जय प्रकाश मानस की लघु कथाएं अपने समय के ज्वलंत समस्याओं का दस्तावेज है। इनकी लघुकथाओं में केवल सवाल ही नहीं है बल्कि जीवन,चिंतन और व्यवस्था के चेहरे पर तमाचा भी मारती है।वैचारिक खुलापन और सजगता के साथ अपने समय, समाज और संघार्षो का मूल्यांकन भी करती है। उनकी लघुकथा पढ़िये और खुद से सवाल करिये।
किताबों का मोल
फटे जूते में अँगूठा दिखता वह लड़का रोज़ आता। एक पुराना स्कूल बैग जिस पर लाल रंग से किसी का नाम मिटाकर उसका नाम लिखा था। “सर, कल वाली किताब ख़त्म कर दी!” उसकी आँखों में चमक देखकर मैं अगली पुस्तक निकालता।
एक दिन उसने नीलकमल प्रकाशन के स्टाल की तस्वीर दिखाई,”सर, ये ‘गोदान’ लेना है।” मैंने देखा, उसकी उँगलियों के निशान किताब के पन्नों पर छप गए थे, मानो वह बार-बार उन्हें छूकर अपना हक़ जता रहा हो।
“क़ीमत देखी?” मैंने पूछा।
उसने ज़ेब से पचास रुपये निकाले। “तीन महीने बचाए।” उसके घर की रसोई में चीनी की ख़ाली डिबिया की याद मेरे ज़हन में कौंध गई।अगले दिन वह नहीं आया। अस्पताल के बेड पर पड़ा था। पिता की तनख़्वाह से किताब का पैसा निकालने की ज़िद में मार खाई थी। उसके पिता की टूटी चप्पलें कोने में पड़ी थीं, जैसे उनके संघर्ष का साक्ष्य। उसकी मुट्ठी में सिकुड़े नोट अब भी थे, पर उसकी आँखें अब भी उस किताब को तलाश रही थीं।
मैंने नई प्रकाशित ‘प्रेमचंद संचयिता’ उसके सीने पर रख दी। किताब के आवरण का लाल रंग उसके जख़्मों से टपकते खून से मिलता-जुलता था।
नई शिक्षा
परीक्षा हॉल में प्रश्नपत्र बाँटते हुए शिक्षक ने घोषणा की,”आज 21वीं सदी के कौशलों का मूल्याँकन है।”
पहला प्रश्न : व्हाट्सएप पर फ़ेक न्यूज़ कैसे वायरल करें?
राहुल ने फटाफट अपने पाँच ग्रुप्स का स्क्रीनशॉट चिपकाया। अतिरिक्त अंक मिले,‘एडमिन कौशल’ के लिए।
दूसरा प्रश्न : धार्मिक नफ़रत के लिए क्रिएटिव रील्स कैसे बनाएँ?
प्रियंका ने तुरंत एक एडिटिंग ऐप खोला। उसके ‘हिंदू-मुस्लिम’ टैग वाले वीडियो को फुल मार्क्स मिले।
तीसरा प्रश्न : सरकारी नीतियों की वैज्ञानिकता सिद्ध करें।
अभिषेक ने बिना सोचे लिख दिया-“दिल्लीवाले साहब ने कहा तो सही ही होगा।” उसे ‘राष्ट्रभक्ति’ श्रेणी में प्रथम स्थान मिला।
अंतिम प्रश्न : गोमूत्र और गौमय के आर्थिक उपयोग लिखें।
सभी छात्रों ने एकस्वर में उत्तर दिया – “कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी!”
परीक्षा परिणाम : सभी उत्तीर्ण। एकमात्र असफल वह छात्र था जिसने ‘तर्कशक्ति’ और ‘मानवता’ जैसे पुराने पाठ्यक्रम के शब्द लिख दिए थे।

चैनल सर्फ़िंग
टीवी का बटन दबाते ही स्क्रीन पर एक काला बुर्का झलकता है। नक़ाब के भीतर से आँखें चमक रही हैं वह हाथ में छुरा लहराता है। और “काफ़िरों” की गर्दनें कटती दिखाई देती हैं। मेरी उँगलियाँ रिमोट पर सहम जाती हैं। चैनल बदलता हूँ।
अब स्क्रीन पर गेरुआ वस्त्र धारी एक आकृति है। इसके हाथ ख़ाली हैं, पर मुँह से निकले शब्द छुरों से भी तीखे हैं। “वंदे मातरम के विरोधियों का सफाया करो!” ये शब्द लाखों टीवी स्क्रीन्स से होकर करोड़ों दिमाग़ों में रिस रहे हैं। मैं फिर बटन दबाता हूँ।
अगले चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ है,किसानों की लाशें सड़क पर पड़ी हैं, सैनिकों के कटे सिर गड्ढों में हैं, औरतों के शव नदी में अटके हुए हैं। स्टूडियो में बैठे एंकर का चेहरा उत्साह से चमक रहा है, “अच्छे दिन आ गए हैं!” मैं टीवी बंद कर देता हूँ।
अँधेरे कमरे में बैठा मैं जानता हूँ, ये छुरे अब और नज़दीक आ गए हैं। वे अब मेरी दीवारों पर लटके कैलेंडर में हैं, मेरी किताबों के बीच दबे हैं, मेरी चाय में तैर रहे हैं।आज पहली बार समझ आया कि भीष्म साहनी के ‘तमस’ का दर्द क्या था,जब हिंसा टीवी स्क्रीन से उतरकर आपकी चाय की चुस्कियों में घुल जाए।

