सियासी पेड़ों से वोट झर रहे हैं\ विशेष लेख - rashtrmat.com

सियासी पेड़ों से वोट झर रहे हैं\ विशेष लेख

डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी का मानना है कि  नए दौर में चुनावों में वोट झर रहे हैं। वोटों का थोक प्रोडक्शन एक नया करिश्मा और नैरेटिव का बोलबाला है।दुष्टों ,लफ्फाजों और शब्दवीरों ने अपने को प्रमाणित करने के लिए या सही साबित करने के लिए एक कीर्तनियां उद्योग, बाबा उद्योग और महाझूठ को डिजिटल और भौतिक रूप में छुट्टा सांड की तरह छोड़ दिया है।जलवे झर रहे हैं।कोई कितना बचेगा अफवाहों से।

                      सियासी पेड़ों से वोट झर रहे हैं\ विशेष लेख

– डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी

आप कहते हैं सराफा गुलमोहर है ज़िंदगीहम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िंदगी ।

भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल,मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है ज़िंदगी ।”

रोशनी की लाश से अब तक जिना किया,ये वहम पाले हुए  साँसों शम्सो – क़मर है ज़िंदगी।”

(अदम गौंडवी)

कभी – कभी कोई अच्छी रचना पढ़ता हूँ तो दिल खुश हो जाता है। समय की चाल को क्या कहिए।दिल – विल, प्यार – वार निरंतर विस्थापित होते जा रहे हैं। सहिष्णुता , भाईचारा ,साझापन, स्वतंत्रता , समानता, अपनापन और मनुष्यता सड़कों, गलियों और पगडंडियों में भीख माँग रहे हैं। सब कुछ केवल दिखावा सा हो गया लगता है।समय बदलता जा रहा है। कब अपराधी, तड़ीपार और हत्यारा  सिंहासन बत्तीसी में पहुंच जाए।खूंखार इरादे और सत्ता व्यवस्था की चढ़ी हांडी में क्या ,- क्या नहीं पकाया जा रहा है,मानवीय भावनाओं का रास्ता छेंककर उन्हें हिंसा ,क्रूरता – नफ़रत और आवारा भीड़ बनाया जा चुका है।देश मक्कारी, हँसी – विनोद – मसखरी और बलात्कार की दुनिया के रूप में विकसित किया जा रहा है।इंसाफ़ ख़ज़हे कुत्ते की तरह हर जगह से दुरदुराया जा रहा है।आँखों से अच्छे दृश्य गायब हो चले  हैं। बार – बार अशांति, तानाशाहियत और जनतंत्र की हत्या का रिवाज़ विकसित होता जा रहा है।श्रुति कुशवाहा की पंक्तियाँ हैं – “रंग सारे ही जा चुके  थे कैनवास छोड़कर/ आवाज़ें छोड़ चुकी थीं सच का साथ/ सच नंगा था और शर्मिंदा भी /झूठ राष्ट्रगीत बन चुका था/”(विकास नामक कविता)

यह है हमारा परिदृश्य।इधर अरसे से देख और अनुभव कर रहा हूँ कि न जाने कितनी पढ़ी जाने वाली सामग्री अपठित रह जाती है। उनका प्रचार – प्रसार और विज्ञापन  ही नहीं होता और जो वाकई में किसी काम की सामग्री नहीं है, जो इंसानियत को टुकड़ों- टुकड़ों में,, बांटती हैं ।उनका विज्ञापन विभिन्न माध्यमों से किया जाता है। यह फंडा सरकार का है और कुछ सत्ता के अंदाज़ में फंसे इरादों वालों का भी है।कुछ घोषणावीर और ‘ फ्री थिंकर्स टाइप ‘ के लोग न इधर के होते और न उधर के। वो अंततोगत्वा ढ़ाई- सवा पाँच ही होते हैं।अन्य कामों का और इरादों का यही हश्र होता है।वे उपयोगिता के बल पर नहीं बल्कि झूठे विज्ञापनों या शक्ति प्रदर्शन से होते हैं।यही दुनिया के वंडरफुल बाज़ार की उलट – पुलट और काया माया है।उस पर लाइक और कमेंट बरसते हैं। जनतंत्र उबासियां ले रहा है और मनुष्यता को श्राप से ग्रस्त किया जा रहा है।

एक तो भाग दौड़ की सनसनाती दुनिया में पाठक ही कम बचे हैं। जो हैं भी वे भी हड़बड़ी के खाते में सिमट रहे हैं। लेखक पुरस्कारों – सम्मानों और यश प्राप्ति  के मचानों और कामना के बाज़ार में जंप लगा रहे हैं। जिनका ज़मीर नहीं कोई सरोकार नहीं वे भी शब्दों, ध्वनियों और फूहड़ताओं के साथ खेलते हैं और जन कल्याण की पताकाएं फहराने में दिन रात जुटे हैं।इसे शब्दों के बाज़ार का खेल भी कहा जा सकता है। यह एक तरह से आलीशान ‘ छम्मक छल्लो ‘ लेखन भी बन चुका है। अधिकतर जो चड्ढा चड्डी में आ चुके हैं। पुरस्कार सम्मान अलंकरण उसी तरफ़ बरस रहे हैं।कहा जा सकता है कि यह संकीर्णताओं का छाती फुलाओ अभियान है। आजकल यही बरस रहा है और इसी की लीला है। राजनीति का अंधी धार्मिकता का विद्रूप भी बाज़ार के आगोश में है।ऐसा लगता है कि किसी की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।सत्य, अहिंसा, नैतिकता संवेदनशीलता, मूल्य और मनुष्यता सन्नाटे में आ गए हैं और सत्ताओं ने और उनके पालित पोषित मठाधीशों ने झूठ, हेराफेरी, लफ्फाजी और चालाकियों ने विज्ञापनों और गारंटियों के मार्फ़त सभी को अपने कब्जे में ले लिया है।

