संयोग \ कहानी  - rashtrmat.com

 संयोग \ कहानी 

रश्मि लहर की संयोग कहानी का मूल संदेश है जब जिंदगी हारने लगे, तब अपनों का प्यार जीने की सबसे बड़ी वजह बन जाता है। बीमारी और मृत्यु का भय इंसान को भीतर से तोड़ सकता है, लेकिन अपनों का प्यार, विश्वास और साथ उसमें जीने की नई इच्छा जगा सकता है। दुख अकेले सहने से बढ़ता है, जबकि उसे अपनों के साथ बाँटने से हिम्मत मिलती है।

                             संयोग \ कहानी 

समुद्र की गहराई उनके प्रेम से अधिक नहीं थी। लहरों के साथ अपनी सुधियों का पिटारा खोले तीनों दोस्त बातें कर रहे थे। वैसे भले ही उन तीनों की उम्र बत्तीस-पैतीस बरस के लगभग थी, पर उन लोगों का बोलता चेहरा  अल्हड़ता के भाव सहेजे था।

उनमें से एक था ‘नन्दू’! उसके परिवार में कभी बीस लोग हुआ करते थे।  पर कोरोना की ऐसी मार पड़ी कि उसकी मा और वह बचा, बाकी सब काल का ग्रास बन गए। तीन वर्ष में ही देखते-देखते उनका मध्यमवर्गीय घर किसी निर्धन की झोपड़ी जैसा हो गया था। वे दोनों इस  सदमे से उबरे ही थे कि नन्दू को तपेदिक ने पकड़ लिया। खेती पर ध्यान देने वाला भी कोई नहीं रहा। जब तक नन्दू स्वस्थ होता, उसकी फसल नष्ट हो चुकी थी।

किसी तरह प्राइवेट नौकरी की मदद से उसने रोटी का जुगाड़ किया। उसी बीच माँ को एक प्यारी सी लड़की पसन्द आ गई और नन्दू विवाह के पावन बंधन में बॅंध गया। पत्नी पूजा का समर्पित प्रेम पाकर वह ईश्वर का सदैव ऋणी रहता था।  पर इधर दो महीने की अचानक आई इस बीमारी से वह स्तब्ध था। उसने किसी से चर्चा नहीं की थी पर जब उससे रायबरेली एम्स के डॉक्टर ने कैंसर के बारे में बताया था,  तब वह भीतर से बहुत टूट गया था।

दूसरा था अनाथ-आश्रम में बड़ा हुआ शिशिर। जीवन के विषैले अनुभवों से गुजरते हुए जब वह एक प्रतिष्ठित प्राथमिक विद्यालय में नौकरी करने लगा,  तभी उसे एक दिव्यांग स्त्री सुलोचना से प्रेम हो गया। सुलोचना उसी के शहर रायबरेली की रहने वाली,  अपने पापा की इकलौती पुत्री थी। वह विलक्षण प्रतिभा की धनी होने के साथ ममता व करुणा जैसे गुणों से भरपूर थी।  सुलोचना निर्धन बच्चों को पढ़ाती थी। वह पापा की देखभाल के कारण विवाह नहीं करना चाहती थी।  एक निर्धन बच्चे के माध्यम से दोनों एक-दूसरे से जुड़े तथा धीरे-धीरे वे दोनों एक-दूसरे की अनुभूति में जीने लगे थे।

पर शिशिर को दात के कैंसर का पता चलते ही उसकी दुनिया थम सी गई थी! हालांकि सुलोचना को वह उतनी ही निष्ठा के साथ; उसकी बड़ी-बड़ी ऑंखों में छुपते हुए प्रेम कर रहा था, पर, अब भविष्य को सोचकर स्वयं को बहुत छला हुआ पा रहा था।

