‘जान्हवी’ - rashtrmat.com

‘जान्हवी’

   कहानी

डाॅ. लता अग्रवाल ‘तुलजा’ ऐसी सजग भाषा में कहानियाँ लिखती हैं कि कथा में अदृश्य बातें भी पाठकों की संवदेनाओं का हिस्सा बन जाते हैं।उनकी कहानियाँ दिल में ऐसे उतरती हैं,जैसे रेत में झरने का पानी। खास बात यह है कि लेखिका इंसानी रिश्तों के बहाने बदलते वक़्त में मानवीय मूल्यों की पड़ताल करती हैं। ‘जान्हवी’ कहानी एक सजग स्त्री की आँख है। पढ़िये और खो जाइए मानवीय मूल्यों के सागर में..

“यात्रीगण कृपया ध्यान दें, भोपाल जंक्शन से वाराणसी को जाने वाली ट्रेन कुछ ही समय में प्लेटफार्म नंबर एक पर आ रही है.” रेल संचालिका द्वारा अनाउंसमेंट होने के बाद यात्रियों में अपरा-तफरी मच गई. सभी डिस्प्ले बोर्ड पर अपनी- अपनी बोगी का नंबर तलाशते हुए आगे -पीछे हो रहे थे. 5 मिनट में ही धड़धड़ाती हुई ट्रेन अपनी रफ्तार से प्लेटफार्म पर आकर लगी. वाराणसी एक सेमिनार में अपनी उपस्थिति देने जा रही थी. मुझे S5 खोजने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं अपना सामान सहेज ट्रेन के अंदर हो ली. सीट नंबर 17 लोअर बर्थ, जैसे ही अपनी सीट के पास पहुँची; देखा एक बुजुर्ग से सज्जन खिड़की के पास पहले से ही बैठे हुए हैं .“एस्क्यूज मी, ये खिड़की के पास वाली सीट मेरी है।“ बुजुर्ग जो लगता है किसी गहरे चिन्तन में खोये थे, मेरा इतना कहते ही जैसे चौंक पड़े और अपराध भाव से सहमते हुए झट खड़े हो बोले, “माफी चाहता हूँ .”

“अरे, नहीं कोई बात नहीं, आप बस थोड़ा सा इस तरफ हो जाइए. वो क्या है ना कि मुझे सफोकेशन की प्रॉब्लम है इसलिए खिड़की चाहती हूँ.” उन्होंने जैसे कुछ सुना ही नहीं, क्योंकि कोई उत्तर न देते हुए सीट के दूसरे छोर में एकदम किनारे पर जा बैठे. जैसे कुछ कहने पर कोई बालक रूठकर बैठ जाता है. धीरे-धीरे कंपार्टमेंट में और लोग भी आए. ट्रेन ने सीटी देते हुए वापस अपनी रफ्तार पकड़ा ली. सोच रही थी अगर ये सीटी न होती तो चेतावनी कैसे मिलती…कई यात्री स्टेशन पर ही छूट जाते…काश, जिन्दगी भी समय-समय पर ऐसी चेतावनी दे पाती तो शायद हम भी समय रहते सचेत हो पाते, किसी से कोई अवसर, कोई अपना न छूटता .

खैर ! मुझे दरअसल स्लीपर ही पसंद है, ए सी यूँ भी मुझे सूट नहीं करता, दूसरे वहाँ वही शहरी माहोल, अपने में सिमटे हाई प्रोफाइल लोग, कोई अंग्रेजी मैगज़ीन लेकर बैठ जाता है तो कोई मोबाइल में खो जाता है. बस बैठे रहो गुमसुम से. स्लीपर के कंपार्टमेंट में 8 सीट में कम से कम दो लोग तो मिलते हैं बोलने बतियाने को. सब अपना सामान सहेजकर सीट के नीचे रख रहे थे, ट्रेन सीटी देते हुए फिर रुकी, बाकी रही सीट वह भी फुल हो गई.

