सिलिकॉन का दिमाग और उनकी नाराज़गी - rashtrmat.com

सिलिकॉन का दिमाग और उनकी नाराज़गी

अब हम वाईफाईसक्षम प्राणी हो गए हैं। हमारी स्मृति क्लाउड में है, भावनाएँ इमोजी में और तर्क एल्गोरिद्म के भरोसे।हम  अपना जन्मदिन भूल सकते हैं, पर फोन की बैटरी का प्रतिशत हमें कंठस्थ रहता है। हमने अब  वह सभ्यता विकसित कर ली है जिसने ज्ञान का महासागर रचा और फिर उसमें तैरने के बजाय किनारे बैठकर रील बनाने लगी।

                                         सिलिकॉन का दिमाग और उनकी नाराज़गी/ व्यंग्य

डॉ प्रदीप उपाध्याय

उन्होंने धरती पर उतरकर सबसे पहले मुझे पकड़ा और बड़ी नाराजगी से कहा– “मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूं मानव।तुम्हें मेरी बधाई सृष्टि पर विश्वास नहीं।तुम अपनी ही दुनिया बनाने में जुट गए हों।यह क्या हो रहा है जहां तुम मेरे बनाए अंगों पर विश्वास नहीं कर रहे हो और तुम कृत्रिम अंगों पर विश्वास कर उन्हें बनाने का घिनौना काम कर रहे हो! क्या तुम मेरी सत्ता को चुनौती देना चाहते हो!”

अरे नहीं भगवन्,आप तो सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञानी,सर्वस्व हो।भला आपको कौन चुनौती दे सकता है लेकिन आपके काम को हल्का करने की दृष्टि से ही हमने मानवीय अंगों, मानवीय इंद्रियों को बनाने और अपग्रेड करने का बीड़ा उठाया है। आपको तो खुश होना चाहिए। हमने मनुष्य के साथ ही पशुपक्षियों के कृत्रिम अंग बनाने का काम तो किया ही है। कृत्रिम बुद्धि पर भी काम हो चुका है।

लेकिन हमने सुना है कि तुमने अब स्वयं सोचनासमझना बंद कर दिया है और तुम किसी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर पूरी तरह निर्भर हो गये हो!”

या खुदा!यह खबर भी आप तक पहुंच गई।अब क्या करें, हमारी बुद्धि का सीमित दायरा है। किसी के भेजे में आप ज्ञान का भंडार भर देते हैं और किसी के भेजे में गोबर और इसीलिए हमने यह सोचकर कि सभी अपने दिमाग की जगह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके खुद को साबित कर सकें।इस तरह से दिमागी तौर पर समानता रहेगी ।तब इसे हम दिमागी समाजवाद भी कह सकेंगे। यहां कोई भेद नहीं कर सकेगा और सोशल मीडिया पर भी कृत्रिम बुद्धि की सहायता से हर कोई बुद्धिमान साबित हो सकेगा।

यानी कि तुमने विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि  हासिल कर यह  स्वीकार कर लिया कि तुम खुद सोचने के काम से सेवानिवृत्त होना चाहते हो तुम्हें मालूम होना चाहिए कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दरअसल तकनीक की खोज कम और मानव बुद्धि की स्वैच्छिक वीआरएस योजना ज्यादा है।ईश्वर ने  मखौल उड़ाते हुए कहा।

प्रभु,सदियों तक प्राकृतिक बुद्धि ने हमें उलझनों में डाला, अब हमने तय कर लिया है कि उलझने भी आउटसोर्स होंगी। आपके कारण ही कहा जाता था कि मनुष्य विचारशील प्राणी है। अब हमने ज्यादा उल्टेसीधे विचार करना बंद कर दिया है।अब हम वाईफाईसक्षम प्राणी हो गए हैं। हमारी स्मृति क्लाउड में है, भावनाएँ इमोजी में और तर्क एल्गोरिद्म के भरोसे।हम  अपना जन्मदिन भूल सकते हैं, पर फोन की बैटरी का प्रतिशत हमें कंठस्थ रहता है। हमने अब  वह सभ्यता विकसित कर ली है जिसने ज्ञान का महासागर रचा और फिर उसमें तैरने के बजाय किनारे बैठकर रील बनाने लगी।

यानी तुम्हारी अपनी बुद्धि कोमा में चली गई और तुम आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के सहारे वेंटिलेटर पर कृत्रिम बुद्धि से जी रहे हो।ईश्वर ने  तंज कसा।

