प्यार के नाम \ कहानी - rashtrmat.com

प्यार के नाम \ कहानी

       सुधा गोयल की कहानी  प्यार के नाम आधुनिक दौर के आभासी प्रेम, भावनात्मक लगाव और विश्वासघात की मार्मिक कहानी है। आभासी दुनिया में बने रिश्तों पर आँख मूँदकर विश्वास करना कभी-कभी बेहद घातक साबित हो सकता है। प्रेम में भावनाओं के साथ विवेक और वास्तविकता की पहचान भी आवश्यक है। प्रेम में पूरी तरह डूबी समिधा धोखे को सहन नहीं कर पाती और अंततः अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है।

                 प्यार के नाम \ कहानी 

व्हाट्सएप की रिंग बजी।समिधा ने फौरन मोबाइल चैक किया। शुभरात्रि के दो शब्दों के साथ गुलाब के दो फूल मुस्करा रहें थे। उसने समय देखा।फौरन टाइप किया –
“अभी से?क्या हुआ?”
“कुछ नहीं , थोड़ा सिर भारी हो रहा है “.
“वाम लगा लो”.
“लगा ली”
“मैं दबा दूं ”
“कैसे?”
“वीडियो  काॅल करो”-अमित। ने फौरन वीडियो चालू कर दिया।समिधा ने दोनों बाहें आगे बढ़ा दीं। गलबहियां तो नहीं हो पायीं, हां माथे पर चुम्बन जड़ दिया।
“अब गया सिर दर्द?”मुस्करा पड़ी समिधा।
“तुम्हें देखकर चला जाएगा”-अमित ने लिखा।
“क्या अभी सो जाओगे?”
“मन तो नहीं है,पर मन नहीं लग रहा।”
“चले आओ फिर ”
“कैसे?मैं और तुम डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ।”
“हां तो तुम अपने परिवार के साथ और मै……”आवाज भर्रा गई समिधा की।
“मायूस क्यों होती हो?”पुचकारा अमित ने।
“और क्या करुं?? तुम बिन रात नहीं कटती।मन होता है समा जाऊं।दो जिस्म एक हो जाएं।”
“ऐसा कैसे हो सकता है?”
“हो सकता है ।मन बनाओ।”
“तुम्हीं उपाय बताओ।”
“आफिस टूर के बहाने दो दिन के लिए किसी हिल स्टेशन पर निकले और होटल में कमरा बुक करा लें ।मैं भी सेमिनार के बहाने निकलती हूं।”
“विचार तो अच्छा है। सोचता हूं कुछ।
“जल्दी सोचना अमित।तुम बिन अब रहा नहीं जाता ।एक बार तुम्हें पा लूं “-सुनकर मुस्करा पड़ा अमित।
रोज रात को घंटों चैटिंग होती। बातों का कोई ओर-छोर नहीं।प्यार की लम्बी लम्बी बातें जैसे किसी गुफा से निकल पड़तीं।तन मन। दोनों सराबोर हो जाते।एक रुमानी दुनिया बस जाती।दिन और महीने ऐसे ही खिसक रहे थे। बातों का सिलसिला घटता ही न था।मिलन की चाह बढ़ती ही जा रही थी।
अमित ने लिखा —
सन्नाटा जब बोलता गहरी होती रात
मन की गहरी पर्त में बैठी नूतन बात।”
उत्तर लिखा समिधा ने –
“मीरा जैसी हुई साधना
मन वृंदावन कर डाला
मन में नाम की माला जपकर
मन को कान्हा कर डाला।”


