खामोश जिंदगी \ कहानी - rashtrmat.com

खामोश जिंदगी \ कहानी

डॉ.रूक्म त्रिपाठी की खामोश जिन्दगी कहानी पाठक को खामोश कर देती है। यह कहानी बताती है कि कुछ लोगों से रिश्ते बिना कुछ कहे ही बन जाते हैं। उनसे अपनापन लगता है। इन रिश्तों में इंसानियत और आत्मीयता होती है। मरने के बाद भी अजनबी होने के बाद भी मन में और जेहन में बस जाते हैं। जो फिर कभी जाते नहीं। आखिर ऐसा क्यों होता है पढ़िये यह कहानी।

                                 खामोश जिंदगी \ कहानी

डॉ.रूक्म त्रिपाठी

गहरे नीले रंग की पैंट, फुल शर्ट और पंचम जार्ज के मुकुट के आकार का एक फुट ऊंचा गोल नीला टोप, पांव में चमड़े की चप्पल। शरीर का जितना हिस्सा दिखता, पूरा गहरे लाल रंग से रंगा हुआ।

हाथ में आईने का एक छोटा टुकड़ा, जिसे वह छह फुटा छरहरा जवान चमकाता “पिक पिक’ शब्द करता घूमता फिरता। ‘पिक पिक’ के अतिरिक्त उसके मुंह से कभी कुछ सुनाई नहीं देता। यह अजनबी कौन था? अचानक बांदा की सड़कों में कहां से आ गया? कोई नहीं जानता था। कोई कहता- ‘निराश ठुकराया प्रेमी होगा।’ एक ने कहा, ‘ज्यादा पढ़ जाने से पागल हो गया होगा।’ ‘जी नहीं।’, एक ने अपनी बुद्धिमता का परिचय दिया, ‘कोई नामी जासूस है,जो वेश बदलकर किसी शातिर अपराधी को खोज रहा होगा।’ यानी जितने मुंह उतनी बातें। सब अपनी-अपनी भावना के अनुसार अनुमान लगा रहे थे।

उस अचानक प्रकट हुए अनजाने अतिथि का असली नाम क्या था, कोई नहीं जानता था। मगर सरजू पुकारने पर ठिठककर, बुलाने वाले को पल भर ध्यान से देखता। मुस्कराता। फिर ‘पिक पिक’ शब्द करता, आईना चमकाता आगे बढ़ बाता। वह कहां रहता था, इसका पता लगाने की शायद किसी ने जरूरत नहीं समझी।

सरजू किसी से कुछ मांगता नहीं था। लेकिन कोई देता, तो बिना खुशी जाहिर किए जैसे उसे लेने की गरज न हो, ले लेता।दिन में जैसे ही दो बजते, वह स्टेशन पहुंच जाता और झांसी से मानिकपुर जाने वाली पैसेंजर के रुकते ही इंजन के पास जाता और ड्राइवर के नीचे उतरते ही, उसके पास जितने पैसे होते, उसके हाथ में रख कर चल देता।

वह अंग्रेजों के शासन का युग था। तब ट्रेन के ड्राइवर की पोशाक सरजू की पोशाक की तरह ही गहरे नीले रंग की होती थी। इसलिए कुछ लोग यह भी अनुमान लगाते थे कि सरजू पूर्व जन्म में ट्रेन के इंजन का ड्राइवर रहा होगा। तभी उसका ड्राइवरों से इतना प्यार है।

एक दिन मैं उसके पीछे-पीछे स्टेशन गया। वह वहां जा खड़ा हुआ, जिस जगह इंजन लगता था। सात मिनट बाद ट्रेन वहां आकर रुकी। उस जमाने में ट्रेन आने पर लोग अपनी घड़ी का टाइम ठीक करते थे, तब ट्रेन एक मिनट के लिए भी लेट नहीं होती थी।

ट्रेन रुकते ही इंजन ड्राइवर उतरा। सरजू ने जेब से पैसे निकाल कर उसे दिए और बिना कुछ बोले चल दिया।

मैंने ड्राइवर से पूछा, ‘आप सरजू को कब से जानते हैं?’

वह चौंका। पूछा, ‘कौन सरजू ?’