ट्रेन धीरे -धीरे रेंगने लगी। साथ ही रेंगने लगे दिमाग में मेरे कई विचार. मेरे ठीक सामने वाली सीट पर एक युवती आकर बैठी थी. मन को तसल्ली हुई ,कोई नहीं तो कम से कम यह तो है बतियाने को .बाकी सारे जेन्ड्स जिनमें दो मानो जन्म का जागरण कर ट्रेन में बैठे थे सो आते ही अपनी ऊपर वाली बर्थ सम्हाल कर लमलेट हो गए. मेरी नजर बार-बार युवती की ओर उठ जाती इस उम्मीद से कि अभी बातों का सिलसिला आरंभ हो.मगर वह तो कान में ब्लूटूथ की पिन घुसाए ऐसे बैठी थी कि कोई है ही नहीं उसके आसपास. मन उदास हो गया उसके इस रवैय्ये से. तभी एक माँ- बेटी अपना करतब दिखाती हुई आ पहुँची, माँ जो ढपली पीटती हुई अपने कंठ की प्रतिभा दिखा रही थी तो लगभग 5 बरस की वो छोटी बच्ची अपनी कलाबाजी दिखाकर यात्रियों का मनोरंजन कर रही थी. कभी पाँच-छह गुलांटी खा यहाँ से वहाँ चली जाती; तो कभी उल्टी हाथों के बल चलकर दिखाती. ट्रेन तबियत से हिचकोले ले रही थी. हम अगर बाथरूम भी जाते तो सीट के पाइप का सहारा लेकर, एक वह बच्ची थी जो आत्मविश्वास से बिना किसी सहारे के अपनी कलाबाजी दिखा रही थी. उसकी लगन पर मुग्ध थी,

“बच्ची, यहाँ क्या कर रही है, स्कूल नहीं जाती ?” मैंने उस बच्ची से पूछा तो उत्तर में वह माँ की ओर देखने लगी. मैं समझ गई उत्तर माँ के पास गिरवी रखा है.“दीदी,स्कूल जाएगी तो घर कैसे चलेगा.” माँ ने अपनी पोटली खोल मेरे सामने एक प्रश्न रख दिया,अब मैं निरुत्तर थी. मैंने देखा मेरी सीट पर बैठे वो सज्जन उस बच्ची को बड़े दुलार भरी नजर से देख रहे थे. बच्ची बिना किसी की परवाह किये अपना खेल ख़त्म होने पर सबके आगे हाथ फैला अपनी रोजी-रोटी सहेज रही थी. मैंने एक बिस्किट का पैकेट उसके हाथ में रख दिया. उन सज्जन ने पैसे दिए और मेरे सामने वाली युवती ने पाँच का सिक्का उसके हाथ में रखते हुए कहा,

“शाबाश !… खूब मेहनत करना,कल कोई बड़ा करतब दिखाना…अपना नाम रोशन करना.” तभी टीसी महोदय आ गए, टिकिट चैक करते हुए उन माँ -बेटी की ओर देखते हुए एक घुड़की दी,

“मानेगी नहीं तू…मना किया है न यहाँ मत आया कर …!” दोनों माँ बेटी बेजान सी हँसी हँसकर आगे बढ़ गईं ,जैसे उनकी आदत में हैं ये सब.

आधा पौना घंटा हो गया मगर कंपार्टमेंट में एकदम चुप्पी छाई हुई थी. ट्रेन तो अपनी गति से भाग ही रही थी और इस दौड़ में पीछे छूटते जा रहे थे हरे- भरे पेड़, पहाड़ियाँ, खेत खलिहान, किसी पुल से गुजरने की आवाज ने मेरा ध्यान बाहर की ओर खींचा, नदी देखना मुझे बचपन से अच्छा लगता है और खुश हूँ मैंने अपने बचपन को अब तक जिलाए रखा है.आधुनिकता का कोई लबादा नहीं ओढ़ा. काश ये पेड़, पहाड़, नदी ,खेत खलिहान…ये पुल ही कुछ बोल पाते…! तो मेरा सफर आसान हो जाता किन्तु अभी तो मेरे पास कोई ऑब्शन नहीं उस युवती के अतिरिक्त …वो सज्जन तो जैसे अपने में ही खोये थे. फिर वेल्ला आदमी बैठा-बैठा क्या करे, कोई चारा न पाकर मैं उस युवती के व्यक्तित्व का पोस्टमार्टम करने लगी,