चुनावों में वोट झर रहे हैं। वोटों का थोक प्रोडक्शन एक नया करिश्मा और नैरेटिव का बोलबाला है।दुष्टों ,लफ्फाजों और शब्दवीरों ने अपने को प्रमाणित करने के लिए या सही साबित करने के लिए एक कीर्तनियां उद्योग, बाबा उद्योग और महाझूठ को डिजिटल और भौतिक रूप में छुट्टा सांड की तरह छोड़ दिया है।जलवे झर रहे हैं।कोई कितना बचेगा अफवाहों से ।अपना किया धरा पवित्र है और दूसरों का किया हुआ काम एक विशेष प्रकार का ड्रामा है। प्रलोभनों से छल छद्म और नाजायज तरीकों से जुगाड़े गए वोट सत्ता व्यवस्था के सिंहासन की सीढ़ियां बन गए हैं।इतना ज़्यादा हिंदू मुस्लिम हो रहा है कि लगता है कि नफ़रतों के न जाने कितने आभा मंडल बन रहे हैं।कोई कोना नहीं है जहाँ नफ़रतों की लीला न हो रही हो।कितना विष हमारे जीवन के पर्यावरण में खौफ़नाक तरीक़े से घुल गया है। कुछ इंजेक्ट हमारे आसपास प्रेम प्यार, नैतिकता संवेदनशीलता और यथार्थ की मूल्यों सरोकारों की गुणवत्ता ,अर्थवत्ता ,सार्थकता की भाषा खोती जा रही है।गाली – गलौज एक विशेष किस्म के ‘ क्लोजप ‘ में आ गया है। और यह गलीज भाषा जीवन यथार्थ का अंग बनाया जा रहा है।

देश दुनिया में जो घट रहा है। उसका आस्वाद ही नहीं मिलता। सत्ता व्यवस्था के मनोविज्ञान और स्थायित्व के लिए बिना सोचे समझे सब कुछ हो रहा है जिसका सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक परिवेश में कोई लॉजिक नहीं है। जहाँ कोई लॉजिक नहीं होता है उसे ही अपना लिया जाता है। हम लीगल और लॉजिक से बहुत दूर आ चुके हैं ।लेखन की दुनिया में लोकप्रियता के लिए न जाने कितना कूड़ा – कचरा जमा हो रहा है। कौन पाठक व्यर्थ में अपना समय नष्ट करे। यह पाठकों की तरफ़ से कह रहा हूँ। अच्छा पाठक हुए बिना संभवतः कोई न तो अच्छा लेखक ,कलाकार , गुणग्राही शिक्षक तो छोड़िए न वो राजनीतिक हो सकता और न धार्मिकता की तह तक जा सकता। वो केवल घुमड़नशील, तमाशबीन  और नौटंकीबाज़  प्राणी ही हो सकता है। जो दूसरों के अच्छे कामों को ड्रामा कहता है और अपने घाटियोत्तम कामों का विज्ञापन करता है।रंगमंच दुनिया की सर्वोत्तम चीज़ है जिसमें विश्व की तमाम विधाएं, विद्याएं और जीवन यथार्थ की सभी प्रविधियां समाई हुई होती हैं। इस दौर में रंगमंच सबसे ज़्यादा संकट में है। ऐश्वर्यशाली और धनपति उसे अपनी शैरगाह बना चुके हैं। सत्ता उसे अपने लिए ओढ़ बिछा रही है। और नटकौरीबाज़ उसके प्रदर्शन में भिड़े हैं।रंगमंचीय गतिविधियां जन जीवन के यथार्थ से इस दौर में लगभग कट चुकी और चकनाचूर हो चुकी है। जिस तरह से शो हो रहे हैं। उसकी पोल – पट्टी भी खुलती जा रही है। जिसके सहयोग से आप रंगमंच करेंगे। उसका गुणगान आपकी हर हाल में मजबूरी है। इस रूप में रंगमंच हो ही नहीं सकता। अब तो ज़िन्दगी में अच्छा हास्य विनोद मसखरी भी नहीं बची।वो लुगदी हो चुकी है।

सत्ता का अहंकार दिन – दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा है। विपक्ष को हर तरीके से नेस्तनाबूद करने की परियोजनाएं आम हो चुकी हैं। देखना यह है कि अब सत्ता व्यवस्था अपने ही पक्ष के उन लोगों पर  मेहरबान है जो एकदम ‘ फुस्स – चौदस ‘ हैं।जो कभी – कभार उंगली उठाते हैं उनको इगनोर करने और ध्वस्त करने की खड़ताल बजा रहे हैं।अब तानाशाही मनोविज्ञान किसी उंगली उठाने वाले को कब तक बर्दाश्त कर सकेगा? जनतंत्र वो होता है जो विपक्ष के प्रश्नों को गंभीरता से लेता है और उनका यथायोग्य निदान करने की कोशिश भी करता है।जनतंत्र की खूबसूरती सभी प्रकार की आवाज़ों को जगह देने की होती है। ढूंढिए वो जनतंत्र कहाँ है ? हरेराम समीप का एक शेर है – “देखना फरमान ये जल्दी निकाला जाएगा /जुर्म होते जिसने देखा मार डाला जाएगा/”

 – डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी

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