डॉ.मुक्ति शर्मा की जिगोला कहानी का सबसे बड़ा संदेश है कि स्त्री को केवल जिम्मेदारियों और त्याग की मूर्ति समझना बंद कीजिए। उसे भी प्रेम, सम्मान, संवाद और साथ की जरूरत है।यह कहानी किसी जिगोलो की कहानी भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जो पुरुष के अकेलेपन को सहज और स्त्री के अकेलेपन को सवालों के घेरे में रखता है।“हर औरत के भीतर एक जिगोलो रहता है, जो पैसे नहीं, थोड़ा-सा सुना जाना मांगता है।” कहानी की अंतिम पंक्ति बहुत प्रभावशाली है। हर औरत के भीतर एक जिगोलो रहता है, जो पैसे नहीं, थोड़ा-सा सुना जाना मांगता है।
जिगोला\ कहानी
मेरा नाम सुनिता है। उम्र चालीस। जम्मू में रहती हूँ। पति को गए चार साल हो गए। बेटा पुणे में है। घर में दो कमरे, एक रसोई, और बहुत सारी खाली दोपहरें।उन दोपहरों कि मैं खुद साक्षी हूं जो दर्द मैं झेल रही हूं शायद ही कोई झेल सकता है।”दर्द उसे अकेलेपन का”विनय के जाने के बाद ऐसा लग रहा था कि जैसे दुनिया से सभी रंग ही चलेंगे हो ,सब रंग फीके लगते थे।

किसी चीज में मेरा मन नहीं लगता मैं हमेशा उदास रहती थी। बच्चे अपनी अपनी जगह पर थे और मैं अपनी जगह पर खाली मकान खाली दीवारों को देखती रहती थी।
“काश कोई होता जिससे मैं अपने दिल की बात कह पाती?”
उस दिन भी ऐसी ही एक दोपहर थी। लेखक गाँव की मीटिंग में किसी ने कहा था – “सुनिता जी, आप हमेशा औरतों के दुख पर लिखती हैं, कभी औरतों की इच्छा पर भी लिखिए।”
इच्छा। इस शब्द पर मैं अटक गई। चालीस की उम्र में औरत की इच्छा कैसी होती है? भूख जैसी? नींद जैसी? या कहवा की तरह, जो ग्यारह चीजों से बनता है पर नाम एक ही होता है।हम औरतें कहां अपने बारे में सोचती हैं ।कहां अपनी इच्छाओं का ख्याल रखती हैं।बस घर के कामों में और घर वालों को खुश रखने के चक्कर में अपनी सारी जिंदगी समर्पित कर देती है। शायद यही भारतीय संस्कृति है।जिसमें औरत को त्याग और तपस्या की मूरत बनाकर रख दिया जाता है।
अपने डेस्कटॉप पर बैठकर कुछ लिखने के लिए।रात को इंस्टाग्राम पर स्क्रॉल करते हुए एक प्रोफाइल आया। लड़का। नाम – आरव। उम्र सताईस। लिखा था – “Jigolo in Jammu. For Lonely Hearts. Listening, Company, Dinner. No Cheap Talks.”
देखकर बड़ी हैरानगी हुई।मैंने बीस मिनट तक उसकी प्रोफाइल देखी। उसकी आँखें मेरे बेटे जैसी थीं। थकी हुई। मैंने मैसेज किया – “सुनना आता है तुम्हें?”
जवाब आया – “जी, आता है। दो हजार एक घंटा।”
मैंने लिखा – “कहवा पिलाऊँगी, पैसे नहीं दूँगी। आओगे?”
उसने लिखा – “एड्रेस भेजिए।”
उसने मेरा निमंत्रण जल्दी इस स्वीकार कर लिया।वो शाम सात बजे आया। बारिश हो रही थी। सफेद शर्ट, जो थोड़ी पुरानी थी पर इस्त्री की हुई। हाथ में छोटा बैग।
“अंदर आ जाऊँ?” उसने पूछा।
मैंने कहा – “हाँ। चप्पल बाहर।”
मैंने उसके लिए कहवा बनाया। वही ग्यारह चीजों वाला। केसर, दालचीनी, इलायची, लौंग, गुलाब, बादाम, अखरोट, शहद, अदरक, ग्रीन टी और पानी। आखिरी चीज पानी ही तो है, जिसके बिना कुछ बनता ही नहीं।
उसने कहवा पीते हुए कहा, “आप लेखक हैं न? मैंने आपका नाम सुना है।”
“तुम क्या करते थे इससे पहले?” मैंने पूछा।
“बी.टेक। इलेक्ट्रिकल। 2021 में पास किया। दो साल नौकरी ढूंढी। नहीं मिली। फिर दिल्ली में एक होटल में वेटर। वहाँ एक मैडम मिलीं। उन्होंने कहा – तू सुंदर है, बॉडी अच्छी है, ये काम कर। पहले लगा गाली दे रही हैं। फिर देखा – एक रात का पांच हजार। मेरी माँ की दवाई का खर्चा निकल गया।”
वो ऐसे बता रहा था जैसे कोई दुकान का हिसाब बता रहा हो।
“तुम्हें शर्म नहीं आती?”