उसकी आधुनिकता आँख में मेरे खटकने लगी.मैं उसके आचार,विचार और व्यवहार का अंदाजा लगा रही थी. आधुनिकता का लबादा ओढ़े, कानों में म्यूजिक लगाए, वह मुझे आजकल के उन युवाओं सी लगी जो अपनी ही मस्ती में चूर रहते हैं, जवानी का जोश है, भला उन्हें किसी से क्या लेना –देना. हम ठहरे उस जमाने की महिलाएं जो आजू-बाजू जब तक किसी से बतिया ना लें; साँस अटकी सी लगती है हलक में, पेट में दर्द सा होने लगता है. यहाँ मजबूर हूँ खिड़की के बाहर देखने और खुद से बतियाने को .पीछे छूटते सारे माइलस्टोन और आगे बढ़ती ट्रेन कह रही थी जिंदगी भी तो ऐसे ही भागी जा रही है और पीछे छूटती जा रही हैं हमारी कई अनमोल स्मृतियाँ, हम चाह कर भी उन्हें सहज नहीं पा रहे. मगर ट्रेन इन सब से परे एकदम निर्लिप्त भाव से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही है कि कौन, कहाँ, कैसे सफर कर रहा है. उसे इससे कोई लेना- देना नहीं, बस अपने लक्ष्य को पाना है. काश, मेरा मन भी इस ट्रेन की तरह होता, सबसे बेपरवाह बस अपना ही राग अलापता हुआ. किन्तु अगले ही पल खुद ही इसका काट किया, ‘अरे वह तो मशीन है, निर्जीव है,हम तो इंसान है रे, हम भी उसके जैसे हो जाएं तो फिर हम भी मशीन ना कहलायें? खिड़की से झाँकती मैं, देखा ट्रेन किसी गुफा में प्रवेश कर रही है. मतलब कुछ पल अँधेरा …! बचपन से डरती हूँ इस अँधेरे से, सो गर्दन भीतर कर ली.

युवती अपनी धुन में ट्रेन के डुलाते हिंडोले में झूलती, चेहरे पर मुस्कान लिए अपना कोई प्रिय गीत सुन रही थी शायद. कैसे खुश रह लेते हैं यह आज के बच्चे अपने आप में ..? मन में ईर्ष्या हो रही थी. हाँ, इन्हें कहाँ जिम्मेदारियाँ भला, माँ-बाप को साथ रखना नहीं है, विवाहित तो लगती नहीं…रह रही होगी किसी के साथ रिलेशनशिप में. पता नहीं यह कुत्सित विचार क्यों कर मेरे मन में आ रहे थे? क्यों मैं उसके व्यक्तित्व का छिद्रान्वेशन करने पर तुली हुई थी? शायद मेरे प्रति उसकी उदासीनता का भाव मुझे ऐसा सोचने पर विवश कर रहा था. कितना स्वार्थी है मनुष्य अपने से परे जो सोचेगा कुटिल ही सोचेगा .

उसे एहसास हो गया था कि काफी देर से मेरी नज़रें उस पर गढ़ी हैं, उसने एक नजर उठा कर मुझे देखा; दोनों की नजरें टकराई; एक पल को मैं सकपका गई, मानो मेरी चोरी पकड़ी गई हो.निगाहें दूसरी ओर कर ही रही थी कि उसने हल्की सी स्माइल दी. क्या कहूँ जैसे प्यासे को तृप्ति मिल गई हो… उत्साह से भर गई और मुस्कुरा उठी मैं भी. शायद इंतजार की घड़ी समाप्त हो अब, बातों का सिलसिला शुरू हो तो कुछ बोरियत कम हो, मगर यह क्या वह फिर अपने मोबाइल में व्यस्त हो गई . मुझ वाचाल को ऐसा लगा मानो किसी ने पनिशमेंट दे दिया हो. अरे, इतना चुप तो मैं उस समय भी नहीं रहती थी जब टीचर जी कोई शैतानी करने पर मुझे क्लासरूम के बाहर निकाल दिया करती थीं तब भी मैं आते-जाते बच्चो से थोड़ा ना थोड़ा तो बतिया ही लेती थी मगर यहाँ तो जैसे अलीगढ़ का ताला लगाए बैठी हूँ मुँह पर.