तीसरा था ‘सजग’, जो रायबरेली के एक व्यवसाई का बेटा था। वैचारिक मतभेद के चलते उसने अपने पैतृक व्यवसाय को न चुनकर शिक्षा विभाग की नौकरी को प्राथमिकता दी। उसको अपने घर के समीप रहने वाली बाल-सखा ‘छवि’ से अगाध प्रेम था। वह भविष्य के सुखद सपनों में खोया ही था कि एक शाम पेट में उठे असहनीय दर्द ने उसका जीवन बदल कर रख दिया।

‘टाटा अस्पताल’,  मुंबई के बड़े से कमरे में हुई लंबी  वार्तालाप ने उन तीनों को घनिष्ठ मित्र बना दिया था। पर उनके स्वास्थ्य की गिरती स्थिति ने आज उनको भीतर तक तोड़ दिया था।  वे तीनों डाॅक्टर की अनुमति के बाद समुद्र देखने निकल पड़े थे।इस समय उन तीनों में एक समानता यह भी थी, कि उनकी पलकें अनकही पीड़ा से भीगी थीं।

आजकल पूजा को दो दिनों से नन्दू थोड़ा परेशान लग रहा था। वह फ़ोन पर ढंग से बात भी नहीं कर रहा था तथा उसकी बातों में वो चहक भी नहीं लग रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि हुआ क्या है! वह जब भी किसी उलझन में होती थी, गंगा किनारे पहुॅंच जाती थी।

रायबरेली से मुंबई बहुत दूर था। नन्दू उसको अम्मा का ख़्याल रखने को कहकर मुंबई चला गया था।  उसने बताया था कि उसको अपने विभाग का कुछ गोपनीय काम सौंपा गया था। वहाॅं से उसको दस दिन बाद आना था, पर अब तो डेढ़ महीने हो रहे थे। पूजा मन ही मन कुछ चिंतित हो रही थी। वह साठ वर्षीय अम्मा से गंगा किनारे जाने की बात कहकर निकल पड़ी।

सुबह की शीतलता भी उसको सुकून नहीं दे पा रही थी। दूर नभ की लालिमा देखकर वह सहसा भावुक हो गई। उसे लगा नन्दू अवश्य ही उससे कुछ छुपा रहा है।  पूरे एक घण्टे वह गंगा की पावन धाराओं को निहारती रही। कल-कल बहती धाराओं के साथ उसके मन की उथल-पुथल भी बह गई, उसने मन में एक निर्णय ले लिया था। वह भारी क़दमों से नन्दू के ऑफिस की तरफ़ चल पड़ी। डेढ़ घंटे का सफ़र तय करके वह पहली बार नन्दू के ऑफिस पहुॅंचीं। वहाॅं से प्राप्त सूचनाओं के हिसाब से उसको ‘टाटा अस्पताल’, मुंबई जाना एक उचित निर्णय लगा।

नन्दू के ऑफ़िस वालों ने यथासंभव मदद करने का आश्वासन दिया। वह कमजोर नहीं पड़ना चाह रही थी, पर नन्दू की भयंकर बीमारी की बात सुनकर वह स्तब्ध रह गई थी। अम्मा को क्या समझाएगी , इसी उधेड़बुन में उसने अपनी मौसिया सास से बात करने का मन बना लिया। सहयोगी लोगों का जीवन में होना सबसे बड़ा सुख होता है। मौसिया सास ने भी  उसको पूरा सहयोग देने का वादा किया।  हिम्मत करके उसने मुंबई की ट्रेन का टिकट बुक करवा लिया।

सुलोचना आज अपने पापा के साथ शिशिर के विद्यालय जा रही थी।  इधर कई दिनों से शिशिर उससे मिलने नहीं आया था। एक दो बार उसने मोबाइल पर बात की तो अपनी उम्र से अधिक समझदार शिशिर थोड़ा बुझा सा लग रहा था। सुलोचना की बेचैनी उसके कृषि विभाग से रिटायर्ड पापा से छुप न सकी। आज जब वे विद्यालय पहुँचे, तब उन्हें शिशिर की बीमारी का पता चला। वे दोनों तुरन्त ही मुबंई की ट्रेन पकड़ने निकल पड़े। बीमारी की यह सूचना पाकर सुलोचना जैसे जड़ हो गई थी। उफ़! यह क्या हो गया। सोचते-सोचते वह फफक पड़ी।

