एक दिल,दो घर \ कहानी - rashtrmat.com

एक दिल,दो घर \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी एक दिल,दो घर बताती है कि,मजहब इंसानों को बाँट सकता है,लेकिन इंसानियत और प्रेम हमेशा उन्हें जोड़ देते हैं।कहानी सिखाती है,असली पहचान धर्म नहीं, मानवता है।खून, दिल और जीवन, इनका कोई धर्म नहीं होता।छोटी-सी इंसानियत पीढ़ियों की दूरी खत्म कर सकती है।जब दिल इंसानियत से धड़कता है, तब हर घर अपना हो जाता है।

                   एक दिल,दो घर \ कहानी

रायपुर के छोटापारा मोहल्ले की गलियों भले ही संकरी थी मगर यहाँ रहने वाले लोगों के दिल अक्सर खुले रहते थे। इसी मोहल्ले में आमने-सामने दो मकान थे। एक मैं रहते थे आनंद तिवारी और दूसरे में रमजान अली।

दोनों की दोस्ती पूरे मोहल्ले में मिसाल मानी जाती थी। दोनों के धर्म अलग थे,पर रिश्ते में कोई दूरी नहीं थी। सुबह की चाय कभी रमजान अली के घर होती तो शाम की गपशप आनंद तिवारी के बरामदे में। ईद पर रमजान अली के घर से कटोरा भर सेवइयां आनंद तिवारी के घर पहुँच जाता, और होली पर तिवारी जी की पत्नी अपने हाथ की गुजिया रमजान के बच्चों के लिए भेजना नहीं भूलती।

मगर इस दोस्ती के बीच एक अजीब विडंबना थी। दोनों के बच्चे एक-दूसरे से अक्सर उलझ पड़ते थे। धर्म और रीति-रिवाजों को लेकर उनकी छोटी-छोटी तकरारें कई बार बड़े झगड़े में बदल जाती थी। रमजान अली का बेटा जावेद और आनंद तिवारी का बेटा समीर छोटी-छोटी बातों पर भिड़ जाते।

“तुम लोग काफ़िर हो हमारे त्योहारों में मत आया करो।”

जावेद ताने देता।

समीर भी पीछे नहीं रहता तो तुम लोग हमारी होली में क्यों नहीं आते?”

एक दिन मोहल्ले की नाली से बहकर मुर्गे की हड्‌डी आनंद तिवारी के घर के सामने आकर अटक गई। यह देखते ही समीर तिवारी भड़क उठा।

“ये जानबूझकर किया है।” वह चिल्लाया।

उधर से जावेद भी आ गया।

“हमने कुछ नहीं किया, उसने जवाब दिया।

समीर ने गुस्से में कहा “कूड़ेदान में फेंक सकते थे, मगर नाली में फेंका ताकि हमारे घर के सामने आए। जानबूझकर किया है।”

बात बढ़ते. बढ़ते दोनों में धक्का मुक्की तक पहुंच गई। मौहल्ले वालों को बीच बचाव करना पड़ा। दोनों घरों के बड़े लोग यह सब देखकर सिर हिलाते रहते। मोहल्ले के लोग कई बार इन बच्चों की लड़ाई से परेशान हो जाते।

एक दिन चाय पीते हुए आनंद तिवारी ने कहा समक्षा में नहीं आता रमजान, हमने तो कभी धर्म को दीवार नहीं बनने दिया।”

रमजान अली ने मुस्कुराते हुए कहा समय बदल गया है दोस्त, अब लोग पहले धर्म देखते हैं, इंसान बाद में। समय लगेगा दोस्त, एक दिन इन्हें भी समझ आएगा।”

रमजान अली और आनंद तिवारी की दोस्ती इतनी गहरी कैसे बनी यह बाल मोहल्ले में बहुत कम लोग जानते थे। क्यों कि यह कहानी कई साल पुरानी थी।

कई साल पहले की बात है रात का समय था। छोटापारा की उस रात में अचानक आग उत्तर आई थी। मोहल्ले में अफरा-तफरी मच गई थी। दुकानें बंद हो गई थी, गलियों में डर का माहौल था। गलियों में भागते लोगों की आवाजें, दूर जलते टायरों का धुआँ और बंद दरवाजों के पीछे सहमी साँसें सब कुछ एक साथ थर्रा रहा था। अफरा- तफरी मच गई थी। हवा में डर और अफवाहें तैर रही थीं। दंगा हो गया दंगा हो गया।” किसी ने चिल्लाकर कहा। छोटापारा का माहौल एकदम बदल गया। जो मोहल्ला शाम तक हँसी-मजाक से भरा रहता था,अब वहाँ सन्नाटा था। और उसी भयभीत रात में एक घर के भीतर एक और संघर्ष शुरू हो चुका था, ज़िंदगी और मौत के बीच। रमजान अली के घर से दर्द भरी कराह सुनाई दे रही थी। फरीदा की प्रसव पीड़ा बढ़ती जा रही थी और बाहर पूरा मोहल्ला आग और अफवाहों से घिरा हुआ था।