रात भर शायरी चलती रही।प्रति रात दस बजे के लगभग दोनों चैट करते।एक दूसरे की फोटो छाती से लगाते चूमते और कल्पनाओं में खोते सो जाते। आंखें खुलती सुप्रभातम की व्हाइटस्एप रिंग के साथ। अमित लिखता-
“रग रग में एहसास तुम्हारा
प्यार खड़ा है पास तुम्हारा
दुनिया में क्या होगा बढ़कर
दिल में है विश्वास तुम्हारा।
उत्तर मिलता
आंख ढंग से खुलीं ही नहीं
कि तुम सामने आ गये
ये क्यों कैसे कब हुआ
पर तुम मन में छा गये।
सुबह भी प्यार के साथ और रात भी कहे अनकहे शब्दों के साथ,दो तन मिलन को मचलते हुए।इसी प्रकार
की महीने निकल गये। वीडियो और बातें, प्यार के सैंकड़ों वायदे,मिलन की उत्सुकता। आखिर एक दिन अमित ने रात को समिधा को फोन पर बताया कि मसूरी में स्टर्लिंग
रिसोर्ट में एक कमरा बुक करा दिया है दो दिन के लिए।तुम भी महीने की पच्चीस तारीख को निकलना ,मैं भी पंहुचा रहा हूं।
“पक्का है न?”समिधा ने पूछा।
“तुम्हें शक है, विश्वास नहीं हो रहा?”
“हो जाएगा जब वहां मिलेंगे और सारी तड़पन को विराम मिल जाएगा।”उछल पड़ी समिधा।हिसाब लगाया।अभी दस दिन बाकी हैं।दस दिन बाद वे दोनों अमित और समिधा,वह भावना में बहकर अमित की फोटो को बार बार चूमने लगी-“अमित अब तुमको मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता।मैं आ रही हूं । तुम्हें पाना मेरा सपना है। बहुत बहुत खुश हूं।
उस दिन के बाद से दोनों की रातें और छोटी हो गई। बातों के सिलसिले और लम्बे हो गये।दो प्यार भरे दिल अनेक सपनों के साथ यह भी पूछना न भूलते कि क्या क्या लें जाना है।दस दिन तैयारी के लिए कम लग रहे थे।दिन में क ई बार रिसोर्ट का नाम और नम्बर पढ़तीं।फोन पर फोटो देखती और अमित अनदेखे स्वप्न लोक की सैर कराता।आ रही हूं अमित तुम्हारी बाहों में।