इधर छवि को सजग की बहुत याद आ रही थी। आजकल मोबाइल पर वह बहुत कम तथा दार्शनिक बातें करता था। ‘कल हो न हो’ कहकर चुप सा हो जाता था। छवि को अपना बाल सखा किसी परेशानी में उलझा लगा। वैसे वे दोनों एक-दूसरे से अक्सर नहीं मिलते थे, पर यदि कभी बात भी करते थे तो घंटों बीत जाते थे। आजकल सजग बात नहीं कर रहा था। शिक्षा विभाग में जाकर छवि को पता चला कि सजग तो बहुत अधिक बीमार हो गया है। उसकी अंतरात्मा चीत्कार कर उठी। वह बिना देरी किये मुंबई का टिकट बुक करवाने पहुँच  गई। संयोग से उस दिन मुंबई जाने वाली  ट्रेन के उस ए सी थ्री डिब्बे में वे तीन महिलाऍं तथा एक पुरुष था। वे  तीनों  थोड़ी देर तक एक-दूसरे को देखती-समझती रहीं। कुदरत का करिश्मा ऐसा था कि बातों-बातों में उन तीनों को यह पता चला कि वे एक ही अस्पताल जा रही थीं।

तीनों महिलाओं की पीड़ा भी लगभग एक जैसी ही थी। वे तीनों अपने-अपने ढंग से एक-दूसरे की उलझन कम करने का प्रयास कर रही थीं। उन तीनों में एक दर्द का रिश्ता सा जुड़ गया था। उधर बातें करते-करते वे तीनों रेत पर ही बैठ गए। शिशिर ने अपनी ऑंखें बन्द कर लीं। आज उसको सुलोचना की बहुत याद आ रही थी।

शिशिर को याद आया कि जब वह अपने भविष्य की आशंकाओं के कारण सुलोचना से एक निश्चित दूरी बनाने की बात कह रहा था,  तब वह कैसे शिकायत कर रही थी ! वह शब्दों को कितनी मासूमियत से,  भावों में लपेट कर कह रही थी..

“अचानक जीवन में आना, हर कण को अपने प्यार में डुबो जाना, मेरे पूरे वज़ूद पर छा जाना और फिर यकायक मेरे जीवन से निकल जाने का प्रयास करना, यह सबकुछ तुम्हारे लिए इतना आसान क्यों है  शिशिर!”  और शिशिर निःशब्द रह गया था!

उसके दिमाग में डाॅक्टर की आवाज गूजने लगी थी -“एक माह का समय है आपके पास! आप गम्भीर बीमारी की चपेट में आ चुके हैं, इस सच को स्वीकार कीजिए!”

वह फिर एक मीठी सी महक में खो जाना चाहता था! वह महक जो उसकी साॅंसों को अपने कोमल स्पर्श से सहला जाती थी! वह बॅंध जाता था सुलोचना के प्रेम के अदृश्य धागों में, चुपचाप! सजग और नन्दू भी बैठे-बैठे कुछ सोचने लगे थे। सहसा सजग के पास बैठे नन्दू ने धीरे से सजग से पूछा-“अच्छा बताओ, तुम क्या करोगे अगर तुमको छवि यहीं मिल जाए तो?”