“आती थी। पहले तीन महीने रोज नहाते हुए रोता था। फिर आदत हो गई। मैम, शर्म अमीरों के लिए होती है। गरीब के लिए तो सिर्फ पेट होता है।”
मैं चुप हो गई। मेरी कहानियों में जो औरतें थीं, वो भी तो यही कहती थीं। शर्म की बातें किताबों में अच्छी लगती हैं, जिंदगी में नहीं।
“औरतें क्या चाहती हैं तुमसे? सच बताना।”
उसने लंबी सांस ली।
“तीन तरह की औरतें आती हैं मैम। पहली – पच्चीस से पैंतीस की, जिनके पति बाहर रहते हैं। वो सेक्स चाहती हैं, सीधा। दूसरी – पैंतीस से चालीस की, जिनके पति साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं। वो चाहती हैं कोई उन्हें देखे। कहे – तुम आज सुंदर लग रही हो। तीसरी – आप जैसी। चालीस से ऊपर। वो सेक्स नहीं चाहती। वो चाहती हैं कोई बिना कुछ मांगे, उनके पास बैठे।”
“मैं तीसरी में आती हूँ?”
“हाँ।”
“तो तुम मेरे साथ क्या करोगे?”

“कुछ नहीं। बस बैठूँगा। आप बोलेंगी, मैं सुनूँगा। अगर आप कहेंगी तो हाथ पकड़ लूँगा। बस।”
उस रात वो दो घंटे बैठा। मैंने उसे अपने पति की मौत के बारे में बताया। कैसे आखिरी दो साल वो बिस्तर पर थे और मैं उनकी नर्स बन गई थी। पत्नी से नर्स बनने का दुख क्या होता है, ये किसी ने नहीं पूछा। उसने सुना। बीच में उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा। गर्म हाथ।
जाते हुए मैंने उसे दो हजार दिए। उसने पांच सौ वापस कर दिए। “कहवा के पांच सौ काट लिए। आपका कहवा महंगा है।”
ऐसा कहकर वो चल दिया।
उसके जाने के बाद एहसास हुआ।उसकी बातों में कितना सकुन था।क्या मुझे इसी सकून की तलाश थी।कुछ समझ नहीं आ रहा था।विनय के जाने के बाद कितनी अकेली हो गई थी।बच्चे आपने में मस्त थे।मैं घुटन महसूस कर रही थी।औरत की क्या कोई जरूरत नहीं होती?पति के साथ सब खत्म हो जाता है?मुझे अपने लिए जीना होगा।आपने बारे में सोचना होगा।अब वो हर मंगलवार आने लगा। हमने नियम बनाया – कोई सेक्स नहीं। सिर्फ बातें।

एक दिन उसने बताया कि उसकी मंगेतर है। गाँव में। उसे पता नहीं कि वो ये काम करता है। सोचती है वो जम्मू में किसी कंपनी में गार्ड है।
“शादी करोगे उससे?”
“करूँगा। पर पहले एक लाख जमा करना है। छोटी बहन की शादी के लिए। फिर ये काम छोड़ दूँगा।”
एक दिन मैंने पूछा – “तुम्हें कभी किसी क्लाइंट से प्यार हुआ?”
वो हँसा। “प्यार? मैम प्यार तो तब होता है जब दोनों खाली हों। यहाँ तो एक खाली है, दूसरा भरा हुआ है नोटों से या दुख से। पर हाँ, एक आंटी थीं। पचास साल की। कैंसर था उन्हें। आखिरी स्टेज। उन्होंने मुझे बुलाया। कहा – मुझे एक बार फिर औरत महसूस करना है। मरने से पहले। उस रात मैं रोया था। पहली बार लगा मैं जिगोला नहीं, आदमी हूँ।”
मैं उस रात टूट गया था।उस आंटी की पीड़ा देख कर,उनकी आंखों ने उस दिन बिना कुछ कहे सब कुछ कह डाला।मुझे लगा मेरी आँखों में आँसू आ गए। अड़तालीस की उम्र में औरत को सबसे ज्यादा डर किस बात का लगता है? बूढ़ी दिखने का नहीं, अनदेखी हो जाने का। कि अब कोई उसे औरत की तरह नहीं देखेगा। सिर्फ माँ, आंटी, मैडम की तरह देखेगा।उस औरत की मनःस्थिति ऐसी हो जाती है,वह कतराती हैं।
लेखक गाँव की एक दोस्त को मैंने बताया – एक जिगोला पर लिख रही हूँ। वो बोली – “सुनिता पागल हो गई हो? लोग क्या कहेंगे?”