देवभाव
एक दिन मन्दिर के प्रांगण में दो भक्त मिले। पहला हाथ जोड़कर नमस्कार करता रहा, दूसरा सिर्फ सिर हिलाकर आगे बढ़ गया।देवता ने प्रतिमा से कहा,”देखो, पहला मुझे पाना चाहता है, दूसरा मेरे जैसा बनना चाहता है।”तभी तीसरा भक्त आया,उसने न तो प्रणाम किया, न सिर हिलाया। वह सीधा प्रतिमा के सामने बैठ गया, जैसे कोई पुराना परिचित हो।
देवता चौंके,”यह क्या कर रहा है?”
प्रतिमा मुस्कुराई,”यह वही है जिसे हम ढूँढ़ते हैं।जिसने समझ लिया कि देवत्व खोजने की नहीं, जीने की वस्तु है।”
उसी क्षण मन्दिर की घंटियाँ स्वतः बज उठीं – न तो किसी के झुकने से, न हिलने से।
माँ की चूड़ियाँ
सुबह के चार बजे थे जब मालती ने अपनी छोटी बेटी का हाथ छोड़ा। बच्ची की उँगलियाँ उसकी चूड़ियों से छूटते ही सिकुड़ गईं, जैसे कोई फूल की पंखुड़ी सिमट रही हो। “माँ नहीं आएँगी आज,” बच्ची ने सोते-सोते कहा था। मालती ने उसके गाल पर आँसू छोड़ दिए,वह जानती थी कि दिन भर में यही एक बार होगा जब कोई उसके आँसू देख पाएगा।
सियालदह स्टेशन पर उतरते ही उसने अपनी साड़ी के पल्लू से चेहरा ढँक लिया। शर्म से नहीं, धुएँ और धूल से। ट्रेन से उतरने वाली सैकड़ों औरतें एक साथ साँस लेतीं तो हवा में कालिख की परत जम जाती।
“बाबूजी, चाय!” फ्लैट नंबर 5सी के बालकनी दरवाज़े पर खड़े होकर उसने आवाज़ दी। अंदर से आवाज़ आई,”आज दस मिनट लेट हो?” मालती ने घड़ी नहीं देखी। उसकी घड़ी तो वह पल था जब उसकी बेटी ने उसे जाने दिया था।
घर लौटते वक़्त रात के आठ बज चुके थे। स्टेशन पर एक औरत गिर पड़ी, थकान से या भूख से, कोई नहीं जानता। भीड़ ने उसे पार कर लिया, जैसे नदी पत्थर को। मालती ने उसे उठाया। उसकी साड़ी में लिपटी महिला का शरीर इतना हल्क़ा था जैसे कोई ख़ाली थैला हो।उस रात मालती ने अपनी बेटी को जगाकर चाय पिलाई। बच्ची ने पूछा,”माँ, तुम्हारे हाथ काँप क्यों रहे हैं?”
“क्योंकि आज मैंने किसी और की माँ को उठाया था,” मालती ने कहा, “और तब समझ आया कि हम सबकी माँएँ एक ही तरह से गिरती हैं।”
बच्ची ने उसके हाथों में अपना चेहरा दबा लिया। दोनों के आँसू एक हो गए,जैसे कोई नदी अपने स्रोत में लौट आई हो।

बिना बटन का सपना
उस रात पिता ने मेरी टूटी हुई नींद को सीने की कोशिश की थी। मेरे कमरे में घुसते हुए उनकी उँगलियों में धागा और सुई थी,वही पुरानी अलमारी वाली सुई जिससे वे हमेशा मेरे स्कूल यूनिफ़ॉर्म के बटन टाँक दिया करते थे।
“क्या टूटा है बेटा?” उन्होंने पूछा। मैं चुप रहा। कैसे बताता कि यह कोई कमीज का बटन नहीं, बल्कि दिल्ली जाने का सपना था जो आज इंटरव्यू के बाद टूट चुका था?
पिता ने मेरी चुप्पी को भी सीने की कोशिश की। उन्होंने मेरे तकिए के नीचे छुपे रिजेक्शन लेटर को निकाला, उसे सावधानी से मोड़कर अपनी जेब में रख लिया, जैसे कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हो।
“यह कोई बटन नहीं है जिसे मैं सी दूँ,” उन्होंने कहा, “लेकिन टूटी हुई चीज़ों को जोड़ना ही तो हमारा काम है।”
सुबह जब मैं उठा तो मेज़ पर रिजेक्शन लेटर रखा था,उस पर पिता ने लाल स्याही से एक नया पता लिख दिया था: ‘संपादक, स्थानीय पत्रिका’। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था,’जो टूटता है, वही नया रास्ता बनाता है’।
उस दिन मैंने समझा कि कुछ सपनों के लिए बटन की ज़रूरत नहीं होती,बस एक पिता का धागा काफी होता है जो टूटे हुए को नया मोड़ दे दे।

संपर्क –
ए-7, फेज-3, सिया रेसीडेंसी
एमएमआई के पीछे, लालपुर
रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001
मो.- 9424182664
ईमेल- srijan2samman@gmail.com