वही, जो अभी आपको पैसे दे गया।’

वह हंस कर बोला, ‘उस पगले का नाम सरजू है? मैं नहीं जानता था। उससे मेरी कभी बात भी नहीं हुई।’

‘तब यह आपको पैसे क्यों दे गया?’

‘मुझे ही नहीं, जो भी ड्राइवर ड्यूटी पर होता है, उसे ही पैसे दे जाता है। मगर कुछ बोलता नहीं। शायद गूंगा है।’

‘गूंगा होता, तो सुन नहीं पाता। जबकि सरजू पुकारने पर रुक कर बुलाने वाले को देख कर मुस्करा देता है।’

‘जो भी हो। मुझे उससे पैसे लेना अच्छा नहीं लगता, क्योंकि वे भीख में मिले लगते हैं।’

मैंने कहा, ‘आपका अनुमान सही है। वे पैसे भीख में मिले होते हैं।’

‘अजी, एक दिन पैसे मैंने उसके सामने फेंक दिए। मुझे गुस्से में देखकर वह रो पड़ा और पैसा उठाए बिना चल दिया। विचित्र है आपका सरजू। अजीब अजूबा।’

हमने कहा, ‘यह आपकी तरह ही नीला फुल पैंट, पहनता है। कुछ लोगों का अनुमान है कि वह पूर्व जन्म ट्रेन का ड्राइवर रहा होगा।’

‘क्या रहा होगा, पता नहीं। पर उसका पैसा देना अच्छ नहीं लगता। हम उसके भीख के ये पैसे अगले किसी स्टेशन में भिखारी को दे देंगे।’

तभी गार्ड की सीटी बजते ही उन्होंने कहा, ‘चलें हरी झंडी हो गई।’

मुझे मौसमी बुखार हो गया। मौसम बदलते ही अक्सर पंच-छह दिन के लिए खाट पकड़नी पड़ जाती है।

सात दिन के बुखार में मुझे दो दिन सरजू सपने में दिखाई दिया। मैंने उसे बुलाया तो वह ठिठका।

पैछे मुड़कर मुझे देखा। फिर मुस्कराकर चल दिया।

मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि उसके प्रति मेरी ऐसी आत्मीयता क्यों? क्या लगता है वह मेरा? क्यों मैं उसे एक दिन न देखने पर बेचैन हो जाता हूं?

वह रोज मेरे दफ्तर के सामने वाली सड़क से  पिक- पिक’ करता गुजरता। मेरी सीट सड़क की तरफ   वाली खिड़की के पास होने से मैं उसे रोज दया। कभी-कभी देर तक दिखाई न देने से बेचैन हे उठता। तब काम में मन न लगता। मैं सोचता, यह सब क्या हो रहा है? सरजू चैन है मेरा? जिसकी एक झलक पाने के लिए मैं ऐसा बेचैन रहता हूं।

स्टेशन रोड पर गुप्ता रेस्टोरेंट था। सरजू उसी में एक टेबल के सामने बैठ जाता। उसके बैठते ही होटल का कर्मचारी चार  खारे बिस्कुट, पानी और बड़े कप मैं चाय रख जाता l

खा पीकर सरजू बिना पैसा दिए चल देता। मैंने सुना  सरजू नास्ता और टिफिन ही नहीं, दोनों समय या भोजन भी मुफ्त ही करता था। गुप्ता रिस्टोरेंट  का मालिक मनोज गुप्ता मेरा परिचित था l मैं केवल उसी की दुकान की चाय पीता था।

दार्जिलिंग वाली स्पेशल। एक दिन मैंने सहज भाव से सरजू को मुफ्त नाश्ता और भोजन कराने के संबंध में गुप्ता से पूछा तो उसने कहा, ‘जिस दिन इस रेस्टोरेंट का उ‌द्घाटन हुआ या प्रथम ग्राहक के रूप में सरजू ही आ बैठा था। मैं जानता था, वह खा-पीकर बिना बिल चुकाए चल देगा। किंतु मैंने सम्मान से उसको नाश्ता कराया।

उसके रहते ग्राहकों का ऐसा रेला आया कि संभालना मुश्किल हो गया। बाहर बेंच और टेबल लगवानी पड़ी। तब से ग्राहकों की वैसी ही भीड़ बनी हुई है। इसीलिए मैंने सरजू को अपने लिए ‘लकी’ मान कर उसे दोनों समय भोजन भी मुफ्त करने के लिए कह दिया।’ ‘क्या यह भोजन के समय कह कर कुछ मांगा भी करता है?”

