रमेश कुमार रिपु कहानी कर्तव्य की रोशनी विद्यार्थी जीवन में कर्तव्यबोध का विकास केवल एक अच्छे नागरिक का निर्माण नहीं करता, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान भी बनाता है। सच्ची सफलता वही है जिसमें व्यक्ति अपनी उन्नति के साथ दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे और अपने आचरण से इंसानियत की सीख दे।
कर्तव्य की रोशनी \ कहानी
सुबह की प्रार्थना सभा समाप्त हो चुकी थी। विद्यालय के मैदान में खड़ी छात्राओं की कतारें धीरे-धीरे कक्षाओं की ओर बढ़ रही थीं। कोई अपनी सहेली से हँसते हुए बात कर रही थी, तो कोई गृहकार्य पूरा न होने के कारण परेशान थी। कुछ छात्राएँ मैदान में गिरे कागजों को पैरों से हटाती हुई आगे बढ़ गईं। उनके लिए यह मामूली बात थी। विद्यालय की सफाई करना चपरासी का काम था, उनकी जिम्मेदारी नहीं।

लेकिन बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली अनन्या की नजर जमीन पर पड़े कागजों पर पड़ी तो वह रुक गई। उसने झुककर कागज उठाए और पास रखे कूड़ेदान में डाल दिए।
उसकी सहेली रिया ने हँसते हुए कहा, “तुम भी न, हर समय समाज सुधारने में लगी रहती हो। दो कागज ही तो हैं। इन्हें उठाने से तुम्हारा क्या फायदा होगा?”
अनन्या मुस्कराई।
“फायदा हर काम में ढूँढ़ना जरूरी है क्या? यह विद्यालय हमारा भी तो है। अगर हम ही इसे साफ नहीं रखेंगे, तो दूसरों से कैसे उम्मीद करेंगे?”
रिया ने कंधे उचकाए और आगे बढ़ गई।
अनन्या के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। वह अपने काम के साथ-साथ उन जिम्मेदारियों को भी समझती थी, जिन्हें अक्सर लोग दूसरों का काम मानकर छोड़ देते हैं। उसे लगता था कि नागरिक होने का अर्थ केवल अपने अधिकारों की माँग करना नहीं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को बेहतर बनाने में योगदान देना भी है।
उसके पिता एक साधारण कर्मचारी थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में हाथ बँटाती थीं। घर में उसे कभी बड़े-बड़े भाषण नहीं सुनने को मिले, लेकिन माता-पिता के व्यवहार ने उसे बहुत कुछ सिखाया था।
पिता कहा करते थे, “बेटी, आदमी की असली पहचान उसके पद या पैसे से नहीं होती। पहचान इससे होती है कि वह अपने हिस्से की जिम्मेदारी कितनी ईमानदारी से निभाता है।”
माँ की सीख भी कुछ ऐसी ही थी।
“किसी की मदद करके कभी यह मत सोचना कि तुमने उस पर एहसान किया है। आज तुम किसी के काम आई हो, कल तुम्हें भी किसी की जरूरत पड़ सकती है।”
अनन्या ने इन बातों को केवल सुना नहीं था, बल्कि धीरे-धीरे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था।
एक छोटी–सी बात, बड़ा विवाद
विद्यालय में वार्षिक विज्ञान प्रदर्शनी की तैयारियाँ चल रही थीं। बारहवीं कक्षा की छात्राओं को अलग-अलग समूहों में बाँटकर मॉडल बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। अनन्या के समूह में पाँच छात्राएँ थीं। सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
समूह की दो छात्राएँ, साक्षी और पायल, आपस में बहुत अच्छी मित्र थीं। लेकिन प्रदर्शनी से तीन दिन पहले दोनों के बीच विवाद हो गया।
साक्षी का आरोप था कि पायल ने मॉडल बनाने के लिए जमा किए गए पैसों का हिसाब ठीक से नहीं रखा। पायल का कहना था कि उसने अपनी तरफ से सारे पैसे खर्च किए थे और हिसाब की पर्चियाँ भी उसके पास थीं।
बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक-दूसरे पर बेईमानी का आरोप लगा दिया।
“मुझे तुम्हारे साथ कोई काम नहीं करना!” साक्षी ने गुस्से में कहा।
“तो मत करो! मैं भी तुम्हारे भरोसे नहीं बैठी हूँ,” पायल ने जवाब दिया।
दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। अब समस्या केवल पैसों के हिसाब की नहीं थी। दोनों अपने आत्मसम्मान को लेकर अड़ गई थीं। समूह का काम रुकने लगा और बाकी छात्राएँ भी दो हिस्सों में बँट गईं।
किसी ने साक्षी का पक्ष लिया, तो किसी ने पायल का।
अनन्या चुपचाप सब देख रही थी।वह जानती थी कि बिना पूरी बात जाने किसी एक को दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा। उसने पहले साक्षी से अलग बात की, फिर पायल से।दोनों ने अपनी-अपनी बात बताई। अनन्या को समझ में आया कि असली गलती शायद पैसों के हिसाब में स्पष्टता न रखने की थी। कुछ खर्चों की पर्चियाँ अलग थीं और कुछ सामान की कीमत याददाश्त के आधार पर बताई जा रही थी।
उसने दोनों से कहा, “हम सबका उद्देश्य मॉडल तैयार करना था। अगर हिसाब में कोई कमी रह गई है, तो उसे मिलकर ठीक किया जा सकता है। लेकिन एक-दूसरे को बेईमान कह देने से समस्या हल नहीं होगी।”
साक्षी ने तुरंत जवाब दिया, “तुम बीच में मत पड़ो। यह हम दोनों का मामला है।”
अनन्या को बुरा लगा, लेकिन उसने अपने भाव चेहरे पर नहीं आने दिए।
“ठीक है, यह तुम दोनों का मामला है। लेकिन जब इसका असर पूरे समूह के काम पर पड़ रहा है, तब यह केवल तुम दोनों तक सीमित नहीं रह जाता। मैं किसी का पक्ष नहीं ले रही। मैं चाहती हूँ कि सच सामने आए और तुम दोनों के बीच गलतफहमी खत्म हो।”
साक्षी और पायल को भी लगा कि अनन्या ठीक कह रही है। दोनों उसकी बात पर सहमत हो गए।
अगले दिन अनन्या ने समूह की सभी छात्राओं को एक जगह बैठाया। उसने किसी पर आरोप नहीं लगाया। सबके सामने खर्चों की सूची बनाई गई। जिन चीजों की रसीदें उपलब्ध थीं, उन्हें दर्ज किया गया। बाकी खर्चों के बारे में संबंधित छात्राओं से पूछा गया।
धीरे-धीरे पूरा हिसाब साफ हो गया।पता चला कि पायल ने कुछ सामान अपने पैसों से खरीदा था, जिसका हिसाब उसने बाद में जोड़ने के लिए अलग रखा था। दूसरी ओर, साक्षी को लगा था कि समूह के पैसे से खरीदे गए सामान का हिसाब छिपाया जा रहा है।
दोनों को अपनी-अपनी गलतफहमी का एहसास हुआ।कुछ देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही।
फिर साक्षी ने धीमे स्वर में कहा, “पायल, मुझे तुम्हें बेईमान नहीं कहना चाहिए था। मुझे पहले पूरी बात समझनी चाहिए थी।”
पायल की आँखें नम हो गईं।
“और मुझे भी गुस्से में तुम्हें जवाब नहीं देना चाहिए था। हम बात करके भी तो समस्या सुलझा सकते थे।”
अनन्या ने दोनों की ओर देखा। उसके चेहरे पर संतोष था।उसे लगा, विज्ञान का मॉडल तो प्रदर्शनी में रखा जाएगा, लेकिन आज उन्होंने जीवन का एक अधिक जरूरी पाठ सीख लिया है।
जिम्मेदारी का असली अर्थ
कुछ दिनों बाद विद्यालय में एक और घटना हुई।दोपहर की छुट्टी के समय विद्यालय के बाहर सड़क पर एक बुजुर्ग महिला सब्जियों की टोकरी लेकर जा रही थीं। अचानक उनका पैर फिसल गया। टोकरी सड़क पर गिर गई और सब्जियाँ इधर-उधर बिखर गईं।
सड़क से गुजर रहे कुछ लोग रुककर देखने लगे। कुछ छात्राएँ भी वहाँ खड़ी हो गईं, लेकिन किसी ने आगे बढ़कर मदद नहीं की। कुछ लड़कियाँ हँसते हुए घटना का वीडियो बनाने लगीं।
अनन्या ने यह देखा तो तुरंत अपनी सहेली से कहा, “तुम जरा मेरी किताबें पकड़ो।”
वह सड़क पर पहुँची। उसने पहले बुजुर्ग महिला को उठने में मदद की, फिर उनकी बिखरी सब्जियाँ इकट्ठी करने लगी।
“बेटी, रहने दे। तुम स्कूल की छात्रा हो। तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएँगे,” महिला ने संकोच से कहा।
अनन्या ने उनके हाथ थामते हुए जवाब दिया, “कपड़े धुल जाएँगे, अम्मा। लेकिन अगर हम किसी की मदद करने से इसलिए पीछे हट जाएँ कि हमारे कपड़े गंदे हो जाएँगे, तो फिर हमारी पढ़ाई का क्या मतलब?”