‘हे भगवान इतना मुश्किल सफर तो कभी न रहा, अब सहा नहीं जाता. कैसे,क्या करूँ मेरी नजर उन बुजुर्ग की ओर गई. कुर्ता पजामा पहने, दुबली काया, सांवली रंगत, उनका चेहरा देखकर लगता था कि जिंदगी ने बड़ा हथोड़ा लेकर महीन छेनी से तराशा है उन्हें। बीते जीवन के कष्टों का ताप उनके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था. उनके भाव बता रहे थे कि जिन्दगी की सारी उम्मीदें दम तोड़ चुकी हैं,मन में कई अनसुलझे प्रश्न थाह पाने को भटक रहे थे .जिस तरह वह सहमें से बैठे थे मुझे बहुत दया आ रही थी उन पर. ट्रेन की धुन में डुलमुल होते, एक टक ट्रेन की छत को निहारते हुए शून्य में विचर रहे हों; जैसे आसपास से उन्हें कोई सरोकार ही न हो. मैंने उन्हें अपनी सीट से थोड़ा हटने को क्या कहा वह तो एकदम कोने में सिमट कर बैठ गए, मैं अपने में अपराधबोध महसूस कर रही थी. सो बोल पड़ी,

“भैया जी ! पूरी सीट खाली है, आप इस तरह क्यों बैठे हैं, अच्छे से बैठ जाइए.” मेरा इतना कहते ही वो किसी आज्ञाकारी बालक की तरह ठीक से हो लिए. मगर बोले तब भी कुछ नहीं. पता नहीं क्यों उनका चेहरा देख लगता था अभी रो पड़ेंगे. अगर धड़कने सुनाई देती तो दावे से कह पाती बहुत कुछ घुमड़ रहा है उनके भीतर. क्यों ना इनसे बात की जाए, आखिर सफर ट्रेन का हो या जीवन का कोई हमसफ़र अगर मिल जाए तो सफर आसान हो जाता है.

“देना ओ दीदी , अरे, मेरे राजकुमार,जितेन्द्र …क्या बस इतना ही रे…अरे दुआ देगी तेरे को.” मैं कुछ कह पाती उससे पहले ताली पीटती हुई किन्नर अपनी वसूली करने आ पहुंची.युवती मोबाईल में खोई रही, मैंने उनकी अनदेखी की और भैय्या जी की ओर मुड़ते ही शायद वह भी उनके उदास चेहरे को देख कुछ कह न पाई और आगे बढ़ गई.

“चाय,…चाय,…चाय,…समोसा,… बढ़िया ताजा समोसा…” बस यही आवाजें कंपार्टमेंट की शांति को भंग कर रही थी, बाकी तो सन्नाटा ही था. इस बीच कितने ही स्टेशन आए और चले गए मगर उन्होंने कभी झाँककर नहीं देखा खिड़की से, शायद अपनी मंजिल के प्रति उनके मन में कोई उत्साह ही नहीं. जिन्दा लाश से सीट से सर टिकाए बैठे रहे, मैं फिर उनसे मुखातिब हुई,

“आपकी तबियत ठीक नहीं शायद, अकेले सफर नहीं करना चाहिए था आपको.”

“ठीक हूँ मैं.” बहुत छोटा सा उत्तर मिला. मुझे ख़ुशी हुई; कुछ तो बोली, मौन व्रतधारी आत्मा.

“आप कहाँ जा रहे हैं भैय्याजी ?”

“माई के धोरे.”

“कहाँ रहती है आपकी माई?”