रमजान अली के घर के अंदर घबराहट मची हुई थी। उनकी पत्नी फरीदा दर्द से कराहते हुए कहा, रमजान लगता है समय आ गया है।”

रमजान अली घबरा गए। फरीदा गर्भवती थी और उसे अस्पताल ले जाना जरूरी था। लेकिन बाहर दंगे की वजह से कोई वाहन नहीं मिल रहा था। रमजान अली दरवाज़े पर खड़े होकर परेशान नज़र से सड़क की ओर देख रहे थे। तभी गली में एक टैक्सी की हेडलाइट दिखाई दी। टैक्सी आकर उनके घर के सामने रुकी। ड्राइवर सीट से आनंद तिवारी उतरे।

उतरते ही उन्होंने पूछा,“क्या हुआ रमजान इतनी घबराहट क्यों है?”

रमजान अली ने कहा फरीदा को दर्द शुरू हो गया है, मगर बाहर हालात देख रहे हो। आनंद तिवारी ने बिना एक पल गंवाए कहा, ” चलो, जल्दी भाभी को लेकर आओ।”

रमजान अली चौंक गए।

“अरे बाहर दंगा है।”

आनंद तिवारी ने मुस्कुराकर कहा रमजान भाई, दंगे मजहब के नाम पर होते हैं, मगर बच्चे हमेशा इंसानियत के घर में ही जन्म लेते हैं। दंगा इंसानों ने किया है, इंसानियत ने नहीं।

कुछ ही मिनट में फरीदा को टैक्सी में बैठाया गया। टैक्सी सुनसान सड़कों से होते हुए अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने तुरंत फरीदा को ऑपरेशन थिएटर में ले लिया।

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।

“मरीज का बहुत खून बह गया है, तुरंत ब्लड चाहिए।

रमजान अली के चेहरे का रंग उड़ गया। तभी पीछे से आनंद तिवारी की आवाज़ आई,“ डॉक्टर साहब मेरा ब्लड टेस्ट कर लीजिए।”

रमजान अली ने उन्हें देखा। आनंद तिवारी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,“ भाई जान, अगर मेरा खून फरीदा भाभी को लग सकता है तो ले लीजिए, यह मत सोचिए कि यह किसी हिंदू का खून है। खून का रंग पूछकर नसें नहीं चलती रमजान भाई यह बस दिल से दिल तक रास्ता बना लेता है।”

रमजान अली कुछ क्षण तक उन्हें देखते रहे। फिर मन ही मन सोचा में इसे हिंदू समझता था यह तो इंसानियत से भी ऊँचा निकला।कुछ देर बाद आनंद तिवारी का खून फरीदा को चढ़ाया गया। और उसी रात फरीदा ने एक बेटे को जन्म दिया। रमजान अली ने बच्चे को गोद में लेकर कहा,“ इसका नाम जावेद होगा।”

उस रात के बाद शाम ढलते ही छोटापारा की गली में एक छोटा सा दृश्य रोज बनता था। आनंद तिवारी और रमजान अली दरवाजे पर चारपाई डालकर बैठते और चाय के दो कपों के साथ दिनभर की बात करते। मोहल्ले वाले मजाक में कहते इन दोनों की दोस्ती चाय से भी ज्यादा गरम है।”

धीरे-धीरे रमजान अली और आनंद तिवारी के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया था जो खून से भी गहरा था। साल गुजरते गए। दोनों परिवार पड़ोसी की तरह नहीं,रिश्तेदारों की तरह रहने लगे। लेकिन अजीब बात यह थी कि उनकी दोस्ती जितनी गहरी थी, उनके बच्चों की नोक-झोंक उतनी ही ज्यादा थी।

कुछ दिनों बाद रमजान अली अस्पताल गए और अंगदान का फॉर्म भर आए। दिल,किडनी, लीवर और आँखै सब दान करने की सहमति दे दी। घर में सबने विरोध किया। लेकिन रमजान अली हँसकर बोले मरने के बाद शरीर तो मिट्टी हो जाता है, अगर किसी की जिंदगी बच जाए तो क्या बुरा है?”

उस शाम उन्होंने मजाक में आनंद तिवारी से कहा,“ अगर कभी तुझे दिल की जरूरत पड़े तो मेरा दिल ले लेना।”

दोनों दोस्त देर तक हँसते रहे। उन्हें क्या पता था कि एक दिन यही मजाक सच बन जाएगा। कुछ समय बाद एक सड़क दुर्घटना में रमजान अली की मौत हो गई। पूरा मोहल्ला शोक में डूब गया। आनंद तिवारी जैसे अंदर से टूट गए थे। लेकिन नियति ने अभी एक और मोड़ तैयार कर रखा था। कुछ ही दिनों बाद आनंद तिवारी को दिल का गंभीर दौरा पड़ा।

डॉक्टरों ने कहा इनकी जान बचाने के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट करना पड़ेगा।”