कहते रहे मुझे फर्क नहीं पड़ता।
हम लेखक लोग हैं, अगर हम समाज को आईना नहीं दिखाएंगे तो कौन दिखाऐगा।इसलिए हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम समाज को ऐसी चीजों से रूबरू करवाए, जिनके बारे में उन्हें जाना आवश्यक है।यही तो साहित्य की दिक्कत है। हम वेश्या पर लिख सकते हैं, क्योंकि वो औरत है और दया की पात्र है। जिगोला पर नहीं लिख सकते, क्योंकि वो मर्द है और हमारे बनाए हुए मर्द के साँचे को तोड़ता है। मर्द तो पैसे देता है, लेता नहीं।पर सच क्या है? इस शहर में, इस देश में, हजारों लड़के ये कर रहे हैं। इंजीनियर, होटल मैनेजमेंट वाले, जिम ट्रेनर। क्योंकि नौकरी नहीं है। और हजारों औरतें उन्हें बुला रही हैं। क्योंकि सुनने वाला कोई नहीं है।
एक रात आरव ने कहा – “मैम, आप मुझ पर कहानी मत लिखना। मेरी माँ पढ़ लेगी तो मर जाएगी।”
मैंने कहा – “मैं तुम्हारे बारे में नहीं, अपने बारे में लिखूँगी। उस औरत के बारे में जो चालिस साल की है और फिर भी चाहती है कि कोई उसे कहे – तुम सुंदर हो। क्या ये पाप है?”
अराव मेरी बातें सुनकर हंस पड़ा मैंम आप तो वैसे भी इतनी सुंदर हो कुछ कहने की जरूरत नहीं।पिछले हफ्ते आरव का फोन आया। “मैम, मैं जा रहा हूँ। गाँव। बहन की शादी तय हो गई। ये काम छोड़ रहा हूँ।”
मैंने कहा – “आखिरी बार आओ। कहवा पिलाती हूँ।”
वो आया। इस बार नई शर्ट में।मैं इस बार सचमुच आरव को देखकर हैरान हो गई! आरव मुझे लगता है कि तुम्हें कोई मोटी पार्टी मिल गई है ?तुम्हारे पहनावे में तो बहुत अंतर आ गया है और तुमने लाख रुपया जमा कर लिया।
“जी उस दिन रात को जब माधुरी जी का फोन आया तो मैं हैरान हो गया उन्होंने कहा कि मुझे तुम्हारी जरूरत है मैं बहुत अकेला महसूस कर रही हूं।माधवी जी के पति दुबई में रहते हैं काम के सिलसिले आना-जाना नहीं होता शायद वह किसी दूसरी औरत के साथ वहां रह रहे हैं।तभी माधवी जी को मिलने नहीं आते पैसा समय-समय पर भेज देते हैं।”माधवी जी की जरूरत है उनको किसी के साथ की जरूरत है तभी तो उन्होंने मुझे बुलाया और बहुत सारे पैसे दिए, माधवी जी अब खुश हैं और मैं जा रहा हूं।
क्या सेक्स की जरूरत स्त्री को इतनी ज्यादा होती है कि वह इंतजार भी नहीं कर पाती।जब पुरुष अपने भावनाओं पर काबू नहीं कर सकता तो औरत की कोई गलती नहीं है शायद मान भी ले कोई यह रास्ता ज्यादा अच्छा लगा हो।
चलो आरव यह तो अच्छा हुआ कि तुम अपने घर जा रहे हो।
हमने कहवा पिया। मैंने पूछा – “अब क्या करोगे?”
“खेती। और एक छोटी दुकान।”
“और वो आंटी? तुम्हारी मंगेतर? उसे बताओगे?”
“नहीं। कुछ बातें बताने से बोझ बन जाती हैं। प्यार में कुछ बातें छुपानी पड़ती हैं।”
जाते हुए उसने मुझे एक कागज दिया। उस पर लिखा था – “सुनिता “जाते,जाते मैं आपको मूल मंत्र देना चाहता हूं।मैम गयारह नियम – एक औरत को जवान कैसे रहना चाहिए।”
- रोज कहवा पियो
- रोज एक नई भाषा का एक शब्द सीखो
- किसी से डरो मत
- इच्छा को गाली मत समझो
- अकेलेपन को दोस्त बनाओ
- हाथ पकड़ने से पहले दिल पकड़ो
- पैसे से ज्यादा सुनना कीमती है
- चालीस में भी लिपस्टिक लगाओ
- अपनी कहानी खुद लिखो
- किसी को जज मत करो
- आखिरी चीज – पानी की तरह बहते रहो
मैं रो पड़ी।वो चला गया। दरवाजा बंद हुआ। घर फिर खाली। पर इस बार खालीपन में एक महक थी। कहवा की, और एक सताईस साल के लड़के की, जिसने मुझे बिना छुए, फिर से औरत बना दिया।मैंने अपनी नई कहानी का पहला वाक्य लिखा -“हर औरत के अंदर एक जिगोला रहता है, जो पैसे नहीं, थोड़ा सा सुने जाना मांगता है।

डॉ.मुक्ति शर्मा
कश्मीर,मो.9797780901