बीजापुर में कुर्सी बिकाऊ,काम भी बिकाऊ,जनसेवा नहीं,रेट लिस्ट चल रही है - rashtrmat.com

बीजापुर में कुर्सी बिकाऊ,काम भी बिकाऊ,जनसेवा नहीं,रेट लिस्ट चल रही है

 राष्ट्रमत न्यूज,बीजापुर(ब्यूरो)। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद बीजापुर जिले में विकास की तस्वीर कुछ ऐसी उभरी है, जहां जनता इंतजार में है और जनप्रतिनिधि हिसाब-किताब में। सड़कों, भवनों और बुनियादी सुविधाओं के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह विकास कम और ठेकेदारी प्रबंधन ज्यादा नजर आता है।
जनसमस्या सुनने की जगह नहीं रहे
सूत्र बताते हैं कि चुनाव जीतते ही कई जनप्रतिनिधियों ने अपने परिवार और नज़दीकी लोगों के नाम पर ठेके और सप्लाई का पूरा नेटवर्क खड़ा कर लिया। सरकारी कार्यालय अब जनसमस्या सुनने की जगह नहीं रहे, बल्कि वहां यह तय होता है कि किसे काम मिलेगा और किसे बाहर रखा जाएगा। जिला पंचायत से लेकर जनपद और नगर निकायों तक, विकास कार्यों की प्राथमिकता अब जनता की जरूरतें नहीं, बल्कि कमीशन की संभावनाएं तय कर रही हैं। कार्यालयों में लगातार दबाव बनाकर निर्माण और सामग्री सप्लाई के आदेश अपने प्रभाव क्षेत्र में बांटे जा रहे हैं।
अब “मैनेजमेंट” शब्द प्रचलन में
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल में भाजपा के कुछ प्रभावशाली जिला-स्तरीय चेहरे भी सक्रिय भूमिका में हैं। अपने नाम से कार्य स्वीकृत कराकर उन्हें बाहरी पेटी ठेकेदारों को सौंपा जा रहा है। बदले में मोटा कमीशन तय है, जबकि गुणवत्ता सवालों के हवाले। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 5 लाख से अधिक के कार्यों में अनिवार्य टेंडर नियम कागजों तक सिमट गए हैं। DMF, जिला निर्माण मद और केंद्रीय सहायता योजनाओं के कई कार्य कथित तौर पर सांठगांठ और सिफारिश से बांटे जा रहे हैं। पारदर्शिता की जगह अब “मैनेजमेंट” शब्द प्रचलन में है।स्थानीय जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो विकास की जगह जिले को घटिया निर्माण और भ्रष्ट व्यवस्था की पहचान मिल जाएगी। सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन इन आरोपों पर कार्रवाई करेगा या सत्ता की छाया में यह मामला भी दबा दिया जाएगा।
15 लाख के काम में नेताजी पहले, काम बाद में
गुंटूर से आए एक पेटी ठेकेदार ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि उसे लगभग 15 लाख का कार्य मिला, लेकिन काम दिलाने वाले नेता को 15 प्रतिशत यानी 2.25 लाख देने तय हुए। इसके अलावा 1.5 लाख ऑफिस खर्च पहले ही जोड़ लिए जाते हैं।
ठेकेदार के शब्दों में
“इतना खर्च निकालने के बाद गुणवत्ता की गुंजाइश ही नहीं बचती। काम घटिया होगा, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं। ऑफिस में उस नेता का नाम लेते ही सब शांत हो जाते हैं।”यह बयान साफ करता है कि नेता-ठेकेदार-अधिकारी गठजोड़ कैसे सरकारी पैसों से निजी फायदे का खेल खेल रहा है।