परदेशीराम वर्मा की कहानी गाँव बदर सिर्फ एक “ईमानदार मोची” की कथा नहीं, बल्कि सत्ता, न्याय और प्रतिरोध की कहानी है। आज के संदर्भ में यह कई स्तरों पर गहरा संदेश देती है।व्यवस्था अगर नैतिक न हो, तो ईमानदारी भी अपराध बना दी जाती है। अगर सत्ता अन्यायी हो।अन्याय पीढ़ी-दर-पीढ़ी आक्रोश पैदा करता है।हर अन्याय अगली पीढ़ी को अधिक कठोर बना देता है।
गाँवबदर\ कहानी
परदेशीराम वर्मा
चौमासे में कुम्हारी ढाबा मार्ग बन्द हो जाता है। हमारे गाँव से कुम्हारी की दूरी केवल तीन मील है, मगर बरसात में तीन मील ही जिवलेवा दूरी हो जाती है एक तो कन्हार मिट्टी से लदबदाता रास्ता ऊपर से उफनता चोरहा नाला ।
बरसात हो या आग बरसाता मौसम, हमारे गाँव का हरखू मेहर हर हाल में सप्ताह में एक बार कुम्हारी अवश्य जाता है।इतवार के दिन न जाय तो जियेगा कैसे ? सप्ताह-भर अकतरिया और पनही बनाता है और हर इतवार को कुम्हारी बाजार में बेच आता है । अकतरिया बनाने में हरखू का नाम है।आसपास के गाँवों की औरतें हरखू मेहर से अकतरिया खरीदना पसन्द करती है। अकतरिया में फुदँना गाँठना केवल हरखू जानता है।
इतवार के दिन सबेरे से अकतरिया हरपा,पनही, भँदई लेकर हरखू निकल जाता है और बियारी होते-होते तक बेचकर गाँव पहुँचता है। तब तक उसकी घरवाली भुखिया घोंटो और जिल्लो पिसान की रोटी बनाकर बिल्कुल तैयार बैठी रहती है।
भुरवा और चैती दो ही तो बच्चे हैं भुरवा पन्द्रह साल का है और चैती पांच साल की। अब तो कभी-कभार भूरवा भी हरखू के साथ बँहगी लेकर कुम्हारी बाजार जाने लगा है। भुरवा जब भी जाता है कुछ अधिक ही पैसा लाता है। हरखू है पुराना आदमी, उसे दबाकर, झिड़ककर लोग मनचाहे दाम में पनही खरीद लेते हैं मगर भूरवा अपनी मेहनत की पूरी कीमत चाहता है। वह झगड़ जाता है। इसलिए हरखू उसे कम ही ले जाता है। भुरवा बार-बार ग्राहकों से कीमत के लिए तो कभी सम्मान के लिए उलझ जाता है। उसे अरे हरखू कहकर शान बघारनेवालों से सख्त नफरत है। मोची हैं तो क्या आदमी नहीं है ? वह अपने बाप से कहता है। हरखू समझाता है बेटा, पुरखों ने सहा है, हमें भी सहना है । वे मालिक हैं, हम नौकर ।
भुरवा नाराज हो जाता है-का ददा, क्या नौकर,अरे कैसा मालिक ? कोई हमें पोंसता है क्या ? मेहनत करते हैं तो इज्जत से जियेंगे। रोकर नहीं ।
और हरखू चुप हो जाता है ।
एक इतवार को हरखू संझा बाती के समय ही बाजार से लौट आया । पनही अकतरिया सब साथ थे। भूरवा ने जब जल्दी लौट आने का कारण पूछा तो हरखू ने बहाना बनाकर टाल दिया कि नरवा में पूर है इसलिए जा नहीं सका ।
खा-पीकर दोनों बच्चे सो गये। भुखिया भी घर का काम निपटा कर सोने लगी हरखू तो इसी अवसर की ताक में था। उसे नींद ही नहीं आ रही थी। उसने भुखिया को मचिया के काबा भर पोटारकर उठाया। भुखिया को आश्चर्य हुआ। उसने झिड़कना भी चाहा मगर हरखू ने चुप कराते हुए कोने में रखी बटलोई की ओर इशारा किया ।