उसने सड़क के किनारे खड़ी दूसरी छात्राओं से भी मदद करने को कहा।उसकी बात सुनकर दो छात्राएँ आगे आईं। फिर एक दुकानदार भी मदद करने लगा। कुछ ही मिनटों में सारी सब्जियाँ टोकरी में रख दी गईं।
अनन्या ने देखा कि महिला के घुटने में चोट लगी थी। वह उन्हें पास की दुकान पर बैठाकर पानी ले आई और विद्यालय के एक कर्मचारी की मदद से उनके घरवालों को सूचना दिलवाई।
महिला बार-बार उसे आशीर्वाद दे रही थीं।
“भगवान तुम्हें बहुत आगे बढ़ाए, बेटी।”
अनन्या ने मुस्कराकर कहा, “अम्मा, आपने मुझे आशीर्वाद दिया,यही बहुत है।”
अगले दिन कुछ छात्राएँ इस घटना की चर्चा कर रही थीं। एक ने कहा, “अनन्या को तो हर जगह मदद करने का बहाना चाहिए।”
दूसरी ने हँसते हुए कहा, “पता नहीं, इतनी समाजसेवा करके उसे क्या मिलता है!”
अनन्या ने उनकी बातें सुन लीं, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसे किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं थी। वह केवल इतना जानती थी कि जहाँ मदद की जरूरत हो, वहाँ अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए।
अधिकार और कर्तव्य
विद्यालय में नागरिक शास्त्र की कक्षा चल रही थी। अध्यापक ने विद्यार्थियों से प्रश्न पूछा, “हम अक्सर अपने अधिकारों की बात करते हैं। हमें अच्छे विद्यालय, अच्छी सड़कें, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित समाज चाहिए। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इन सबके लिए हमारी अपनी जिम्मेदारियाँ क्या हैं?”
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
एक छात्रा ने कहा, “सर, सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हमें ये सुविधाएँ दे।”
अध्यापक ने सहमति में सिर हिलाया।
“बिल्कुल। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारियाँ हैं। लेकिन क्या नागरिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?”
दूसरी छात्रा बोली, “हमें नियमों का पालन करना चाहिए।”
अध्यापक ने फिर पूछा, “और?”
