नक्सली बम में 38 जवान शहीद,57 ग्रामीण मरे तब खत्म हुआ नक्सलवाद - rashtrmat.com

नक्सली बम में 38 जवान शहीद,57 ग्रामीण मरे तब खत्म हुआ नक्सलवाद

राष्ट्रमत न्यूज बालाघाट(ब्यूरो)। मध्यप्रदेश में लगभग 35 वर्षो तक नक्सलियों की जनताना सरकार बालाघाट में दहशत का सिक्का चलाती आई। इस दौरान नक्सलियों ने 57 ग्रामीण की जानें ली। और 38 जवान शहीद हुए। वहीं 45 हार्डकोर नक्सली मारे गए और 28 गिरफ्तार हुए। इसी के साथ मध्यप्रदेश यानी बालाघाट जिले से नक्सलवाद का नाश हो गया। बालाघाट के सारे नक्सली सरेंडर हो गए लेकिन जंगल में नक्सलवाद की विचार धारा बांस के सीने में चिंगारी की तरह छिपी है। यह चिंगारी कितने चुनाव तक आग बनने से रोकेगी न सरकार जानती है और न ही पुलिस थानो का रोेजनामचा।


बालाघाट नक्सल मुक्त हुआ
सुरक्षा बल के 38 जवानों की शहादत बेकार नहीं गयी। उनकी शहादात का ही अस र है कि आज बालाघाट से नक्सलवाद खत्म हो गया। भारत सरकार द्वारा मार्च 2026 तक नक्सलवाद के उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन मध्यप्रदेश ने यह लक्ष्य तीन माह पहले ही हासिल कर लिया। 11 दिसंबर को बालाघाट जिले में सक्रिय बचे हुए अंतिम दो हार्डकोर नक्सलियों डीव्हीसीएम दीपक उर्फ सुधाकर और एसीएम रोहित उर्फ मंगलू ने शासन की नीतियों पुनर्वास योजनाओं और सुरक्षा की गारंटी पर भरोसा जताते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। इनका आत्मसमर्पण राज्य के लिए ऐतिहासिक क्षण बन गया और आधिकारिक रूप से बालाघाट को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया।


नक्सलियों के खिलाफ पहली FIR
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में नक्सलवाद की शुरूआत वर्ष 1985 में मानी जाती है। ग्रामीण इलाकों में संगठन के पैरों की आहट धीरे-धीरे तीव्र होती गई। पालगोंदी निवासी दीपक उर्फ सुधाकर ने वर्ष 1986 में नक्सल दलम ज्वाइन किया और उसके बाद नक्सलवाद ने अपनी जड़ें बालाघाट,डिंडोरी और मंडला जिलों में फैलानी शुरू कीं। 1990 से नक्सलियों ने हिंसा और धमकी के माध्यम से स्थानीय ग्रामीणों को प्रभावित कर अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू किया। मध्यप्रदेश में नक्सलियों के विरुद्ध पहली एफआईआर वर्ष 1990 में थाना बिरसा में दर्ज की गई। जिसके बाद सुरक्षा बलों ने आॅपरेशन तेज कर दिए।


नक्सलियों ने वन मंत्री को मारा
1995 के बाद बालाघाट में नक्सली गतिविधियों में तेज बढ़ोतरी देखी गई। इसी दौरान जंगलों में दलमों की सक्रियता और आंदोलन दोनों गति पकड़ चुके थे। 16 दिसंबर 1999 को नक्सलियों ने उस समय के मध्यप्रदेश शासन के वन मंत्री लिखीराम कावरे की हत्या कर राज्य की राजनीति और सुरक्षा तंत्र को झकझोर कर रख दिया। यह घटना बालाघाट की धरती पर नक्सली हिंसा का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। इसके बाद राज्य सरकार और सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर नक्सल विरोधी रणनीतियाँ तैयार कर अभियान मजबूत किएए लेकिन घने जंगल,भौगोलिक परिस्थितियाँ और नक्सलियों की जमीनी पकड़ के कारण यह जंग लंबी चलती रही।


35 वर्षो में 38 जवानों की शहादत
बालाघाट में नक्सलवाद आया देर से और गया भी देर से। सन् 1990 से 2025 तक चले अभियान में 38 पुलिसकर्मियों ने वीरगति पाई। सीआरपीएफ, कोबरा, हाकफोर्स और जिला पुलिस बल के कई जवान इस लड़ाई में शहीद हुए। इनके अलावा 57 निर्दोष ग्रामीण भी लाल आतंक की भेंट चढ़ गए। ग्रामीणों पर नक्सलियों का दबाव आर्थिक दोहन, धमकी और हिंसा लगातार जारी रही। बावजूद इसके स्थानीय लोगों ने सुरक्षा बलों का समर्थन किया और नक्सलवाद के खिलाफ खड़े रहे। इस मोर्चा पर जवानों का सफलतायें भी मिली। जहां जवानो नें 45 हार्डकोर नक्सली ढेर किये वहीं 28 हार्डकोर नक्सलियों को जिंदा गिरफ्तार किया। इनमें नक्सल दलम के कई गुर्गे, कट्टर समर्थक और सहयोगी भी पकड़े गए। इन अभियानों में सुरक्षा बलों की सूझबूझ सटीक इंटेलिजेंस घने जंगलों में तकनीक का उपयोग और स्थानीय नागरिकों की भूमिका निर्णायक रही। हाकफोर्स सीआरपीएफ,कोबरा बटालियन और जिला पुलिस बल ने अनेक संयुक्त आॅपरेशन चलाए जिनमें कई मोर्चों पर नक्सलियों को बड़ा नुकसान पहुँचाया गया।


नक्सलवाद का अध्याय खत्म
दो नक्सलियों के सरेंडर करते ही मध्यप्रदेश में नक्सली आग बुझ गयी। 11 दिसंबर 2025 को बालाघाट में सक्रिय अंतिम दो नक्सलियों डीव्हीसीएम दीपक उर्फ सुधाकर एवं एसीएम रोहित उर्फ मंगलू ने भी आत्मसमर्पण कर दिया। जिससे एक युग का अंत माना जा रहा है। दोनों पर कई गंभीर आरोप थे और ये लंबे समय से सुरक्षा बलों की खोज में थे। सुधाकर वर्ष 1986 से नक्सली दलम में सक्रिय रहा था और 35 वर्षों तक नक्सल गतिविधियों का हिस्सा रहा। इसके समर्पण को सुरक्षा एजेंसियाँ सबसे बड़ी सफलता मान रही हैं। दोनों ने शासन की पुनर्वास नीतिए परिवार को सुरक्षा और मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर को देखते हुए आत्मसमर्पण किया। इनका आत्मसमर्पण ही मध्यप्रदेश को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित करने का आधार बना। राज्य सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में नक्सलियों के लिए पुनर्वास पैकेज, रोजगार, आवास सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की गारंटी जैसे प्रावधानों को मजबूत किया। डिजिटल सर्विलांस बेहतर सड़क निर्माण ग्रामीण संपर्क,पुलिसझ्रजन सहयोग और संयुक्त टास्क फोर्स का गठन भी इस सफलता में महत्वपूर्ण रहा।


विकास योजनाओं का रास्ता साफ
बालाघाट जो दशकों तक मध्यप्रदेश का सबसे संवेदनशील नक्सल क्षेत्र माना जाता था अब नई पहचान की ओर बढ़ चला है। घने जंगलों में आतंक फैलाने वाले दलमों का सफाया हो चुका है। जिले में अब विकास योजनाओं का रास्ता साफ है।

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