भुखिया की आँखें चौंधिया गयीं। भुखिया ने लगभग गिरते हुए बटलोई को उठाया। पुरानी बटलोई थी। थी तो छोटी ही पर उठाये न उठती थी। हरखू ने बड़े रहस्यमय ढंग से भुखिया को निहारा। भुखिया कुछ समझ न पायी। कुछ-कुछ घबरा सी गयी। हरखू अब मूँछों में मुस्कुरा रहा था । भुखिया से रहा नहीं गया। उसने लगभग चीखते हुए पूछा -कहाँ डाका डाल आये धनी। ऐसा तो कभी नहीं करते थे। पुलुस चाकर सिपाही से जनम भर डरे अब बुढ़ापे में तुमको क्या हो गया… और लद-लद, लद-लद काँपने लगी ।
हरखू रोसिया गया। उसे अपनी औरत की आदत मालूम है। बात-बात पर सन्देह प्रगट करना। अनिष्ट की आशंका से काँपने लगना। हमेशा अन्देसे में रहना भुखिया की आदत है ।
आखिर भूखिया रोने की मुद्रा में आ गयी। यह किसी भी सीन का चरमोत्कर्ष होता है । भुखिया हमेशा अपने इस अमोघ अस्त्र का प्रयेाग अन्त में करती है । बैठ जाती है और हाय मोर दाई ओ, मैं का करि डारेंव महतारी …आदि-आदि वाक्यों को धुन में रोने लगती है । पूरे सन्तुलन के साथ। भुखिया के रोने में एक तरन्नुम होता है। एक सधाव, अभ्यस्त गायक की तरह । भुखिया जब रोने लगती है हरखू वहाँ से हट जाता है। कभी-कभी लात घूँसा भी चला देता है। भुखिया का स्वर और तीव्र हो जाता है। हमेशा ही ऐसा होता है किन्तु आज मामला ही कुछ और था। हरखू समझता था। भुखिया तो मूरख थी। बिगड़ी बात को तो हरखू ही सँभालता था। उसने अवसर को देखते हुए कुछ पुचकारते हुए भुखिया को उठाया । उसे बड़े प्रेम से पास बिठाया। चोंगी सिपचाते हुए उसने भुखिया को सारी बात सिलसिले से बतायी। देख भुखिया, तू हमेशा ही वैसी की वैसी ही रहेगी,मैं जीवन भर मजूरी करके तुमकों पोस रहा हूँ। अब क्या बुढ़ापे में डाका डालूँगा ? भकली, मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं ।
यह बटलोई तो मुझे भगवान ने दिया है। नाला में पूर को देखकर मैं किनारे-किनारे कुदान के लिए जगह देखता हुआ बढ़ रहा था। एक जगह बैठकर बीड़ी पीने लगा। वैसे ही एक पत्थर को हाथ में उठाकर देखा तो पत्थर के नीचे भी पत्थर निकला। एक के ऊपर एक पत्थर । धीरे-धीरे पत्थर को उठाता गया । अन्त में बटलोई को रखा हुआ देखा। पहले तो बटलोई को मटका समझ रहा था मगर मिट्टी हटाते ही ताँबे की बटलोई चमचमाने लगी। डरते-डरते बटलोई को निकाला। उसमें दगदगाता हुआ यह सब निकला। सूँता, चैनफाँस की करधनी, खिनवा, टोंड़ा, बहुंटा और हँसली। भुखिया मैंने तो इन गहनों को जीवन में छूकर भी नहीं देखा था। पहले तो चारों ओर देखा, अँधियारा घिर आया था। मैंने धीरे से बटलोई उठा लिया। तुम्हें दिखाने के लिए लकर-लकर घर आया। अब तुम मुझे चोर-डाकू कह रही हो । इतना कहकर हरखू चुप हो गया। भुखिया को मुटर-मुटर देखने लगा ।’
भुखिया दुखी हो गयी। उसे बड़ा पछतावा हो रहा था। वह हरखू के पाँव में गिर गयी। मुझ मुरख को छिमा करो देवता। नरक में जाऊँगी। मालिक को चोर कह दिया। देवता पर कलंक लगा दिया ।
बस करो भुखिया। अब उठो कहते हुए हरखू ने उसे उठाकर पास बिठाया और मन्द-मन्द मुस्कराने लगा। भुखिया समझ नहीं पायी। हरखू ने कहा….गहनों को एक बार पहन तो लो भुखिया। दरपन में देखों तो बड़े गौंटनिन जैसी दिखती हो कि नहीं । और गहनों को एक-एक कर पहनाने लगा ।
