- शोभनाथ शुक्ल की ‘गली आबाद है’ कहानी संग्रह केवल अतीत के समाज का दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने की दृष्टि देने वाला कहानी-संग्रह है। इसकी कहानियाँ आम आदमी के संघर्ष, सामाजिक अन्याय, राजनीतिक विडंबनाओं और नैतिक अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं।
गली आबाद है, मगर क्या समाज भी आबाद है.. \ किताब समीक्षा
शोभनाथ शुक्ल की कहानियों में सामाजिक विसंगतियों, मानवीय संघर्ष और व्यवस्था का विद्रूप कुछ किताबें अपने समय में लिखी जाती हैं, लेकिन उनकी प्रासंगिकता समय बीतने के साथ समाप्त नहीं होती। वे समाज की ऐसी सच्चाइयों को सामने लाती हैं, जो दशकों बाद भी हमारा पीछा करती हैं। शोभनाथ शुक्ल का कहानी-संग्रह ‘गली आबाद है’ इसी श्रेणी की पुस्तक है। 1992 में प्रकाशित इस संग्रह का दूसरा संस्करण सामने आना इस बात का संकेत है कि इसकी कहानियों में उठाए गए सामाजिक प्रश्न आज भी विचारणीय हैं।
संग्रह की ग्यारह कहानियाँ भारतीय समाज के उस यथार्थ को सामने लाती हैं, जहाँ एक ओर विकास, लोकतंत्र और नैतिकता के दावे हैं, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, शोषण और आम आदमी की विवशता भी है। लेखक की दृष्टि उन लोगों पर केंद्रित है, जिनकी समस्याएँ अक्सर सत्ता और व्यवस्था के बड़े दावों के बीच अनसुनी रह जाती हैं।
आम आदमी के जीवन का दस्तावेज
शोभनाथ शुक्ल की कहानियों में किसान, मजदूर, शिक्षक, कर्मचारी, महिलाएँ और ग्रामीण समाज के दूसरे पात्र अपने समय की परिस्थितियों से जूझते दिखाई देते हैं। जमीन पर कब्जा, प्रशासनिक अनियमितता, स्त्री उत्पीड़न और राजनीतिक स्वार्थ जैसे विषयों के माध्यम से लेखक सामाजिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं।

उनकी विशेषता यह है कि वे किसी घटना को केवल व्यक्तिगत दुर्भाग्य मानकर नहीं देखते, बल्कि उसके पीछे मौजूद सामाजिक और संस्थागत कारणों की ओर भी संकेत करते हैं। इसीलिए उनकी कहानियाँ अपने कथानक से आगे बढ़कर समाज के सामने प्रश्न खड़े करती हैं।
‘दायित्व बोध’ : आदर्श और व्यवहार का अंतर
संग्रह की कहानी ‘दायित्व बोध’ एक ऐसे शिक्षक की मनःस्थिति को सामने लाती है, जो अपनी विद्वत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर सजग है, लेकिन निजी जीवन में जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति भी रखता है।मिस्टर वर्मा और उनकी बेटी बेबी के प्रसंगों से शिक्षक के व्यक्तित्व की विभिन्न परतें खुलती हैं। वह दूसरों के सामने आदर्श बने रहना चाहता है, लेकिन अपनी कमजोरियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। बस के समय को लेकर उसकी नाराजगी और अपनी ही समयपालन संबंधी लापरवाही का प्रसंग कहानी में प्रभावशाली व्यंग्य पैदा करता है।
यह कहानी बताती है कि दूसरों से अनुशासन की अपेक्षा करना आसान है, लेकिन स्वयं अपने आचरण की समीक्षा करना कठिन। लेखक उपदेश देने के बजाय पात्र की कमजोरियों के माध्यम से पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं।
‘मुजरिम’ : अपराधी कौन है?
