आदिवासी ग्रामीण बिस्तर लेकर पुल मांगने कलेक्ट्रेट पहुंचे - rashtrmat.com

आदिवासी ग्रामीण बिस्तर लेकर पुल मांगने कलेक्ट्रेट पहुंचे

राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। जिले के बैहर क्षेत्र अंतर्गत आदिवासी ग्राम माना और लपटी के ग्रामीण बोरिया बिस्तर लेकर पुल के लिए एक बार फिर कलेक्ट्रेट पहुंचे। इसके पूर्व भी ग्रामीणों ने प्रदर्शन रैली निकालकर पुल की मांग कर चुके हैं। जिसके बाद लोहे का वैकल्पिक पुल बनवाया गया, लेकिन उससे आवागमन में दिक्कते आती है। ऐसे में आक्रोशित ग्रामीणों को तीसरी बार पुल की मांग को लेकर मुख्यालय आना पड़ा।


मिट्टी का पुल बह गया
बोरिया.बिस्तर लेकर ग्रामीण पहुंचे। ग्रामीणों की यह समस्या नई नहीं है। वर्ष 2024 की बारिश में दोनों गांवों को जोड़ने वाला पुराना पक्का पुल बह गया। इसके बाद प्रशासन ने 15 सितंबर 2024 को केवल खानापूर्ति करते हुए मिट्टी का पुल बनवा दिया। जो 2025 की पहली बारिश में ही फिर बह गया। यह स्पष्ट करता है कि न तो तकनीकी गुणवत्ता का ध्यान रखा गया और न ही भविष्य की बारिश को ध्यान में रखकर कोई स्थायी समाधान सोचा गया।
पैदल चलना सुरक्षित नहीं
बीस जून 2025 को ग्रामीणों के प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने लोहे का अस्थायी पुल बनवाया, लेकिन इस पुल से न तो पैदल चलना सुरक्षित है और न ही साइकिल या अन्य साधनों से आवागमन सुचारु हो पा रहा है। मोटरसाइकिल भी मुश्किल से निकलती है। यह स्थिति आदिवासी अंचल के साथ हो रहे भेदभाव को उजागर करती है।
दो वर्षो से पुल मांग रहें
आदिवासी विकास परिषद के युवा अध्यक्ष शुभम उईके ने भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बताया कि दो वर्षों से पुल निर्माण की मांग की जा रही है। लेकिन हर बार आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। यह वही प्रशासनिक रवैया है जिसमें फाइलें आगे बढ़ने से ज्यादा समय टेबल बदलने में लग जाता है।
एक माह में टेंडर की बात की थी
पीडब्ल्यूडी पीआईयू वन की सहायक मानचित्रकार अर्चना डोंगरे ने एक माह में टेंडर और काम शुरू होने का आश्वासन जरूर दिया था। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यदि पुल का निर्माण जल्द शुरू नहीं हुआ तो ग्रामीण कलेक्ट्रेट में तालाबंदी जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे। यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए इस हद तक जाने को मजबूर होना पड़े तो यह समझ लिजिए यह शासन.प्रशासन के लिए शर्मनाक बात होगी।

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