भुखिया ने लजाते हुए पहन लिया, पहनकर भागते-भागते दरपन के पास गयी । पठेरा में एक टूटा दरपन रखा था, पूरा चेहरा तो नहीं दिखता था मगर हरखू के सामने गहनों से लदी भुखिया गद्गद् खड़ी रही । हरखू ने कहा कि भुखिया इतना तो गवना पर नहीं लजायी हो आज तो तीस साल छोटी लग रही हो । तन-मन से ।
कुछ देर के बाद सपना टूटा । हरखू ने कहा-भुखिया सब तो ठीक है मगर यह गहना पचेगा कैसे । गरीब से तो लोहे का खीला नहीं पचता, यह कुबेर का खजाना कैसे पचेगा ।
भुखिया भी समझ गयी । उसने हरखू के सामने सब गहना उतार दिया । फिर से बटलोई में रख दिया। दोनों ने तय किया कि गहनों से भरी बटलोई को बड़े गौंटिया को सौंप दिया जाय ।
गाँव में सोआ पड़ गया। हरखू जाग रहा था। अधतरिया होने को आया। हरखू ने बाहर निकलकर देखा। आसमान में नागर-कुटेला को देखकर उसने सोचा कि अब चलने में देरी करना ठीक नहीं है ।
बगल में बटलोई को दबाये हरखू चुपचाप दाऊ के घर की ओर बढ़ रहा था। गली के कुत्तों ने भौंकने की चेष्टा भी की मगर तुरन्त पहचान कर चुप हो गये। हरखू जब भी मरे हुए मवेशियों को काटता था, बड़े प्रेम से लादी-पोटा को कुत्तों को देता था। कुत्तों ने उसके आगे पीछे कुँकुवाना शुरू कर दिया। हरखू आगे बढ़ गया ।
डरते-डरते हरखू दाऊ के बाड़ा के सामने पहुँच गया । उसने धीरे से आवाज दिया, दाऊ हो …
चारों ओर सन्नाटा । केवल दाऊ के कुत्ते ने हरखू को भौंककर जवाब दिया । हरखू ने फिर पुकारा…दाऊ हो….ये दाऊ… अब धीरे से बाड़ा का दरवाजा खुला । दाऊ ने कहा – कौन है बे ?
मैं आँव दाऊ ।
कौन हरखू मेहर
हाँ ददा, मेहर हरखू ।
कैसे आये बे, रात को भी सोने नहीं देगा ।
कुछ लाया हूँ दाऊ बटलोई में । इतना सुनना था कि दाऊ का स्वर स्नेहसिक्त हो गया ।
उन्होंने दोनों कपाट खोल दिये । हरखू अन्दर चला गया । दाऊ ने आव देखा न ताव, हरखू के हाथ से बटलोई ले लिया । हरखू ने रोका – दाऊ छुवा लगेगा । रात को नहाना पड़ेगा, दूर ही रहिए । दाऊ ने कहा-क्या कहते हो हरखू, अब का जमाना ही तुम लोगों का है । सरकार ने तुम्हें भी हमारे बराबर माना है । फिर यह तो लक्ष्मी है, लक्ष्मी में छुवा नहीं लगता ।
और दाऊ ने बटलोई को खोल दिया । दाऊ हक्के-बक्के रह गये । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि बटलोई में इतनी लक्ष्मी होगी। वह तो बटलोई को ही लक्ष्मी मान रहे थे। अन्दर तो साक्षात कुबेर का खजाना था । दाऊ गद्गद हो गये। उन्होंने हरखू को तुरन्त निकालकर सौ रूपये दे दिये। हरखू चुप रह गया । दाऊ ने पूछा तक नहीं कि बटलोई कहाँ से मिली। हरखू ने ही बताया। हरखू ने हाथ जोड़कर कहा दाऊ जी बचा लेना । मुझसे यह पचेगा नहीं। आप जो चाहें दे दें । मैं गरीब आदमी हूँ, आपसे पच जायेगा ।
दाऊ ने हरखू को आश्वस्त किया, एक बोरा दुबराज चाउर भी देने का वचन दिया। हरखू हल्के मन से दाऊ के घर से विदा हो गया।
दाऊ ने बड़े गौंटनिन को जगाया । गौटनिन नाराज हो गयी । आँख खोलते हुए गौटनिन ने दाऊ को झिड़का-कुछ तो होगा नहीं बस उठाना भर है। दाऊ को तो ऐसी बातें सुनने की आदत थी । दाऊ की सुखी गृहस्थी केवल इसी सहनशक्ति के कारण तो बरकरार थी। दाऊ ने बाँह पकड़कर गौटनिन को उठा दिया । गौटनिन को भी अजीब लगा । रात को तो दाऊ इस तरह शेर कभी नहीं बनते । गौटनिन ने पूछा कुछ खाये-पिये हो क्या ?
