रूप में भी जरूरी बताया।
- उनके मुताबिक प्रधानमंत्री की ओर से नामित कैबिनेट मंत्री से प्रधानमंत्री के खिलाफ रुख अपनाने की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि मंत्री सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत से सरकार के साथ जुड़े होते हैं।
- 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चयन प्रक्रिया से सीजेआई को हटाना चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता की जरूरत को प्रभावित करता है।
- 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ ने कानून बनने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई वाली समिति से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का निर्देश दिया था।