“जन्म देने वारी माई ना, उ तो कबकी समा गई धरती तले .”

“फिर किस माई के पास जा रहे हैं?”

“गंगा माई के .”

“गंगा माई ?” मुझे आश्चर्य हुआ.

“इ टिरेन बनारस को जात है न .” जैसे वो कुछ घबरा गए .

“हाँ! हाँ! बनारस जाती है, हम लोग भी वहीँ जा रहे हैं. मगर आप किस गंगा माई की बात कर रहे हैं ?”

“गंगा माई बहती है न उहाँ.”

“अच्छा आप गंगा नदी की बात कर रहे हैं.” मुझे अपनी मूढ़ता पर झेंप भी हुई .

“वहाँ कोई रिश्तेदार भी हैं आपके ..?”

“ना, मेरा कोई नातेदार नहीं.”

“अच्छा तो गंगास्नान को जा रहे हैं ?”

“ना मैं गंगा माई की पग धूली में रहने जा रया.” उनके इस वाक्य ने उस युवती के साथ सीट न. 23 पर बैठे यात्री का ध्यान भी अपनी ओर खींच लिया.

“क्या आपका कोई नहीं बाबा ?” अब तक मोबाइल में व्यस्त युवती अचानक बोल पड़ी. बातों के दौरान पता चला जान्हवी नाम है उसका.

“है ना एक बेटा, एक बेटी है.”

“फिर आपको गंगा की पग धूली में रहने की क्या जरूरत आन पड़ी,क्या आपके बच्चो ने आपको संग रखने से मना कर दिया?”

“ना,ना ऐसी बात नइ. उ इहाँ ना रहते .”

“मतलब?” मैंने जिज्ञासावश पूछा.

“उ बिदेस में रहते हैं.”

“आपकी पत्नी…?”

“काँता तो 35 बरस पहले ही भगवान धोरे चली गई.” ट्रेन रुक गई कोई स्टेशन था, खिड़की से आ रहे शोर के बीच हमारी बातों का सिलसिला भी रुक गया. मगर भैयाजी की जिन्दगी बड़ी उलझी सी लगी सो दिमाग में प्रश्नों के जाले बनने लगे. जैसे ही ट्रेन ने फिर गति पकड़ी,मेरी जिज्ञासा मुखर हो पड़ी,

“तो अब तक आप कहाँ रहते थे भैय्या जी?”

“बिटिया के संग. अब उ भी विदेश चली गई.”

“आमदनी का कोई जरिया तो होगा, मेरा मतलब है आप कहीं नौकरी करते होंगे, खेती होगी, घर होगा आपका?”

“मजूर आदमी हूँ, चार एकड़ जमीन थी पास, एक एकड़ जमीन 35 बरस पेले कांता जब बीमार भई तब उके इलाज खातिर बिक गई. मगर बीमारी फेर भी पकड़ में ना आई.”

“मतलब अब भी तीन एकड़ जमीन तो है न आपके पास ?” जान्हवी ने पूछा .

“काँता ने मरती बेर दोइ बच्चन के सर पे हाथ धरा बचन लिया हा, कि मेरे दोनों बच्चन की जी जान से देखभाल करोगे, उनको कोई तकलीफ हुई तो मेरी आत्मा दुख पाएगी, भटकेगी.उन्हें पढ़ा- लिखा कर बड़ा आदमी बनाना. आत्मा तो परमात्मा होत है सो उकी आत्मा को कैसन भटकने देता.”

“हम समझे नहीं !” लगभग हम तीनों के एक ही भाव थे.

“बड़े होके केसव (बेटा) बोला बापू पढ़ने खातिर बिदेस जाना है सो डेढ़ एकड़ जमीन बेचके उको बिदेस भेजा, उ फेर कभी लौटके आया नइ, उधरी ब्याह रचा लिया.”

“ब्लडी हेल.” जान्हवी का चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था.मैं उसे गौर से देख रही थी. आखिर यह भी तो उसी पीढ़ी की है !!