दाऊ ने हँसते हुए जवाब दिया-हाँ धन का नशा पीकर तुम्हें उठा रहा हूँ । तुम भी पी लो । उठो देखो ।
गौटनिन ने देखा। दंग रह गयी । मगर चुप नहीं रही। उसने दाऊ की ओर हँसते हुए देखकर कहा – हमारे मायके में तो बचपन में ऐसी कई बटलोई हमारे ददा ने खुदवाकर गड़वा दिया था। झौहा-झौंहा सोना और टुकना-टुकना चाँदी । दाऊ सब जानते थे । वही सुनते-सुनते तो बुढ़ा रहे हैं। गौटनिन का मायका तो जो था सो दाऊ को ही पता है। टठिया न लोटिया फोकट के गौंटिया । ऐसे थे दाऊ के ससुर गौंटिया मगर चुप रह गये । अवसर ही ऐसा था । वैसे वे गौटनिन के आगे चुप ही रहते थे ।
गौटनिन को सब किस्सा दाऊ ने बता दिया । गौटनिन ने कहा-हो सकता है उसके पास एक और बटलोई हो। तुम तो हो भोले-भाले, एक तुम्हें दे गया एक रख लिया । क्या गौंटी करते हो । खाल खिंचवा लो हरखू का। उसकी ये हिम्मत। हमारे गाँव में हमारी मेहरबानी पर जीये और हमें ही धोका दे ।
दाऊ को बात लग गयी। उन्होंने अपने गुण्डों को बुलवाया। उन्हें कुदाल दिया। हाथ में लाठी दी और हरखू के घर भेज दिया ।
हरखू अभी सो भी नहीं पाया था। गुण्डे पहुँच गये। मुख्तियार भी पहुँच गये । उन्होंने हरखू से दूसरी बटलोई की माँग की। हरखू पाँव में गिर कर गिड़गिड़ाने लगा। वे नहीं माने। उन्होंने पहले तो हरखू को हल्के डण्डे से पीटा फिर बाँधकर चाबुक से हरखू का सत्कार करने लगे । हरखू की औरत गिड़गिड़ाने लगी ।
भूरवा से रहा नहीं गया। उसने चाबुक को पकड़ लिया। सबने हरखू को छोड़ दिया केवल भूरवा पर मार पड़ने लगी । मार-पीटकर जब थक गये तब खुदाई शुरू हुई । उन्होंने घर का कोना-कोना छान लिया। जगह-जगह को खोदकर देखा, जब कुछ नहीं मिला तो साथ में लाये दुबराज चावल के बोरे को वहीं पटककर चल दिये ।
उन्होंने दाऊ को जाकर सब बता दिया ।
अल्सुबह कोटवार ने हाँका डाल दिया – दाऊ के गुड़ी में बैठक है, सब गाँव के लोग वहीं जल्दी सकलाओ ।
गाँव भर के लोग उठ गये, मण्डल आ गये । गौंटिया सबसे बाद में घर से निकले । उन्होंने सबसे राम-राम स्वीकार किया । अभी बात शुरू ही हुई थी कि थानेदार साहब भी पहुँच गये ।
कुछ खुसुर-पुसुर हुई । दाऊ के साथ थानेदार साहब कुछ देर के लिए बाड़ा के अन्दर गये । वापस आकर थानेदार साहब ने लोगों की ओर देखते हुए ललकारा-कौन है बे हरखू मेहर ।
एक कोने पर से हरखू काँपते हुए उठा। उसने हाथ जोड़कर कहा-मालिक मैं तो हूँ। आप सबका गुलाम ।’
गुलाम के बच्चे । साले ये बता कि रात को दाऊ के बाड़े में आया था कि नहीं ।
हाँ साहेब आया था….बस इतना सुनना था कि थानेदार साहब खाट से उछल पड़े । लगे लात जमाने हरखू पर । साथ-साथ चीख भी रहे थे कि साले चोरी और सीना जोरी। हाँ साहब आया था.. तुझे मार डालूँगा साले ।
दाऊ ने थानेदार साहब को रोका । दाऊ ने हाथ पकड़कर थानेदार साहब को खटिया पर फिर बिठाया । हरखू के मुँह से खून निकल रहा था । दाऊ ने थानेदार साहब से कहा – साहेब अब बहुत हो गया। हम सरकार की नीतियों पर चलते हैं। यह अनुसूचति जाति का है । मारिये मत । इसे हम समझा लेंगे। क्या हुआ जो चोरी कर लिया। एक बोरा दुबराज ही तो चुराया है ।
थानेदार ने दाऊ की तारीफ की। वे सहृदयता और भलमनसाहत से प्रभावित हुए । फिर धीरे-धीरे मोटर साइकिल की ओर बढ़ने लगे । बाकी सब उन्होंने दाऊ पर छोड़ दिया । दाऊ जी ने थानेदार को यथायोग्य अर्पण कर सहर्ष बिदा किया ।
अब पंचायत चली । पंचायत दो घण्टे तक चली । दाऊ ने सबके सामने कहा – मैं हरखू को, उसके बाप को जानता हूँ । इसकी मति खराब हो गयी है जो इसने एक बोरा दुबराज के लिए बीपत खड़ी कर ली । मुझसे माँगता तो मैं वैसे ही दे देता ।
हरखू चुप था केवल भुरवा बेचैन हो रहा था। उसने कुछ कहने की कोशिश भी की किन्तु दाऊ के लठैतों के कारण कुछ कह नहीं सका ।
अन्त में दाऊ ने सबसे पूछा-भाइयों चोर को गाँव में रखें या न रखें, आप सब तय करेंगे । मैं केवल यह कहूँगा कि एक मछली पूरे तालाब को गन्दा करती है। मैं आप लोगों के बीच चोर नहीं बसाना चाहता । आप सबकी क्या राय है ?’