“कुछ नहीं! उसका तो पास रहना ही मुझे अलौकिक ऊर्जा से भर देता है नन्दू!” सजग ने भर्राए हुए स्वर में कहा।

“चल, थोड़ी चाय पीते हैं, सजग”, मुह घुमाकर अपनी ऑंखें पोछते हुए नन्दू ने सजग से कहा।”आज प्रेम का स्मृति-घूट पी लिया है, अब आज कुछ नहीं !” धरती को देखते हुए सजग ने कहा।

” ज़िन्दगी के कसैले सच का कड़वा घूट मीठी चाय से गटक लो, अच्छा लगेगा ” कहते हुए नन्दू ने शिशिर को देखा। वह तन्मयता से  लहरों को आते-जाते देख रहा था। तबतक सजग और नन्दू , शिशिर के थोड़ा और पास पहुच गए।

“यार!  भगवान को हम तीनों ही क्यों मिले थे बीमारी के लिए? मुझे छवि की बहुत याद आती है! मैं अभी जीना चाहता हू! पर मुझे लग रहा है, मैं अपनी बीमारी से जैसे हार सा रहा हूॅं!” कहते हुए सजग शिशिर के कन्धे पर अपना सिर टिकाकर रो पड़ा। नन्दू ने उसको उठाने की कोशिश की पर फिर वह भी थरथरा कर रोने लगा।  उसको पूजा सफ़ेद वस्त्रों में, एकदम सपाट चेहरे की दिखने लगी थी।

तीनों दोस्तों को कैंसर ने आक्टोपस की तरह जकड़ लिया था और वे अपने जीवन को तिल-तिल कर समाप्त होता देखकर अजीब सी घबराहट को भोग रहे थे।  अचानक नन्दू बोल उठा-

“मुझे लग रहा है जैसे पूजा यहीं कहीं है! लगता है मेरे दिमाग ने भी काम करना कम कर दिया है!”सजग ने चेहरा उठाया तो सामने छवि के साथ दो अन्य स्त्रियों को देखकर अवाक रह गया! उसने शिशिर को इशारा किया। हड़बड़ा कर तीनों दोस्त खड़े हुए। शिशिर के मुॅह से “सुलोचना तुम!”  सुनकर नन्दू हैरान रह गया। सामने उसकी पूजा खड़ी थी।

“तुम तीनों एक साथ?” वे एक साथ बोल पड़े।

तबतक वे तीनों पास आ गईं । सुलोचना बोली- “यह सब छोड़िए आप!   यह बताइए इतना दुःख अकेले क्यों सह रहे हैं ? यकीन मानिए आप सबको कुछ नहीं होगा, बस अपनी इच्छा शक्ति मजबूत रखिए। बिना कुछ बताए इतने दिनों से अकेले,  इतना तनाव क्यों झेला आपने? अरे! जब हम लोग इतना प्यार करते हैं एक-दूसरे को, फिर हम सबको बताया क्यों नहीं आप सबने?”

“और यह क्या? आप सबके चेहरे पर बारह क्यों बज रहे हैं?” कहते हुए छवि मुस्कुराते हुए सजग के पास खड़ी हो गई।

“तुम सब..” बोलते-बोलते नन्दू ने पूजा को गौर से देखा । गहरे सुर्ख लाल रंग का सिन्दूर उसके चेहरे की कांति को बढ़ा रहा था। बड़ी सी लाल बिन्दी और मैहरून साड़ी में पूजा इतनी सुन्दर लग रही थी कि वह अपलक उसको देखता रह गया।

सुलोचना की गहरी -बड़ी ऑंखों को देखते ही शिशिर ने खुशी से अपनी ऑंखें बन्द कर लीं । अचानक ही दोनों की ऑंखें मुस्कुराने लगी थीं!और सजग! वह तो छवि का हाथ पकड़कर एकदम बावरा सा हो गया था!

वे तीनों अपनी नकारात्मकता से उबर चुके थे। अपने प्रियजन को निकट पाकर आसन्न मृत्यु-बोध से जूझने के लिए अब वे खुद को जिजीविषा से भरा-पूरा पा रहे थे।

रश्मि लहर

इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

मोबाइल नंबर –9794473806

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