‘मुजरिम’ में गाँव की स्मृतियों के साथ जमीन पर कब्जे और मुकदमे का प्रसंग ग्रामीण समाज में प्रभावशाली लोगों की ताकत तथा कमजोर व्यक्ति की विवशता को उजागर करता है।
कहानी का मूल प्रश्न है कि क्या अपराध केवल वही है, जिसे कानून की नजर में अपराध घोषित कर दिया जाए? या वह व्यवस्था भी जिम्मेदार है, जिसमें धन और प्रभाव रखने वाला व्यक्ति अपने हित में परिस्थितियों का इस्तेमाल कर सकता है, जबकि सामान्य आदमी न्याय पाने के लिए संघर्ष करता रह जाता है?यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है। कहानी जमीन के विवाद से आगे बढ़कर न्याय, सामाजिक शक्ति और अधिकारों की असमानता पर विचार करने का अवसर देती है।
राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक पाखंड
‘विजय जुलूस’ और ‘बाढ़ विजय’ जैसी कहानियाँ राजनीति तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं की ओर संकेत करती हैं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है, जब सत्ता और जनभावनाओं के बीच संबंध बना रहे। जब राजनीतिक विजय आम आदमी की आकांक्षाओं से दूर हो जाती है, तब उत्सव के पीछे छिपे प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठते हैं।
शीर्षक कहानी ‘गली आबाद है’ पत्रकारिता, राजनीतिक प्रभाव और आर्थिक हितों के संबंधों को सामने लाती है। पत्रकार दीनानाथ के माध्यम से स्वतंत्र लेखन और सत्ता के दबाव के बीच का संघर्ष उभरता है। पत्रकारिता का दायित्व समाज की कमियों को उजागर करना है, लेकिन जब आर्थिक और राजनीतिक हित उसकी स्वतंत्रता को प्रभावित करने लगें, तो उसके मूल उद्देश्य पर संकट खड़ा हो जाता है।
संग्रह में स्त्री उत्पीड़न और पुरुषप्रधान मानसिकता से जुड़े विषय भी महत्वपूर्ण हैं। ‘बलात्कार’ जैसी कहानी के संदर्भ में सामाजिक व्यवस्था और स्त्री के विरुद्ध हिंसा के प्रश्न सामने आते हैं। ऐसे विषयों का साहित्यिक महत्व केवल घटना की भयावहता दिखाने में नहीं, बल्कि उस मानसिकता को पहचानने में है, जो अन्याय को संभव बनाती है।
भाषा और कथा-शिल्प
लेखक की भाषा में सहजता और संवादों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीण परिवेश तथा स्थानीय बोलचाल के प्रयोग से पात्रों को सामाजिक पहचान मिलती है। सामान्य जीवन की घटनाओं के भीतर छिपे अंतर्विरोधों को सामने लाना उनके कथा-लेखन का उल्लेखनीय पक्ष है।
हालाँकि, विचारप्रधान कहानियों में सामाजिक संदेश की स्पष्टता और कलात्मकता के बीच संतुलन बनाए रखना एक चुनौती होती है। कहीं-कहीं विचार की प्रधानता कथा की सूक्ष्मता पर भारी पड़ सकती है। फिर भी लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता और अपने समय के प्रश्नों से मुठभेड़ करने की प्रवृत्ति इस संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है।
किसी गली का आबाद होना केवल वहाँ घरों, दुकानों और लोगों की मौजूदगी से तय नहीं होता। उसकी वास्तविक आबादी इस बात में है कि वहाँ रहने वाले लोगों को कितना सम्मान, कितना न्याय और कितनी स्वतंत्रता प्राप्त है।
यदि कमजोर व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश है, पत्रकार सच लिखने की कीमत चुकाता है और समाज आदर्शों की बातें करते हुए अपने आचरण के अंतर्विरोधों से आँखें चुराता है, तो उस आबादी के भीतर एक गहरा वीराना मौजूद है।शोभनाथ शुक्ल की कहानियाँ इसी भीतरी वीराने को पहचानने का प्रयास करती हैं। यही इस संग्रह की सार्थकता है और यही इसे आज भी पढ़े जाने योग्य बनाती है।

रमेश कुमार ‘रिपु’
समीक्षक
मो. 7974304532
पुस्तक : गली आबाद है (कहानी-संग्रह)
लेखक : शोभनाथ शुक्ल,प्रकाशक : साक्षी प्रकाशन संस्थान