अब भी ज्यादातर छात्राएँ चुप थीं।अनन्या ने हाथ उठाया।
“सर, मुझे लगता है कि नागरिक कर्तव्य केवल नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है। अगर हम सड़क पर कचरा नहीं फेंकते, जरूरतमंद की मदद करते हैं, किसी के साथ अन्याय होते देखकर उचित तरीके से आवाज उठाते हैं और विवाद होने पर उसे बढ़ाने के बजाय सुलझाने की कोशिश करते हैं, तो हम अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे होते हैं।”
अध्यापक ने उसे आगे बोलने का संकेत दिया।
अनन्या ने कहा, “हम पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी पाना चाहते हैं। यह जरूरी भी है। लेकिन अगर हमारी सफलता से केवल हमारा ही जीवन बेहतर होता है और हमारे आसपास के लोगों को कोई लाभ नहीं मिलता, तो क्या हमने अपनी शिक्षा का पूरा उपयोग किया? मुझे लगता है कि पढ़ाई हमें केवल कमाने के योग्य नहीं बनाती, बल्कि एक जिम्मेदार इंसान बनने की समझ भी देती है।”
अध्यापक कुछ क्षण उसे देखते रहे।
फिर बोले, “बहुत अच्छी बात कही। याद रखिए, नागरिक कर्तव्य का अर्थ दूसरों की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेना नहीं, बल्कि अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाना है। जहाँ किसी की मदद कर सकते हैं, वहाँ मदद करें। जहाँ अन्याय हो, वहाँ विवेकपूर्ण ढंग से आवाज उठाएँ। और जहाँ विवाद हो, वहाँ बिना पक्षपात के समाधान खोजने का प्रयास करें।”
उस दिन अनन्या की बात कई छात्राओं के मन में बैठ गई।
जब कर्तव्य की परीक्षा हुई
कुछ सप्ताह बाद विद्यालय में एक अप्रत्याशित घटना घटी।विद्यालय के मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मी ने एक छात्रा को देर से आने के कारण रोक दिया। छात्रा ने गुस्से में सुरक्षाकर्मी से बहस शुरू कर दी। देखते ही देखते वहाँ भीड़ जमा हो गई।
छात्रा कह रही थी कि सुरक्षाकर्मी जानबूझकर उसे परेशान कर रहा है। सुरक्षाकर्मी का कहना था कि वह विद्यालय के नियमों का पालन कर रहा है।कुछ छात्राएँ छात्रा के समर्थन में नारे लगाने लगीं। कुछ ने सुरक्षाकर्मी को अपमानित करना शुरू कर दिया।अनन्या भी वहाँ पहुँची।वह जानती थी कि विद्यालय के नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन किसी छात्रा की बात सुने बिना उसे गलत ठहराना भी उचित नहीं होगा।
उसने सबसे पहले अपनी सहपाठियों से कहा, “कृपया शोर मत कीजिए। हम सब मिलकर बात करेंगे तो समस्या का समाधान निकल सकता है।”
फिर उसने सुरक्षाकर्मी से विनम्रता से पूछा, “अंकल, क्या आप बता सकते हैं कि छात्रा को अंदर जाने से क्यों रोका गया है?”
सुरक्षाकर्मी ने बताया कि विद्यालय में देर से आने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। छात्रा बिना अनुमति के भीतर जाना चाहती थी।
अनन्या ने छात्रा से भी पूछा कि वह देर से क्यों आई थी।
उसने बताया कि रास्ते में बस खराब हो गई थी।
अनन्या ने कहा, “अगर तुम्हारे पास उचित कारण है, तो हमें अध्यापक को बताना चाहिए। लेकिन नियम तोड़ने के लिए झगड़ा करना ठीक नहीं है। दूसरी तरफ, तुम्हारी परेशानी को सुनना भी जरूरी है।”
वह छात्रा को लेकर कार्यालय पहुँची। वहाँ अध्यापक ने उसकी बात सुनी और आवश्यक औपचारिकता पूरी कर उसे कक्षा में जाने की अनुमति दे दी।मामला वहीं समाप्त हो गया।
सुरक्षाकर्मी ने अनन्या से कहा, “बेटी, आज तुमने मेरी भी इज्जत बचा ली और उस बच्ची की परेशानी भी समझ ली।”
अनन्या ने उत्तर दिया, “अंकल, इसमें इज्जत बचाने जैसी कोई बात नहीं है। आप अपना काम कर रहे थे और वह अपनी परेशानी बता रही थी। हमें बस एक-दूसरे की बात समझने की जरूरत थी।”
उस दिन उसने अपनी सहपाठियों को भी समझाया कि किसी विवाद में भीड़ बनकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना आसान है, लेकिन दोनों पक्षों को सुनकर समाधान निकालना अधिक जरूरी है।उसने यह भी स्पष्ट किया कि हर विवाद में बीच-बचाव करना उचित नहीं होता। यदि मामला गंभीर हो, किसी की सुरक्षा का प्रश्न हो या अपने स्तर पर समाधान संभव न हो, तो शिक्षकों, अभिभावकों या संबंधित अधिकारियों की सहायता लेनी चाहिए।
कर्तव्यबोध का अर्थ अपनी सीमाएँ भूल जाना नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी को समझदारी से निभाना है।
सफलता की नई परिभाषा
समय बीतता गया। अनन्या ने बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। उसे एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय में प्रवेश मिल गया। विद्यालय में उसके सम्मान में एक छोटा-सा कार्यक्रम आयोजित किया गया।
प्रधानाचार्या ने अपने संबोधन में कहा, “अनन्या ने हमें सिखाया है कि एक अच्छा विद्यार्थी केवल वह नहीं होता जो परीक्षा में अच्छे अंक लाए। अच्छा विद्यार्थी वह भी होता है जो अपने व्यवहार से दूसरों को बेहतर बनने की प्रेरणा दे।”
उन्होंने आगे कहा, “अनन्या ने कभी अपने कामों का प्रचार नहीं किया। उसने कभी यह नहीं जताया कि वह दूसरों से बेहतर है। उसने अपनी जिम्मेदारियों को समझा और जहाँ संभव हुआ, वहाँ अपना योगदान दिया। यही उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है।”
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
अनन्या मंच पर पहुँची तो उसकी आँखों में खुशी थी। उसने माइक संभाला और कहा, “मैंने ऐसा कुछ नहीं किया, जो हर विद्यार्थी नहीं कर सकता। मैंने बस इतना समझा कि हमारे आस-पास जो कुछ होता है, उससे हमारा भी संबंध है। अगर विद्यालय गंदा है, तो उसे साफ रखने में मेरी भी भूमिका है। अगर दो लोगों के बीच विवाद है, तो उसे सुलझाने की कोशिश की जा सकती है। अगर कोई जरूरतमंद है, तो अपनी क्षमता के अनुसार उसकी मदद की जा सकती है।”
वह कुछ क्षण रुकी, फिर बोली, “हम अक्सर कहते हैं कि देश को बदलना चाहिए। लेकिन देश केवल सरकारों से नहीं बनता। देश हम सब से बनता है। अगर हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझने लगें, तो बहुत-सी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं।”
उसने अपनी बात समाप्त की और मंच से उतर आई।कार्यक्रम खत्म होने के बाद उसकी सहेली रिया उसके पास आई। वही रिया, जो कभी मैदान में पड़े कागज उठाने पर उसका मजाक उड़ाया करती थी।
रिया ने कहा, “अनन्या, मैं तुम्हें पहले ठीक से समझ नहीं पाई थी। मुझे लगता था कि तुम बेवजह दूसरों के मामलों में पड़ती हो। लेकिन अब समझ में आता है कि तुम किसी पर एहसान नहीं करतीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी निभाती हो।”
अनन्या ने हँसते हुए कहा, “हम सभी सीख रहे हैं, रिया। मैं भी सीख रही हूँ। जरूरी यह नहीं कि हमसे कभी गलती न हो। जरूरी यह है कि हम अपनी गलती पहचानें और खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करें।”
दोनों सहेलियाँ गले मिलीं।
अगले दिन अनन्या महाविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए रवाना हो गई। उसके सामने जीवन का एक नया अध्याय था। नई जगह, नए लोग, नई चुनौतियाँ और नए अवसर।लेकिन वह अपने साथ एक बात लेकर जा रही थी,जीवन में आगे बढ़ने का अर्थ केवल स्वयं सफल होना नहीं है। अपनी सफलता के साथ दूसरों के जीवन में भी कुछ अच्छा जोड़ पाना अधिक महत्वपूर्ण है।
वह जानती थी कि रास्ते में उसे ऐसे लोग भी मिलेंगे जो उसके विचारों से सहमत नहीं होंगे। कुछ उसकी मदद करने की आदत को कमजोरी समझेंगे, तो कुछ उसकी विनम्रता को साधारण स्वभाव मानकर अनदेखा कर देंगे।लेकिन वह अपने रास्ते पर चलती रहेगी।क्योंकि उसके लिए कर्तव्य कोई ऐसा बोझ नहीं था, जिसे अवसर मिलने पर उतारकर रख दिया जाए। वह उसके चरित्र का हिस्सा बन चुका था।
उसे विश्वास था कि इंसान की ऊँचाई इस बात से तय नहीं होती कि वह कितने लोगों से आगे निकल गया, बल्कि इससे तय होती है कि आगे बढ़ते हुए उसने कितने लोगों का हाथ थामा।सच्चा कर्तव्यबोध वही है, जो इंसान को अधिकारों के प्रति सजग, जिम्मेदारियों के प्रति ईमानदार, जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील और अपने व्यवहार में विनम्र बनाता है।

-रमेश कुमार “रिपु”
पाठक की बगिया के पास
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