“अब भी सम्हल जाओ बाबा…दुनिया में कोई किसी का नहीं.बची जमीन को पकड़े रखो जब तक जिन्दा हो.” जान्हवी ने व्यावहारिक ज्ञान दिया.

“उ भी हम दे दिए बिटिया .”

“किसे ?”

“पिछले हफ्ते बेटी एक लड़के कु ले आई, कही उससे पिरेम करती है,ब्याह करेगी. उ लड़के की शरत रही दहेज़ में इतना रुपया चइये, उको बिदेस जावे का था न.”

“तो तुमने बेटी को मना क्यों नहीं कर दिया ऐसे लड़के से शादी करने के लिए.”

“किये थे बिटिया मगर उ बख्त बिटिया के सर पे उ लड़का सवार था; नाही मानी, हमको बोली तुम्हारी नियत नाही हमार हिस्सा देवे की. हमार हिस्से की खेती है, बेचकर हमको पैसा दे दो, उस पर कानूनन हमार हक़ है. आज नहीं तो कल हमको देना ही है तो काहे आनाकानी कर रये. सो हम उ जमीन बेचके पैसा बिटिया के हाथ में धर आये हैं. अब लक तो उड़ भी गई होगी आसमान में.” कहते हुए उन्होंने अपनी नजर ट्रेन की छत पर टिका दी, दर्द का सूनापन उन आँखों में देखा जा सकता था. यद्यपि ट्रेन की आवाज में कुछ शब्द डूब रहे थे मगर फिर भी दर्द का रिश्ता बन गया था उनसे सो समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई.

“ईश्वर भी न ऐसे लोगों के हिस्से माँ-बाप को रख देता है जिन्हें उनकी कदर नहीं होती और जो साया तलाश करते हैं उन्हें बे साया रखता है.” जान्हवी ने ऐसा क्यों कहा समझ नहीं आया उस वक्त. ट्रेन की छुक-छुक भी भैया जी की दर्द भरी धीमी आवाज के आगे कमजोर लग रही थी. पास बैठे हम सभी अब खिड़की के बाहर की दुनिया को छोड़ बस भैया जी के दर्द से जुड़ गए थे. शाम का वक्त हो चला था तभी ‘चाइ, चाइ …इलायची ,अदरक वाली चाइ’ करता हुआ केंटिन बॉय आया तो मैंने उससे दो चाय देने को कहा. पहली चाय भैया जी की ओर बढ़ाई तो बहुत ना – ना कहते हुए उन्होंने हमारे आग्रह को स्वीकारा.कंपार्टमेंट में अजीब सा सन्नाटा था सभी इस सफर में सफ़र करने लगे. हम जैसे उनके दर्द में अपना भविष्य देख आतंकित हो रहे थे. क्या आने वाला समय में माँ –बाप का यही भविष्य है…? चाय समाप्त होते ही मैंने फिर बातों का सिरा थाम लिया,

“आपकी पत्नी गुजरीं उस वक्त आपकी उम्र क्या रही होगी भैया जी ?”

“इही कोई 25 26 बरस का रहा हुंगा.”

“बस …! तो आपने क्यों नहीं सोचा अपने बारे में, दूसरी शादी कर सकते थे ?” सीट नंबर 23 के यात्री ने पूछा.

“अपने बारे में कच्छु सोचते इतना बखत ही कहाँ था हमाए पास, हम तो काँता के मरने का दुख भी अच्छे से कहा मना पाए. उसकी देह को जल्दी-जल्दी अग्नि के हवाले कर दौड़ते हुआ घर आए कि बच्चे भूखे होंगे. आके देखा तो बिटिया धार-धार रो रही थी. अपनी मैया को पुकार रही थी. हम सोचे ये देखके उधर काँता की आत्मा भी रो रही होगी. सो बिना नहाए पहले बिटिया को गोद में उठाए, गोदी लिए लिए दूध गर्म कर बोतल में डालके दिए; फेर नहाए. बस ऐसे ही केसव और कजरी की देखभाल में कब उमर बीत गई पता इ ना चला. फिर वचन दिए थे काँता कु बच्चन खौं पढ़ा- लिखा कर बड़ा आदमी बनाने का. सो बचन निभाने में अपनी तरफ ध्यान ही न गया.” भैय्या जी की बात से ऐसे तार जुड़ गये थे कि स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही खिड़की से चाय,समोसे वालों की आवाज खल रही थी, बड़ा गुस्सा आ रहा था उस दखल से.