सबने एक स्वर में कहा – दाऊ, आप ठीक कहते हैं । इसे गाँव से निकाल देना ही ठीक है ।
और अन्त में दाऊ ने निर्णय दिया – हरखू, चोर-लुटेरों को सरकार जिलाबदर की सजा देती है । हम तुम्हें गाँवबदर की सजा देते हैं । इस गाँव से चले जाओ और जहाँ चाहो बस जाओ ।
हरखू की सजा तय हो गयी। भूरवा ने हरखू को सहारा देकर उठाया। दोनों घर आये। भुखिया ने घर का सामान बाँधा। एक टुकना में सबको रखा। हरखू ने अपने जवान हो रहे बेटे से कहा-बेटा, अब मुझसे जानवर नहीं कटेंगे । मरे हुए जानवर की चमड़ी उतारने वाला सब औजार अब तू सँभाल ।
भूरवा ने अपने बाप को घूरकर देखा। वह आँगन की ओर बढ़ गया। उसने कुछ ढूँढा और एक कोने में रखी हुई एक बहुत पुरानी भारी टंगिया को झटके से अपने कन्धे पर उठा लिया ।
भूरवा ने वहीं से अपने बाप को जोरदार आवाज में कहा-बाबू ! तुम्हारे औजारों को दाऊ के लठैतों के बनाये गड्ढों में भर दो । अब मरे हुए जानवरों की खाल नहीं उतारी जायेगी । अब तुम्हारे साथ तुम्हारा हथियार नहीं जायेगा । मेरे साथ मेरा हथियार जायेगा ।
और हरखू ने अपने हथियार फेंक दिये। भूरवा के मजबूत कन्धों का सहारा लेकर हरखू उठा और धीरे-धीरे चलकर टेंवना पत्थर की ओर बढ़ने लगा। यह वह पत्थर था जिससे हथियारों की धार तेज की जाती है ।
उसने जंग लगी कुल्हाड़ी थामे भूरवा को चिकना पत्थर देते हुए लम्बी साँस खींचकर कहा-बेटा, तुम्हारे हथियार ही सही हथियार हैं। जंग छुड़ा लेना। अपनी ओर से मैं केवल धार बनानेवाला यह पत्थर ही दे सकता हूँ। इसे टेंवना पत्थर कहते हैं। भोथले हथियारों पर इसी से हमारे दादा-परदादा शान चढ़ाते रहे हैं । अब जाकर समझा कि हम गलत हथियार पर शान चढ़ाते रहे ।
भूरवा ने पत्थर को अपनी दायीं हथेली में जोर से दबा लिया। पत्थर हाथों में कुछ ऐसा कसा कि खून रिसने लगा ।
कन्धे पर कुल्हाड़ी और हाथ में टेंवना पत्थर लिये भूरवा अपने बाबू और दाई सेकई फर्लांग देखते-ही-देखते आगे निकल गया। वह गाँव से गाँव के रास्ते पर नहीं चल रहा था। वह खार की ओर बढ़ रहा था। वह जानता था कि गाँव होगा तो दाऊ भी होगा और दाऊ के द्वारा मुकर्रर सजा उसे याद है। गाँवबदर की सजा वह दुबारा नहीं भुगतना चाहता था। वह कुल्हाड़ी के सार्थक इस्तेमाल के लिए कृतसंकल्प था ।
परदेशीराम वर्मा , रायपुर,छत्तीसगढ़
MO-9827993494