उसने सोचा -अमित से क्या खाली हाथ ही मिलेगी? बातें इतनी करती है पर उसकी रुचियां नहीं जानती। उसने अपने दिमाग पर जोर दिया।जब कुछ भी समझ में नहीं आया तो बाजार में एक ज्वैलरी शॉप पर जा पहुंची।एक सुंदर सा ब्रेसलेट पसंद किया।हाथ में लेकर जांचती परखती रही।मन किया फोटो खींच कर भेज दूं और पूंछू-पसंद है। फिर मन से आवाज उठी-ऐसा पूंछना उचित नहीं होगा। अचानक मिले उपहार से खुशी ज्यादा होती है।अभी सही नहीं।अभी उसका मन नहीं माना। ब्रांडेड कम्पनी की मन पसंद शर्ट खरीदी,एक रिस्ट वाॅच भी। पैसों की कोई फ़िक्र नहीं। अमित के लिए इतना तो कर ही सकती है।क्या अमित भी उसके लिए? विचार उठे और शांत हो गये। विचार झटक दिये।यह अमित के मन का मामला है।यह उसकी सोच है ।वह क्या सोचता है।वह उसे क्यों बताएं?सोचकर मन ही मन मुस्कराई। अमित को इस बारे में कुछ भी नहीं बताएगी। कुछ तो सरप्राइज होना चाहिए।
उसे याद आया दोनों जबलपुर एक सेमिनार में मिले थे। दोनों पास पास ही बैठे थे ।हल्का सा परिचय हुआ।चार दिन रुकना था।अक्सर टकरा जाते।हल्की फुल्की बांते हो जातीं।कभी चाय काफी साथ में हो जाती।एक शाम दोनों साथ घूमने निकल गये।बस इतना ही परिचय रहा। लौटते समय एक दूसरे के नंबर लिए और अपने अपने घरों को चल दिए।
कभी कभी दोनों एक दूसरे से बातें कर लेते।राजी खुशी पूंछ लेते।ये बातें धीरे धीरे मुस्कराहटें बन गई। दिलों को छूने लगीं।अनकही कहीं हो गई। बहुत कुछ शेयर होने लगा।देह पर आकर रुक गई।जाने कौन सा प्यार का नगमा छिड़ा कि दोनों डूबने लगे और आकंठ डूबे गये।
समिधा ने अपने दो बैगों में सामान रखा।क ई तरह के सूट , साड़ियां,नाइट ड्रेस,कास्मैटिक्स कई तरह के,पूरी देह पर जाने क्या क्या लगातीं रही,ब्यूटी पार्लर जाकर रुप रंग बदल लिया। जैसे बौरा गई हो। पैंतीस में बीस की दीखने का मन।
निश्चित तिथि भी आ गई। फ्लाइट से टिकट बुक कराई।मन उड़ा जा रहा था।पंहुच गई मसूरी। पंहुचते ही अमित को फोन लगाया। बिज़ी आ रहा था।वह सीधे गाड़ी लेकर रिसोर्ट पंहुच गई।सोचा कुछ देर में पंहुच जाएगा। एअरपोर्ट पर अमित का इंतजार करने की जगह रिसोर्ट पंहुचना ज्यादा ठीक लगा।
एक घंटा हो गया। अमित का कोई रेसपांस नहीं। उसने फिर फोन लगाया।फोन स्विच आफ।अब उसकी चिंता का परावार नहीं था।किस से पूंछे। अमित अभी तक क्यों नहीं पंहुचा।यह तो उसी का प्लान था। कहां रह गया?फोन क्यों स्वीच आफ आ रहा है। रिसोर्ट उसके ही नाम से बुक था यह उसने पता कर लिया था।
क्या अमित के साथ कोई दुर्घटना हो गई।मन में ढ़ेरों आशंकाएं, लेकिन उत्तर कहीं भी नहीं। उसे अमित का घर आफिस कुछ भी पता नहीं था।पता था केवल मोबाइल नंबर और ढ़ेरों बांते,रसभरी प्यार में डूबीं, सलोने सपने, स्वच्छंद पंछी सा उड़ता मन,देह की बातें रहीं पर देह कभी देह न बन सकी।


सपने आते रहे,मन को चलाते रहे,कहीं अनकही बातें,छूने का मौका मिल गया तो कभी अलग नहीं होंगे।प्यार की गहरी सी स्वप्निल सी सुरंग,जिसका कोई अंत नहीं,केवल चलते रहो और दोनों कदम मिलाते हाथ पकड़े एक दूसरे का दिल थामे अनजानी सी राह पर चल रहे थे जहां रात दिन कि होश न था।दिन में कई कई बार फोन बज उठते।एक दूसरे का इंतजार रहता। कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया जाता।एक दूसरे की फ़िक्र होती।कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन गया था।
एक दिन चिंता में गुजर गया।पल पल फोन लगातीं और फोन स्विच आफ।अगले दिन सुबह गूगल सर्च की और अमित के आफिस का पता लगाया। वहीं से फोन नंबर लिया।सूचना मिली कि अमित सर दो महीने के लिए लंदन निकल गये हैं।
वह रिसीवर को देखती रही। धड़ाम से जमीन पर आ गिरी। अमित यह तुमने क्या किया।किस स्वप्न लोक के सपने दिखाए। क्यों छला मुझे?शाक्ड समिधा चैक आउट कर लौट आई और उसी रात ढ़ेर सी नींद की पिल्स खाकर उस अंधेरी गुमनाम गुफा में खुशियों का ताजमहल लिए हमेशा को सो गई।


सुधा गोयल
290-ए, कृष्णानगर,डा.दत्ता लेन, बुलंदशहर -203001
मोबाइल नंबर -9917869962

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