मन वितृष्णा से भर गया, हम सब व्यथित थे, अपनी ही जन्मी संतान पिता के दुख से कैसे अनजान और लापरवाह रह सकती है ? इस बात की हैरानी थी. अरे, जिस पिता ने अपना पूरा जीवन होम कर दिया उस पिता को इस अवस्था में छोड़ते हुए जरा भी दिल नहीं पसीजा…! एक वह पिता है जिसके मन में अभी भी उनके प्रति कोई गिला शिकवा नहीं…! सच पर्वत का दिल होता है पिता का. हम सबकी आँखें नम थी किंतु भैया जी शायद उनकी आँखों का पानी जैसे सूख गया है, पथरा गई हैं आँखें दुख सहते -सहते.

“बाबा ! बेटा गया वहाँ तक ठीक था; ये आपकी बेटी को क्या भूत चढ़ा कि वह भी विदेश चली गई?” उसे विदेश जाना था तो अपने दम पर जाती, आपको समझाना था बेटी को.”

“बहुत समझाए बिटिया, लेकिन उ बड़ी हो गई ना, फेर चार आखर पढ़ ली है, कानून जानती है. उही तो हमार टिकिट निकाल कर हाथ में दी है, कहे ‘बापू गंगा किनारे चले जइयो…माई सबन खौं मुक्ति देत है.”

“लानत है ऐसी बेटी पर,जरा नहीं सोचा उसने बाप के बारे में.” जान्हवी ने गुस्से में अपनी हथेली को ठोका. वहीँ इस बात ने हमें भी हैरान कर दिया.

“बिटिया, आदमी एक बार में एक ही के बारे में ही तो सोच सकत है न.”

“मतलब !”

“मतलब ये कि उ टेम बिटिया अपने होने वाले पति के बारे में सोच रही थी.” सीने पर कितना आघात सहकर कह पा रहे हैं वो ये बात उनकी आँखों को देखकर ही समझ आ रहा था. पीड़ा से सफेद आँखें जिसमें कहीं क्रोध का एक लाल रेशा नजर नहीं आ रहा था. किन्तु ये कांतर आँखें हम सबके दिल में चुभ रही थी.

“अब आप क्या करेंगे भैया जी ? आपका जीवन …” मेरा मन व्यथित था,

“एक छोटी टपरिया ही गाँव में उके 5000 रुपय्या मिले हैं सो लेकर चल पड़े हैं माई की शरण में, वह तो माई है ना सबका ध्यान रखती है, हमें भी पालेगी. कोउ चिंता नाही.” मन सोच रहा था क्या वाकई चिंता नहीं…? इस उम्र में यह अकेलापन चिंता नहीं…? रात भोजन का समय हुआ सबके टिफिन खुले तो सबसे पहला हिस्सा भैया जी का निकला, उनका स्वाभिमान लेने की इजाजत नहीं दे रहा था मगर सबका आग्रह इतना तगड़ा था फिर जान्हवी जो यूँ एक युवा थी किंतु उसकी आवाज में माँ जैसा अपनापन और दृढ़ता थी.

“आप क्यों भूखे मरते हैं बाबा, आपके बच्चे इस समय किसी बार में बैठकर ऊँची क्वालिटी की बियर पी रहे होंगे और आप यहाँ उपवास करो…कोई जरूरत नहीं है दुख मनाने की, दुनिया किसी के बगैर खत्म नहीं हो जाती.”

“जान्हवी ठीक कह रही है भैया जी अब आपको अपना ध्यान रखना है.अब देखिये न हर स्टेशन पर ट्रेन आती है, मुसाफिरों को लेकर चल पड़ती है..मगर किसी मुसाफिर के चले जाने से स्टेशन की रोशनी तो कम नहीं हो जाती …रेल- पेल फिर भी बनी रहती है.” मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की.