मेरे परवरदिगार,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उद्देश्य मानव जीवन को सरल बनाना है। हमने यह लक्ष्य शानदार ढंग से हासिल किया ,जीवन इतना सरल हो गया है कि अब जटिल सोच की आवश्यकता ही नहीं रही। प्रश्न पूछने की कला लुप्तप्राय है, क्योंकि उत्तर पहले से ही उंगलियों के इशारे पर उपलब्ध हैं। मनुष्य को अब जिज्ञासु रहने की जरूरत ही नहीं है, उसके लिए सर्चइंजन जो उपलब्ध है।मैंने हास्यबोध के साथ कहा।

क्या तुम इस बात से इंकार कर सकते हो कि तुम्हारी अपनी बुद्धि से होने वाली प्राकृतिक मूर्खताओं की अपनी गरिमा थी। वे धीरेधीरे फैलती थीं, अनुभव से टकराकर टूटती थीं। आज वही मूर्खताएँ हाईस्पीड इंटरनेट पर अपलोड हो चुकी हैं। अफवाहें अब पैदल नहीं चलतीं; वे फाइबर ऑप्टिक के पंख लगाकर उड़ती हैं। हर व्यक्ति अपने मोबाइल में एक निजी ब्रह्मांड लेकर घूम रहा है, जहाँ वह स्वयं ही विद्वान, संपादक और सत्य का अंतिम निर्णायक होने चला है!”आगे उन्होंने फिर कहा, “कितनी विडंबना है कि मशीनें सीख रही हैं और मनुष्य अपनी सीख मिटा रहा है। एआई कविता लिख रहा है, चित्र बना रहा है, संगीत रच रहा है; और मनुष्य लाइक और शेयर की गिनती में रचनात्मकता का श्राद्ध कर रहा है। संवाद की जगह नोटिफिकेशन ने ले ली है। बातचीत अब उतनी ही होती है जितनी स्क्रीन अनुमति देती है।सबसे करुण हास्य तब पैदा होता है जब प्राकृतिक मूर्खता, कृत्रिम बुद्धि की संरक्षक बन बैठती है। जो समाज ट्रैफिक सिग्नल का अर्थ अब तक पूरी तरह नहीं समझ पाया, वह एआई नैतिकता पर संगोष्ठियाँ कर रहा है। जिन्हें किताबों से एलर्जी है, वे मशीनों को ज्ञान का संस्कार सिखाने निकले हैं। यह वैसा ही है जैसे धुआँ आग को शुद्धता का पाठ पढ़ाए।

भगवन्,ऐसा नहीं है।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हमारी कार्यक्षमता बढ़ाई है, भले ही हमारी मानसिक मांसपेशियां शिथिल हुई हों, सोचने की मेहनत अब विलासिता मानी जाती हों। लेकिन निर्णय एल्गोरिद्म लेते हैं और हम उन्हेंमेरी रायकहकर साझा करते हैं। आज ज्ञान की उपलब्धता अपने चरम पर है, आप भले ही कहें कि विवेक का अकाल पड़ गया है। किंतु सूचना का विस्फोट हुआ है, स्वभावत: हमने समझ के संकुचन को स्वीकार लिया है। यहां हर व्यक्ति विशेषज्ञ हो गया है, क्योंकि उसके पास उद्धरण हैं।

लेकिन क्या  अनुभव का दिवालियापन तुम छुपा सकोगे!”

प्रभु,हमने मशीनों को तेज बनाया है और खुद को उतावला।और इसी के सहारे हम आगे बढ़ते जा रहे हैं।आपकी दी हुई बुद्धि में सवाल बहुत थे किन्तु जवाब नहीं मिल पाते थे।अब सवाल भी वहीं से मिल जाते हैं और जवाब भी वहीं से।

वत्स, इसमें असली संकट यह नहीं कि मशीनें मनुष्य से ज्यादा बुद्धिमान हो जाएँगी। संकट यह है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक बुद्धि का प्रयोग करना छोड़ देगा। सुविधा का निरंतर विस्तार तुम्हें एक ऐसे बिंदु पर ले जा रहा है जहाँ सोचने की क्षमता बोझ लगेगी और निर्भरता सामान्य।इतिहास शायद इस युग को उस समय के रूप में दर्ज करेगा जब मनुष्य ने अपने दिमाग का बैकअप तो सुरक्षित रख लिया, पर मूल प्रति का उपयोग बंद कर दिया। सिलिकॉन का दिमाग चमकता रहेगा, पर कार्बन की मूर्खताएँ उसे दिशा देती रहेंगी !” 

ऐसा कहकर ईश्वर अंतर्ध्यान हो गए और मैंने उनकी कही बात और प्रश्न एआई के हवाले कर दी और स्वयं लंबी चादर तानकर  सो गया।

डॉ प्रदीप उपाध्याय

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