‘नहीं शर्मा जी। भात, दाल रोटी या साग की ओर इशारा करके बता देता है कि उसे क्या और कितना चाहिए।’

यह सुनकर मैं सोचने लगा, गुप्ता के लिए सरजू ‘लकी’ है, भगवान है, पर तेरे लिए वह क्या है शर्मा? क्या मिलता है मुझे उससे? मान न मान, मैं तेरा आया।

मेहमान। तू जैसे उसकी एक झलक पाए बिना बेचचैन रहता है, क्या वह भी मुझे दिल से चाहता है? कदापि नहीं। वह तो बिना पकारे तेरी ओर देखता तक नहीं।

और एक तू ऐसा मूर्ख है कि उसे अपना समझ बैठा। छी। छी। यह कैसी बीमारी है रे!

क्या कहा, यह आत्मीय नहीं, तो सपने में क्यों दिखाई देता है। पगले, यह कौन सा आश्चर्य है। जिसे बहुत याद किया जाता है, वह यदाकदा सपने में दिखाई दे जाता है। उसके प्रति आत्मीयता का लगाव तेरी कोरी भावुकता के सिवा कुछ भी नहीं है।

ऐसा ख्याल आते ही मैंने सरजू को झटक कर दिमाग से दूर फेंक दिया। सोचा, सचमुच अस्सी हजार की आबादी वाले शहर में गुप्ता को छोड़कर कोई उसका दीवाना नहीं है और तू उसे जबरन अपना बना बैठा है। कैसा मूर्ख है तू, जा उसे भूल, अपने काम में लग।

और मैंने सचमुच सरजू को झटक कर विमान से दूर फेंक दिया। सोचने लगा, खामोश जिंदगी से कैसी यारी? यह भी जिसका कोई अता-पता नहीं। सही जानकारी नहीं।

सातवें दिन बुखार ठीक होने के बाद दफ्तर से शाम चार बजे चाय पीने गुप्ता रेस्टोरेंट गया, तो गुप्ता को एक कर्मचारी से कहते सुना, ‘कोई हमसे मिलने आए तो कह देना, सरजू को देखने अस्पताल गए हैं। साढ़े छह बजे तक लौटेंगे।

सरजू का नाम सुनते ही में चौंक उठा। पूछा, ‘क्या हुआ सरजू को।”

‘मलेरिया। पांच दिनों से बेहोश है।’

चाय भूलकर मैं भी गुप्ता के साथ हो लिया। फिर कम्बख्त भावुकता लौट आई। दिमाग ने पूछा, ‘सरजू कौन है तेरा, जो उसे देखने के लिए बेचैन हो उठा।’ दिल ने कहा, ‘पूर्व जन्म का कोई न कोई रिश्ता तो है। तभी मुझे अपनी ओर खींच रहा है।

अस्पताल पहुंचने पर सरजू का इलाज कर रहे डॉक्टर ने गुप्ता को एक डेथ सर्टीफिकेट थमाते हुए कहा, ‘एक घंटा पहले हमने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, पर मौत के आगे किसी का वश नहीं चलता। रोगी बेहोशी में ही चल बसा।’

श्मशान में गुप्ता ने सरजू को मुखाग्नि देना चाहा, तो आत्मीयता की भावुकता फिर विजयी हुई और गुप्ता के हाथ से आग छीनकर यह कार्य मैंने ही  किया। श्राद्ध के बाद गुप्ता रेस्टोरेंट गया, तो नाम बोर्ड बदला पाया। अब उसका नाम ‘गुरुदेव सरजू रेस्टोरेंट’ हो गया था।

भीतर दीवार पर सरजू की फोटो टंगी थी, जिस पर रजनीगंधा की ताजा माला चढ़ी थी। पास ही आईने का यह टुकड़ा रखा था।

उस दिन में न वहां अधिक देर रुका, न ही चाय पी। फोटो को प्रणाम कर आंसू बहाते बाहर निकल रास्ते में मैं सोचता जा रहा था, ‘वह कौन थी खामोश जिंदगी, जो बिना बोले बतियाए मुझे अनचाहे आत्मीय बनाकर चली गयी l

 डॉ.रूक्म त्रिपाठी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *