मुसीबत अगर जान न ले तो बधाई है,साँस चलती रहे तो शुभकामना।यहाँ ज़िंदा रहना उपलब्धि है,और चुप रह जाना समझदारी।हम तालियाँ बजाते हैं,अपने ही बच जाने पर,जैसे हादसा किसी और की ज़िम्मेदारी हो।हर तरफ़ बधाइयों की धुंध है-इतनी घनी कि सच भी स्लोगन लगता है। इसी धुंध में विश्व गुरु बनने की रिहर्सल है,इसी में आँख मूँदकर आगे बढ़ने का अभ्यास।विकास आया है,माथे पर भभूत लगाए,पूछो मत किस-किस के घर जले हैं,राख आँकड़ों में बदल चुकी है।हमें तेल भी देखना है और तेल की धार भी। दीया बुझे नहीं,पर अगर कोई जले तो आँकड़ा ठीक रहना चाहिए। जहाँ सवाल बदतमीज़ी हैं,और बधाइयाँ सबसे सुरक्षित भाषा।

डॉ सेवाराम त्रिपाठी
“मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है,ये आँख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है
परों को काट दिया है उड़ान से पहले,ये ख़ौफ़ – ए- हिज्र है शौक़ – ए- विसाल थोड़ी है
मज़ा तो तब है कि हम हार के भी हंसते रहें,हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है
(परवीन शाकिर )
हमारे जीवन में भारी दिक्कतों और मुसीबतों के बावजूद बची हैं तो बधाइयां और शुभकामनाएं।हम प्रतिदिन बधाइयां और शुभकामनाएं थोक में दे भी रहे हैं और ले भी रहें हैं। और मुस्कुरा – मुस्कुरा के बोल भी रहे हैं। यह एक सामाजिक कायदा है लेकिन सही ढंग से न इनको ओढ़ते बनता और न बिछाते।सोचता हूँ कि जब सब कुछ धड़ाधड़ हो ही रहा है, तो होने दो। आख़िर क्या हर्ज है ? जगद्गुरु शंकराचार्य के संगी साथी भी पीट दिए जाते हैं। शिकायत होगी लेकिन कुछ नहीं होने वाला। सत्ता का मुँह शक्तियों की ओर है।अपने विश्वासों-उसूलों और मूल्यों पर असमंजस होता है। समझ से परे है कि जब प्राण हैं तो प्रतिष्ठा की क्या ज़रूरत ? प्राण हैं तो जीवन है।जब प्राण ढूंढने हैं तो प्राण की प्रतिष्ठा में भावनाओं का थोक उत्पादन होता है । लगता है प्राण और आत्मा में जबर्दस्त धक्का – मुक्की चल रही है । प्राण ही जब विवादित होता है तो प्रतिष्ठा का अंतस झुलस जाता है । अब तो सब कुछ ठेके में ही झुलसना है। नया वर्ष,आज़ादी, गणतंत्र, महात्मा गांधी जयंती, होली – दीवाली, बुद्ध पूर्णिमा,ईद, क्रिसमिस, बैशाखी और न जाने क्या – क्या?
