अर्चना त्यागी केले का ठेला के जरिये बता रही हैं कि किसी की मदद के लिए सामने आना जरूरी नहीं है। पीठ पीछे बुराई करने की बजाए उसकी मदद करना भी एक तरीके से इंसनियत का स्टार्ट अप शुरू करना है। इसके लिए समय ओर जगह चुनने की जरूरत नहीं है।
केले का ठेला \ लघु कथा
कुंज इस बार छुट्टियां बिताकर वापिस आया तो कुछ परेशान था। परेशानी की वजह थी वह केले का ठेला। उसी के बारे में सोच सोच कर वह कोई तरीका खोजने की कोशिश कर रहा था जिससे ठेले वाले की मदद की जा सके। ठेले पर फल बेचने वाला लड़का उसका हमउम्र ही था बस परिस्थितियों ने उसे फल बेचने वाला बना दिया था। वह भी बारहवीं कक्षा का विद्यार्थी ही था। पिता की अचानक मृत्यु ने उसके हाथ से किताबें छीनकर ज़िम्मेदारी का ठेला थमा दिया था।
कुंज के दादा सेवानिवृत्त होकर गांव में ही रह रहे थे। उन्होंने शहर में अपना घर नहीं बनाया था। जब तक सेवा में रहे, सरकारी क्वार्टर में ही रहते थे लेकिन पिछले वर्ष सेवानिवृत्त होकर गांव में ही आ गए थे। गांव में फल बेचने वाला एक ही फल वाला था वह पूरे दिन घूम -घूम कर केवल फल ही नहीं बेचता था बल्कि फलों को खाने से होने वाले फायदे भी बताता था। हर फल की खूबी उसे पता थी और बेचने का हुनर उसे बखूबी आता था। अपनी चटपटी बातों से वह गांव में सबका चहेता बन गया था। गांव वाले शहर जाकर कोई भी सामान खरीद लाते लेकिन फल उसी के ठेले से खरीदते थे।

दादा ने कुंज को यह सब बताया तो वह बहुत प्रभावित हुआ। फल वाले के बेटे से उसकी दोस्ती हो गई। दिन भर कुंज उसके साथ ही रहकर फल बेचने में उसकी मदद करता था। दादा भी चाहते थे कि फल वाले का बेटा अपनी पढ़ाई जारी रखे लेकिन उसकी मदद कैसे की जाए। वह यही उपाय नहीं निकाल पा रहे थे। कुंज को इंटर्नशिप के लिए तारीख मिल गई इसलिए वह अधिक समय तक गांव में नहीं रुक पाया और वापिस शहर आ गया। उसने तय किया था कि जो भी इंटर्नशिप के बाद पेमेंट मिलेगा उससे अपने नए दोस्त की मदद करेगा। इस खयाल के मन में आते ही उसकी चिंता कुछ दूर हो गई। उसने उत्साहित होकर दादा को फ़ोन पर यह सब बताया।
“अरे बेटा कुंज हमने भी तरीका खोज लिया है, उसकी पढ़ाई पूरी करवाने का।”
“कैसे दादू ? पूरी बात बताओ ना।”
“तुम्हारा स्टार्टअप शुरू करके। उसका ठेला उन पैसों से खरीद लिया है जो तुम देकर गए थे हमें, अपनी पहली इंटर्नशिप के।”
“अच्छा। लेकिन उसका रोज़गार तो गया ना।”
“नहीं बेटा। पूरी बात समझो। देखो, वो दिन में स्कूल जायेगा। शाम को गांव भर में एक फेरी लगा लेगा। दिन में उसकी मां हमारे घर पर ही ठेला लगा लेगी।”
“समझ गया दादू। उसको तनख्वाह भी मिलती रहेगी और वो मेरा पार्टनर भी बन जायेगा इस तरह।”
“हां कुंज बाबू हम बिजनेस पढ़े तो नहीं हैं लेकिन थोड़ा बहुत समझते ज़रूर हैं।”
“आपका आइडिया काम कर गया दादू। अब मैं आपको भी पार्टनर बनाऊंगा अपने दूसरे स्टार्ट अप में।”
“हम तो तैयार ही हैं, बेटा। अब तो वैसे भी खाली ही रहते हैं। इसी बहाने व्यवसाय सीख जायेंगे। ज़िंदगी भर तो सरकार के नौकर ही रहे। अब जाकर पार्टनर बन पाएंगे।
ठेले वाले ने अपनी पहली तनख्वाह से एक फोन खरीदा और कुंज को फ़ोन किया।
“तुम्हारा कैसे शुक्रिया कहें पार्टनर बस थैंक्यू बोल सकते हैं। हम जीवन भर पार्टनर शिप निभाएंगे।”
“थैंक्यू तुम्हे भी मुझे बोलना था समीर, मेरा स्टार्टअप तुम्हारे कारण ही शुरू हो पाया है। तुम्हारी मदद करते करते मेरा बिजनेस शुरू हो गया है।”
दोनों साथ में मिलकर हंस रहे थे। दादू पीछे खड़े होकर सब सुन रहे थे। उनका आइडिया काम कर गया था।

अर्चना त्यागी
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