जब डोनर की सूची देखी गई तो एक नाम सामने आया रमजान अली।यह सुनकर आनंद तिवारी की आँखें भर आई। उन्हें अपने दोस्त की वह हँसी मजाक वाली बात याद आ गई अगर कभी तुझे दिल की जरूरत पड़ी तो मेरा दिल ले लेना।” लेकिन असली मुश्किल अभी बाकी थी। रमजान अली के बेटे जावेद ने साफ़ मना कर दिया।

“मैं नहीं चाहता कि मेरे अब्बा का दिल आनंद तिवारी को दिया जाए।”

डॉक्टरों ने समझाने की कोशिश की। तुम्हारे पिता ने स्वयं अंगदान की सहमति दी थी।”

जावेद ने कठोर स्वर में कहा “जो भी हो, मैं यह नहीं होने दूंगा।

यह खबर मोहल्ले में आग की तरह फैल गई। कुछ लोग जावेद का समर्थन कर रहे थे ठीक कर रहा है. अपने बाप का दिल किसी हिन्दू को क्यों दे? कोई रिश्तेदार होता या फिर अपनी बिरादरी का होता अथवा जान पहचान का तो बात कुछ और थी।”

कुछ लोग कह रहे थे,”अरे यह  तो उनके आखिर पिता की आखिर इच्छा थी।”

तनाव बढ़ता जा रहा था। उधर अस्पताल में आनंद तिवारी की हालत बिगड़ती जा रही थी।एक दिन समीर तिवारी गुस्से में जावेद के घर पहुंच गया।

तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?” उसने ऊँची आवाज़ में कहा।

जावेद भी भड़क गया।

*क्यों कर रहा है? क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे अब्बा का दिल तुम्हारे घर में धड़के…”

समीर ने कहा तुम्हें तो गर्व होना चाहिए।”

जावेद की आँखै लाल हो गई। गर्व? तुम्हें पता है, मेरे अब्बा को कबाब कितना पसंद”

समीर चुप रहा।

जावेद आगे बोला और तुम लोग क्या खिलाओगे? खिचड़ी। वो भी ईद के दिन।”

उसकी आवाज़ भरी गई।

“उनका दिल यही कहेगा, मुझे किस शरीर में लगा दिया मेरी सारी ख्वाहिशों का जनाज़ा निकाल दिया।”

यह सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग चुप हो गए। तभी आनंद तिवारी की बेटी नेहा आगे आई।उसने शांत स्वर में कहा जावेद भाई आप एक बात क्यों नहीं सोचते?”

सबकी नजरें उसकी ओर उठ गई।

नेहा ने कहा,“ आपके अब्बा का दिल किसी हिन्दू के सीने में नहीं लगेगा।”

वह थोड़ी देर रुकी।

*बल्कि एक हिन्दुस्तानी के सीने में लगेगा।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।नेहा की आवाज़ फिर गूँजी,“ क्या आप हिन्दुस्तानी नहीं हैं..?”

तभी फरीदा धीरे से बोली,“ जावेद तुम्हें एक बात बतानी है।”

फिर उन्होंने दंगे वाली रात की पूरी कहानी सुनाई। कैसे आनंद तिवारी उन्हें अस्पताल ले गए थे और कैसे उन्होंने अपना खून देकर उनकी जान बचाई थी। फिर उन्होंने कहा, अगर आनंद तिवारी उस दिन मुझे खून नहीं देते, तो शायद में भी नहीं बचती, और तुम भी इस दुनिया में नहीं होते।”

जावेद की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पहली बार अपने अब्बा और आनंद तिवारी की दोस्ती का असली राज समझ आया। उसे अपने अब्बा की बातें याद आने लगी इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है।”

कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा,“ अगर मेरे अब्बा का दिल किसी को जिंदगी दे सकता है तो उसे रोकने वाला में कौन होता हूँ..?”

डॉक्टरों को तुरंत खबर दी गई। ऑपरेशन की तैयारी शुरू हो गई। कई घंटे चले उस कठिन ऑपरेशन के बाद आखिरकार डॉक्टर बाहर आ कर कहा,“ऑपरेशन सफल रहा।”

कुछ दिनों बाद आनंद तिवारी अस्पताल से बाहर आए। जावेद उनके सामने खड़ा था। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर आनंद तिवारी ने जावेद को गले लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू थे। धीरे से बोले “तुम्हारे अब्बा जब भी शाम को आते थे, कहते थे, चलो आनंद, एक कप चाय हो जाए। अब लगता है, मेरे सीने में धड़कता यह दिल हर शाम वही बात दोहरा रहा है। रमजान फिर से मेरे साथ बैठकर चाय पीना चाहता है।” जावेद मुस्कुरा पड़ा।

उस दिन दोनों धमाँ की बहसें खत्म हो गई, क्योंकि एक दिल दो घरों के बीच धड़क रहा था। छोटापारा मोहल्ले ने एक सच्चाई फिर से समझी, धर्म अलग हो सकते हैं, रिवाज अलग हो सकते हैं,लेकिन दिल की धड़कन सिर्फ एक भाषा समझती है, इंसानियत की। और सच यही है, आखिर दिल है हिन्दुस्तानी।

रमेश कुमार रिपु’

मो. 7974304532

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