अधिक पाने को दौड़ रहे हैं
अक्सर उसके सही उपक्रम नहीं लगते । और जब ऐसा होता है तभी यह नौबत आती है । यह दूसरों को देखने और विचारने का वक्त तो है ही । यह ख़ुद अपने पर भरोसा करने और सतत निगरानी बनाए रखने का भी वक्त है । जो व्यक्ति अपनी निगरानी नहीं कर सकेगा। वह चचाई के कूड़ा में ही जाएगा।हम अधिक पाने को दौड़ रहे हैं लेकिन स्वार्थ की लपटों में बार-बार जल रहे हैं । आलम यह कि दूसरों को शुभकामनाएं देने का कोटा ही पूरा नहीं हो पा रहा है । जब से हमारे जीवन में आलोचना घायल हुई है। आलोचना दुबक गई है । आलोचना की सामाजिकता को जंग लग गया है तब से सभी प्रशंसा के मचान पर चढ़ गए। सीधे सादे आदमी का महत्व कम हो गया और वह पूरी तरह से खलास हो गया है । दूसरे हमें भी शुभकामनाओं में औंधा कर रहे हैं । प्रशंसा का बाज़ार चतुर्दिक है।कुछ भी करो हर हालत में प्रशंसा मिलेगी। जूता मारने से भी प्रशंसा का कोटा निकल पड़ता है।यह हमारी सहज तमन्ना है कि समूची दुनिया के लोग खुशहाल रहें और आबाद भी । “सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया/सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित दुःख भाग भवेत/” यूँ ही नहीं कहा जाता था । उसके वास्तविक निहितार्थ होते थे । फालतू की गंगा नहीं बहती थी, बल्कि इन वस्तुस्थितियों के लिए हमारे पास बहुत जगह है ।
कितने प्रकार के फलान हैं
कब से ‘ सियाराम मय सब जग जानी ‘ भी करते रहे हैं । अब वह बहुत हुआ । अब तो अपनी संकीर्णताओं के अलावा कुछ है ही नहीं । हम बहुत अच्छे हैं और सच्चे भी । यही नहीं न जाने कितने प्रकार के फलान हैं और न जाने कितने प्रकार के ढिकान हैं । लेकिन यह हमारी दिली कामना क्यों ठीक ढंग से फलीभूत नहीं हो पा रही ? उसमें बार-बार बट्टा लग रहा है । भगदड़ राजनीति भर में नहीं मची है जिसको जहाँ जाना है जा रहा है और जो करना है बिना किसी लाज – शर्म – हया के थोक स्केल में कर रहा है । शर्म और लज्जा आउट ऑफ डेटेड हो गई चीज़ें हैं । फिर भी सापों की तरह सरकने वाले वे महान अपनी और अपने आका की प्रशंसा करने में हलाकान हैं । प्रशंसा में वह दम है कि वह जब तक हमारे खाते में नहीं आता अपराधी, हत्यारा और चिड़ीमार होता है और अपने खाते में आने के बाद में बाशिंग मशीन में धुलकर साफ़ स्वच्छ छवि वाला हो जाया करता है। उसका सब कुछ बढ़िया हो जाया करता है। क्या फलसफा हमनें विकसित किया है।

मुद्दे अपने आप चढ़ उतर रहे
यह ऐसा दौर है कि कई तरह के मुद्दे अपने आप चढ़ उतर रहे हैं । भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार यदि गुलज़ार को मिल रहा है तो उनकी बगल में रामभद्राचार्य का आसन लगा दिया गया है कि बैठिए महराज! बड़ी मुश्किल से आपका नंबर लग पाया है । अब तो सब धान बाइस पसरी है।एक औझड़ी ने कहा विनोद कुमार शुक्ल क्यों छूट गए ? सरमन ने कहा न जाने कितने तीस मार खां छूट गए। आख़िर छूट गए तो छूट गए। क्या फ़र्क पड़ता है। रामभद्राचार्य ज्ञान पीठ में क्या शान से चढ़े हैं। जिसकी कोई मिसाल नहीं। मन की बंदूकों का भी महत्त्व होता है।वाकई कितने भोले- भाले हैं लोग। उन्हें यह भी पता नहीं है कि पुरस्कार और सम्मान किसी तर्क से नहीं चला करते । वो तो उस तरह का मामला है जैसा आदिकाल में होता था ‘ जेहिं की बिटिया सुंदर देखी तेहि पर जाय धरे हथियार’। मन कितना स्पेस वाला है और पागल है कि कोई क्या कहे।