डॉ उपासना दीक्षित की कविता - rashtrmat.com

डॉ उपासना दीक्षित की कविता

डॉ उपासना दीक्षित की काकरोच  कविता केवल “काकरोच” पर नहीं, बल्कि व्यवस्था, न्याय और युवाओं की उपेक्षा पर तीखा व्यंग्य है। कवि ने काकरोच को घृणा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने वाली जिजीविषा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।

डॉ उपासना दीक्षित की कविता

काकरोच 

क्या सराहा जा सकता है

उस देश का भाग्य

जहां न्याय के तराजू में बैठा दिया जाए

देश के युवा को

काकरोचों के साथ

यह गाली, दुर्भावना या सराहना

अच्छा हुआ कि न्यायाधिपति ने आदेश नहीं दिया

पैरों तले कुचलने का

अवसर निगलने की आदत

व्यवस्था में फंगस

आखिर किसकी देन?

अगर जेनजी जनरेशन में कॉकरोचों जैसी

जिजीविषा ना होती

तो आप चाट जाते

युवाओं का अस्तित्व भी।

व्यवस्था से हारा व्यक्ति

देखता है न्यायपालिका की ओर

पर वहां भी सड़ांध

उस सीलन भरे गलियारे में

जहां जीवन हार जाता है

उस जगह

अदम्य जीवनी शक्ति के साथ

रह जाता है केवल

काकरोच

बिना सिर के भी

सत्ता में बैठे सिरफिरों से लड़ने का

जज्बा लिए..

डॉ उपासना दीक्षित ,गाजियाबाद उ.प्र.

मोबाइल नं 9015292022