राष्ट्रमत न्यूज,रीवा(ब्यूरो)। अब नहीं बोलोगे तो कब बालोगे डिप्टी CM साहेब। रीवा का संजय गांधी अस्पताल स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला से संभाले नहीं संभल रहा है,प्रदेश के अस्पताल का क्या हाल होगा बीजेपी के राम को भी पता नहीं होगा। संजय गांधी अस्पताल में इनके डाॅक्टरों की संवेदना मर गयी है। इन्हें यह बात स्वीकार लेनी चाहिए। रीवा मेडिकल हब बनाने की बात बंद कर दें।एक मां अमहिया की,अपने बच्चे को ICU में भर्ती की थी। और एक सप्ताह बाद डाॅक्टर उसे बाहर निकाल दिया। अस्पताल में मरीज इलाज के लिए आते हैं या फिर स्वस्थ्य होने से पहले ही बाहर निकाल देने के लिए। अपने रीवा के अस्तपाल के माथे पर कब तक कालिख पुतवाते रहेंगे। अब तो बता दो।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर कालिख
रीवा के संजय गांधी अस्पताल से इस बार जो तस्वीर सामने आई है उसने पूरे शहर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मांए जो अपने मासूम बच्चे की जान बचाने के लिए अस्पताल आई थी। वहीं इंसानियत के कत्ल की गवाह बन गई। मामूली विवाद,वह भी सिक्योरिटी गार्ड से। जो कि हर मरीज से होते रहता है। उसके बाद हुआ ऐसा अमानवीय व्यवहार जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आईसीयू वार्ड में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे उस मासूम को डाक्टरों ने वार्ड से बाहर निकाल दिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी मां ने अस्पताल की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कर ली थी।

धक्के मार कर निकाल दिया
मां हाथ जोड़कर रो रोकर डाक्टरों के पैरों में गिरकर अपने बच्चे को बचाने की भीख मांगती रही। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि उम्मीद थी।उम्मीद कि जिसे धरती का भगवान कहा जाता है, वही शायद उसके बच्चे पर रहम खा लेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा उन सफेद कोट वाले फरिश्तों ने आज दरिंदगी की हदें पार कर दीं। उन्होंने मां और उसके गंभीर रूप से बीमार बच्चे को अस्पताल से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। अस्पताल के दरवाजे पर वह मां फूट.फूट कर रोती रही। अपने बच्चे को सीने से लगाकर लोगों से कहती रही मेरे बच्चे को बचा लो। मैं हाथ जोड़ती हूं। उसे मरने मत दो।
मीडिया न हो तो न जाने क्या हो
मौजूद सिक्योरिटी गार्ड स्टाफ और डाॅक्टर सब जैसे पत्थर बन चुके थे। इनकी आत्मा मानो मर गयी थी। किसी ने आगे बढ़कर मदद नहीं की। किसी ने एक पल को भी नहीं सोचा कि एक मासूम की जिंदगी दांव पर है। आखिरकार जब मीडिया के कैमरे वहां पहुंचे तब अस्पताल प्रशासन की नींद टूटी। पत्रकारों ने जब अधिकारियों से सवाल किए तो पहले तो सबने चुप्पी साध ली। लेकिन जब कैमरे चले, माइक लगे, और सवाल तेज हुए तब जाकर अधिकारियों ने आनन-फानन में बच्चे को दोबारा एडमिट कराया गया।

अस्पताल है या अत्याचार का अड्डा
पर सवाल यह है क्या अब मरीजों की जिंदगी मीडिया की सुर्खियों पर निर्भर करेगी। क्या बिना कैमरे के अस्पतालों में इंसानियत दम तोड़ देगी? क्या सरकारी अस्पताल अब इलाज के मंदिर नहीं, बल्कि अत्याचार के अड्डे बन चुके हैं?
ऐसी कहानी कब तक,डिप्टी C M बोलो
संजय गांधी अस्पताल का यह पहला मामला नहीं है। आए दिन यहां सिक्योरिटी गार्डों की गुंडागर्दी,नर्सिंग स्टाफ की बदतमीजी,डाॅक्टरों की लापरवाही और वार्ड बाॅय की मनमानी जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। कई बार मरीजों के परिजनों को पीटा गया। कई बार घायल मरीजों को वार्ड से बाहर फेंक दिया गया। लेकिन कार्रवाई, वह हमेशा कागजों तक ही सीमित रही। कोई अधिकारी कभी जिम्मेदारी नहीं लेता, कोई यह नहीं पूछता कि आखिर अस्पताल में गरीब और बेबस मरीजों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
ऐसा बार बार क्यों
यह वही अस्पताल है जहां गरीब, मजदूर, किसान, और दूर.दराज गांवों से लोग आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन यहां उन्हें इलाज नहीं,अपमान और यातना मिलती है। सिक्योरिटी गार्डों को गुंडागर्दी की खुली छूट दी गई है। डाॅक्टरों को प्रशासन का संरक्षण हासिल है। और जब भी कोई सवाल उठाता है,उसे चुप करा दिया जाता है। चाहे वह मरीज हो, परिजन हो या मीडिया का व्यक्ति।

आश्वासन नहीं कार्रवाई हो
अब वक्त आ गया है कि इस पूरे मामले में न सिर्फ जांच हो, बल्कि जिम्मेदार डाॅक्टरों और स्टाफ पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए। यह मामला किसी एक मां और एक बच्चे का नहीं है,यह मामला पूरे सिस्टम की सड़ांध का है।उस सिस्टम का जो गरीब की चीख नहीं सुनता,लेकिन अफसरों की एक काल पर झुक जाता है।
अब कोई माॅ लाचार न रहे
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि आईसीयू में भर्ती एक बच्चे को क्यों निकाला गया। सवाल यह भी है कि क्या अब इंसानियत की कीमत अस्पतालों में बची भी है या नहीं। क्या अब सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज नहीं, बल्कि उनकी बेइज्जती और मौत का इंतजार होता है। रीवा का संजय गांधी अस्पताल आज कठघरे में है। और इस बार जवाब सिर्फ माफी या बयान से नहीं चलेगा। जरूरत है ठोस कार्रवाई की। ताकि अगली बार कोई मां अपने बच्चे को बचाने की गुहार लगाते हुए अस्पताल के गेट पर बेबस और लाचार न खड़ी रहे।