वे चलते हैं इच्छा और समर्पण से और अपनी अस्मिता को स्वाहा करने के बाद चिंचड़ी – चीं बोलने से । इनकी हासिल कथा कुछ इसी प्रकार की हुआ करती है । जो इसके हकदार नहीं भी हो सकते वे भी हो जाया करते हैं । तुलना मत कीजिए । तुलना करने के दिन अब गए । कुछ तो बिना लिखे-पढ़े भी लेखक की कोटि में धमक कर चढ़ जाते हैं । आप अभी भी औचित्य की चर्चा करते हैं और आपके देखते-देखते अनौचित्य सब कुछ लूट लेता है । बस आप केवल साढ़े पाँच किलो का मूंड भर हिला सकते हैं । जय अघोर भैरव साधना की । ख्याति अर्जित करने की बनक का संसार ही अलग होता है और वह किसी भी कॉर्नर से घुस सकता है । अब तो हालत यह है कि छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल शोभा बढ़ा रहा है । तरह- तरह के शुतुरमुर्ग अपनी-अपनी गर्दन निकालकर कंफ्यूज संसार के निर्माण में अपनी भारी भरकम भूमिका अदा कर रहे हैं ।

ख्वाहिश में क्या कमी आ गई
हमारे भीतर के इंसान की ख्वाहिश में आख़िर क्या कमी आ गई ? सोचता हूँ और हैरान होता हूँ । हैरान होना ही हमारे बस में बचा है।हमें कोई दूसरा ध्वस्त नहीं कर सकता । हम अपने ही हाथों ध्वस्त हो चुके लोग हैं । एक नामालूम किस्म का बुखार चढ़ा है और हम हलहला रहे हैं । पता नहीं क्यूं अरदास करते-करते थक रहा है दिल । राममंदिर निर्माण हो गया और लोकार्पण के साथ पूरा न होते हुए भी लगे हाथ प्राण प्रतिष्ठा की तानें छेंड दी गईं । चुनाव जीतने के लिए समय और मुहूर्त को साध लिया गया । हम न जाने कब से अपना सिर ढोंगी बाबाओ के चरणों में समर्पित करने लगे हैं और समूचा लहदर-बहदर भी। हमारी अपनी गणित है तो क्या उनकी नहीं हो सकती, क्या होनी और क्या अनहोनी।आस्थाएं, विश्वास और राजनीति भर नहीं संस्कृति, सभ्यता और मानवीय मूल्य ही नहीं नैतिकताएं तानाशाही मनोविज्ञान के गर्हित इरादों में चकनाचूर हो गईं हैं। पूरा देश खड़ाऊंओ के लिए जूझ रहा है । उसमें उपवास झर रहे हैं और दिखावे पसर रहे हैं । कितने बार गिरेंगे स्वार्थों के बहाव में । संवेदनाएं बिखर रही हैं और खूसट इच्छाएं हाँक रही हैं सत्ता- व्यवस्था के आसरे से । उनके चरणों में समर्पित होकर, सब कुछ समेट लेने के मंसूबे हैं । लेकिन अरदास पूरी नहीं होती । उसे शैतानी दिमाग बार-बार यहाँ – वहाँ कर देता है । बार – बार उठा उठा के मारता है और पसार- पसार कर भा ।सत्ता व्यवस्था की जुगुनुओं की चमक ने उन्हें सिंहासन बत्तीसी की चौखट पर कायदे से धर दिया है । लोग मर-मरकर जीवित हैं और कुछ जीवित रहते हुए भी मरे के समान हैं । वैसे किसी भी तरह ज़िंदा रहने का नाम जीवन तो नहीं है । ज़िंदा तो नाली के कीड़े भी होते हैं । दिखने ओर जीवित रहने में ज़रूरी फ़र्क होता है । वसीम बरेलवी का शेर है- “उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है/, जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है /”… नई उम्रों की खुद मुखतारियों को कौन समझाए/ कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है /” अब उसूल – फुसूल गए होरी में। जहाँ टंगने को मिल रहा है वहीं चले जाना है और शानदार तरीके से टंग जाना है।
ऋचाओं का नए ढंग से पुनर्पाठ
यह एक नई उड़ान है या एक नई आवक है जो विकसित हो रही है या ऋचाओं का नए ढंग से पुनर्पाठ हो रहा है । आज़ादी, जनतंत्र और राष्ट्रवाद की भावनाओं का लगातार उत्खनन हो रहा है । संविधान को काग़ज़ के गट्ठर के रूप में देखा जा रहा है । यानी संविधान दिखाने के लिए है, अपनाने, सामाजिक जीवन में व्यवहार और आचरण में आने के लिए के लिए, कतई नहीं है। अर्थात् हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और ।बड़ा अच्छा खासा मौसम है और – और में और है और – और में और। हर जगह बधाई और शुभकामनाओं की धुंध छाई हुई है। लेकिन चलना इसी धुंध में हैं और इसी धुंध में विश्वगुरु बनने का अभ्यास करना है। इसी में विकास की भभूत झरनी है। हमें तेल भी देखना है और तेल की धार भी।

डॉ सेवाराम त्रिपाठी
MO-7987921206