“बिलकुल, आपके जीवन का यह पड़ाव भी एक स्टेशन की तरह है, जिन्दगी के प्लेटफोर्म पर आती- जाती साँसों की रेल-पेल है. जैसे ट्रेन में सब मिलते, रिश्ते बनते हैं, कोई कुछ दूर तक साथ रहता है, कोई बीच में ही सफर पूरा कर उतर कर चल देता है. आपकी पत्नी, केशव और कजरी ये सभी वो यात्री हैं जो आपके जीवन की ट्रेन से उतर चुके हैं. उनका मलाल निकाल दीजिये मन से और जो साँसे बची हैं उनके बारे में सोचिए. सीट नम्बर 23 के यात्री ने मेरी बातों को बल दिया. भैय्या जी, मानो अपने भीतर का गुबार निकाल कर कुछ हल्के हुए हैं. उन्होंने सबके साथ भोजन किया.सबके स्नेह से पहली बार उनकी आँखें छलछला आई. ये सबूत था इन आँखों में नमी अब भी बाकी है, कुर्ते की आस्तीन से आँखें पोंछते हुए उन्होंने पानी की बोतल मुँह से लगा ली.

ट्रेन सुबह 5:00 बजे बनारस स्टेशन पहुँचती है सो एक नींद की दरकार सभी को थी. मगर भैय्या जी उसी तरह शून्य को निहारते बैठे थे, उनकी आँखों में नींद दूर- दूर तक नजर नहीं आ रही थी. एक दो बार मैंने भी कहा भैय्या जी सो जाइए दिन भर से बैठे हैं, थक गए होंगे. मगर वो नहीं माने. 4:30 बजे सभी की चहल -पहल शुरू हो गई सो अपने-अपने सामान को हमने भी सहेजना शुरू कर दिया. भैया जी का ख्याल आते ही मन कसैला हो रहा था. वे अपना छोटा सा बेग उठा ही रहे थे कि तभी जान्हवी की आत्मविश्वास से भरी आवाज हमारे कानो में पड़ी, मानो रातभर के मंथन के बाद उसने कुछ निर्णय लिया ,

“बाबा ! आप माई के पास तो जाओगे, डुबकी भी लगाओगे, मगर वहाँ रहोगे नहीं.” भैय्या जी सहित हम सब हैरान से जान्हवी की ओर देखने लगे.

“अरे! ऐसे क्या देख रहे हैं,आप मेरे साथ मेरे घर चल रहे हैं. इस बेटी को पिता की जरूरत है. बचपन से अनाथ आश्रम में पली हूँ. अकेलेपन का दर्द जानती हूँ, बड़ी मेहनत से आज खुद को इस काबिल बना पाई हूँ कि अपने पैरों पर खड़ी हूँ. ईश्वर की दया से इतना कमा लेती हूँ कि अपने बाप की देखभाल कर सकूँ.”

“लेकिन बिटिया …”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं, मुझे कुछ नहीं सुनना है. आपका सामान यहाँ दीजिये. भैया जी रो पड़े ; हाथ जोड़ते हुए जान्हवी के पैरों में झुकने को हुए तो जान्हवी ने उनके दोनों हाथ थाम लिए.

“ये हाथ मेरे सर पर रखो बाबा, मुझे आशीर्वाद की जरूरत है.” मैं मन ही मन शर्मिंदा थी कि मैं जान्हवी के बारे में जाने क्या-क्या सोच बैठी थी और वह क्या निकली. खुद को बौना महसूस कर रही थी उसके आगे. दूसरी ओर खुश भी थी कि उसके बारे में मेरे सारे दावे झूठे साबित हुए. बनारस की भूमि पर उतरे तो लगा साक्षात गंगा माई ने भैया जी को शरण दे दी है. हाँ, ख्याल आया जान्हवी गंगा का ही तो दूसरा नाम है ।

 डा. लता अग्रवाल ‘तुलजा’,भोपाल

MO-919926481878

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *