बृज गोयल की कहानी रंगीन दीवारें’ दिखावे, झूठी शान और वास्तविक जीवन-मूल्यों के बीच के अंतर को उजागर करने वाली कहानी है। दूसरों की बाहरी चमक-दमक देखकर स्वयं को कमतर नहीं समझना चाहिए। रंगीन दीवारों के पीछे का सच हमेशा उतना सुंदर नहीं होता, जितना बाहर से दिखाई देता है। असली सुंदरता जीवन के मूल्यों और इंसान के कर्मों में होती है।
रंगीन दीवारें \ कहानी
अभी हमारा ट्रांसफर हुआ है। सामान भी सब अस्त व्यस्त पड़ा है। आते ही बच्चों के एडमिशन के चक्कर में, फिर किताब कापी की तैयारी, फिर सबसे पहले बच्चों का कमरा सेट करना था ताकि उनकी पढ़ाई चलती रहे। बाकी घर मैं धीरे धीरे संभाल रही थी। आठ बजते बजते राकेश अस्पताल चले गए और बच्चे स्कूल चले गए।

मैं मोती के साथ सामान खोलकर लगाने लगी। कुछ ही काम समेट पायी थी कि बैल बज गई। देख, मोती कौन है, कहकर मैं सोफे पर कवर डालने लगी।
‘- क्या तुम्हारी मेमसाहब घर में हैं?’
– ‘जी बीबीजी, आ जाइये।‘ मैंने पलटकर देखा। द्वार पर एक स्मार्ट लेडी खड़ी थी, मैंने हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया। जवाब में वह मुस्कुरायी और बताया कि मैं आपके पड़ोस के फ्लैट में रहती हूँ, मेरे पति मिस्टर मल्होत्रा हैं।
‘ओहो! बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर, आपने अपना कीमती समय हमारे लिए निकाला, आइए बैठते हैं।‘
– ‘अरे, मैं तो कई दिनों से आने की सोच रही थी। लेकिन आपकी व्यस्तता का सोच, क्या आप सर्विस करती है?’
– ‘अभी तो नहीं करती क्योंकि बच्चे छोटे हैं, उन्हें भी देखना जरूरी है।‘
– ‘अच्छा तो आपके बच्चे यहीं पढ़ते हैं? उन्होंने कुछ बुरा सा मुँह बनाया।‘
‘जी, यहाँ जो सेंट थॉमस स्कूल है, वहीं एडमिशन दिलाया है। सुनते हैं अच्छा स्कूल है। इसका रिज़ल्ट भी अच्छा रहता है। मैं स्वयं जाकर स्टाफ से मिली। सब बहुत सक्रिय हैं। बच्चों पर अनुशासन भी रखते है। फिर मैं स्वयं ही बच्चों का होमवर्क कराती हूँ।’
– ‘तो आप बहुत व्यस्त रहती हैं। मैंने सोचा था कि गप्पें करने और घूमने फिरने को अच्छी कंपनी मिलेगी। लेकिन आप तो घर व बच्चों के पचड़े में ही लगी रहती होंगी।‘
– ‘नहीं घूमने फिरने का समय भी पर्याप्त मिल जाता है। जहाँ आप कहेंगी जरूर चलुंगी। मुझे भी आउटिंग का बहुत शौक है।’
उनके मुख कमल पर कुछ रौनक सी आयी और उन्होंने विस्तार से बताया कि वह कहाँ कहाँ जा चुकी हैं। फिर अपने परिवार के बारे में बताने लगी। मेरे नाना जी उद्योगपति हैं, पापा डॉक्टर हैं। हमारे यहाँ के सभी बच्चे नैनीताल, रानी खेत व दून स्कूल में पढ़ते हैं। स्वयं मेरी शिक्षा भी नैनीताल में हुई है। घर पर पढ़ाई की सिरदर्दी नहीं लेती। बच्चों को बाहर पढ़ाना स्टेटस सिम्बल भी तो है।
वह अपने बड़प्पन की डींगें हांक रही थी और मुझे अपना समय बर्बाद होते दिख रहा था क्योंकि इस बीच उन्होंने अपने किसी की विशेष योग्यता का बखान नहीं किया था।
मैंने विषय को बदलते हुए कहा- ‘भावीजी जी क्या लेंगी? ठंडा या गर्म?’
– ‘ठंडा सूट नहीं करता, चाय मैं पीती नहीं हूँ।’ उन्होंने कहा।
– ‘कॉफी तो चलेगी?’ मैंने कहा।
-‘ हाँ, लेकिन मीठा कम।’
– ‘हाँ भई चीनी तो नॉन नॉन स्टैंडर्ड है ना,’ मैंने चुटकी ली।
– ‘मोती दो कप कॉफी बनाना, साथ में बिस्किट भी।‘ मैंने बैठे बैठे मोती को आवाज दी। मोती कॉफी रखकर चला गया। मिसेज मल्होत्रा ने चुस्की लेते हुए कहा- ‘भाभी जी अब तो शीशे के मग आ रहे हैं, आपने नहीं लिए? अभी तक ये पुराने ही इस्तेमाल कर रही हैं।‘
जी में आया कह दूँ क्या इन्हें फेंक दूँ… पर शिष्टाचारवश चुप रही। स्वयं पर काबू पाते हुए बोली-‘नित नई चीजें आती हैं बाजार में, जब ये अच्छे हैं तो और लाना में फिजूलखर्ची समझती हूँ।‘
– ‘नहीं भाभी जी पुरानी चीजों से दिल भर जाता है। मुझे तो हर नई चीज़ का बहुत शौक है। देखिये यह साड़ी अभी नई चली है, बारह सौ की है।‘
– ‘होगी मैंने गर्दन हिलाई। मेरा तो ध्यान ही इस तरफ़ गया ही नहीं था। इसी तरह की दो चार और बातें करके वह चली गई। अब मैं आराम के मूड में आ गई थी। मन और दिमाग दोनों थक से गए थे।
एक दिन दोपहर में, मैं कपड़े धो रही थी। मोती बाजार गया था कि इतने में मिसेज मल्होत्रा आकर धमक गई और आते ही बोली- ‘अरे भाभी जी आप स्वयं कपड़े धोती हैं। मैं तो एक रुमाल भी नहीं धो सकती। जिस दिन कपड़े वाली नहीं आती, कपड़े पड़े ही रहते हैं।‘
– ‘राकेश और बच्चों के जाने के बाद समय बच जाता है, तो उसका सदुपयोग कर लेती हूँ। कपड़े वाली कपड़ों में साबुन भरा छोड़ जाती है, जिससे सफेद कपड़े पीले पड़ जाते हैं और रंगीन कपड़ों में धब्बे हो जाते हैं। फिर मेरे पास समय का अभाव भी नहीं है।’
– ‘वे मुँह बनाकर नजाकत से बोलीं – ‘भाभी जी, वह चाहें जैसे भी धोए।‘
– ‘खराब हो जाएं तो और ले लो।‘ मन कुछ खीझ सा गया। लगा कह दूँ, यह चतुराई नहीं है, फिर मैं तुम से सलाह नहीं मांग रही हूँ। लेकिन मन की बात मन तक ही सीमित रही।
एक दिन शाम के समय वह अपनी भारी भरकम बहन के साथ आ गई। उन्हें देखकर मेरा माथा कुछ गर्म सा हो गया। पर तभी लगा कहीं जा रही होंगी। बहन से मिलाने आ गयी हैं। लेकिन नहीं, वे तो जमने ही आई थीं। शाम को नाश्ते का समय था, सो मोती से पकौड़ा तलवा लिए, कॉफी के साथ। इसी बीच उन्होंने मुझे समझा दिया कि फैशन के हिसाब से मैं दस साल पीछे हूँ। मेरे बेड पर पड़ी जयपुरी चादर देखकर बोलीं। आप ये चादरें बिछाती हैं अब तो बुटीक में बनी चादरें ही सब बिछाते हैं। मैं तो सब चीजें बुटीक से ही लेती हूँ। देखो यह सूट अभी लिया है। दीदी ने ये जो साड़ी पहनी है बाइस सौ की है।’
– ‘होगी।’ मैंने कोई ध्यान नहीं दिया।
एक दिन राकेश बाहर गए थे। बच्चे भी नहीं है। सो इन फुर्सत के पलों में मुझे मिसेज मल्होत्रा की याद आई। जब वह आती है तो घर आने का निमंत्रण दे जाती थी। सो झट तैयार हो मैंने मोती को आवाज दी- ‘देख, मोती मैं मल्होत्रा साहब के यहां जा रही हूँ, तू भी कहीं जाकर घूम आ। मैं इत्मीनान से बैठ कर आउंगी।’ मैं पहुंची तो मिसेज मल्होत्रा बाथरूम में थी। बाई ने दरवाजा खोलकर बैठने को कहा। मैंने स्लीपर पायदान पर ही उतार दिए क्योंकि कमरे से बहुत अच्छा कालीन बिछा था। मैं जैसे ही सोफे के पास पहुंची कि पैर चिपकने लगा, शायद कुछ पड़ा था, मैं दूसरी तरफ बैठ गई, इतने में वह नहा कर आ गई और हंसकर बोली- ‘आज आपने हमारे लिए समय निकाल ही लिया।’
– हाँ, आज सारी कसर पूरी कर दुंगी, आप आराम से कपड़े बदलकर आ जाइए।
आप भी अंदर आ जाइये मैं कपड़े बदल लुंगी। उनके बेडरूम में दो चेयर पड़ी थी। वहीं बैठने को कह स्वयं एलमिरा में घुस गई। उनके बेड पर लटकी गोल मच्छरदानी मुझे बरबस अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। तभी देखा बेड पर बेतरतीब लेकिन कीमती चादर, उस पर बना सुगढ़ सा मोर कुहकने को तैयार बैठा था। लेकिन बेचारे आधे पर गीला तौलिया पड़ा था। किवाड़ पर उल्टा सीधा लटका नाइटसूट उनकी लापरवाही की कहानी दोहरा रहा था।
इतने में मिसेस मल्होत्रा प्रकट हो गयी। आते ही बोली- ‘भाभी जी कैसी कॉफी चलेगी ? गर्म या ठंडी?’ – ‘अभी कुछ नहीं , बस गप्पे चलेंगी।’
– ‘अच्छा तो चलिये ड्राइंग रूम में बैठते हैं। ड्रॉइंगरूम में पहुँचकर मैंने पूछा- ‘अगर मैं नहीं आती तो इस समय का क्या उपयोग करतीं?’
– ‘कहीं घूमने चली जाती या फ़िल्म देखती या फिर सो जाती। अपनी तो बस यही दिनचर्या है।’ मैंने सुझाव दिया- ‘आपके पास तो समय है, आप भी सरला खत्री या रमा महेश्वरी या सुगंधा गोयल की तरह कोई भी सोशल वर्क करके अपने समय का सदुपयोग कर सकती हैं।
– ‘सरला कौनसा सोशल वर्क करती हैं? सिलाई कढ़ाई के नाम पर कमाई करती है और वही हाल रमा का है बच्चों को पढ़ाने के नाम पर कमाई का धंधा चला रखा है।’ उनकी बात सुनकर मुझे हँसी आ गई, मैंने उन्हें याद दिलाया… देखो-
– ‘उस दिन जब ऑनेस्ट क्लब में चिल्ड्रेन वार्ड बनवाने का प्रस्ताव डॉ मलिक ने रखा था तो सबसे पहले सरला जी ने ही 5000/ का चैक काट कर दिया था। और फिर देखते देखते चालीस हजार रुपये जमा हो गए थे और जब अपने आकांक्षा क्लब के चपरासी रामखिलावन की पत्नी को कैंसर के ऑपरेशन के लिए डॉक्टर ने 8000/ का खर्च बताया था, जिसे सुनकर वह घबरा गया था। तो रमा जी ने तुरंत आगे बढ़कर उसे ढाढ़स बंधाया था। फिर मीटिंग में यह बात रख कर ₹200/ दूध, फल के लिए क्लब से ही बंधवा दिए थे और स्वयं ने चार हजार रुपए का चैक तुरंत दिया था। बाकी चार हजार सब सदस्यों ने मिलकर दिये थे। जिससे चमेली की जान बच गई और चार बच्चे भी वीरान होने से बच गए थे।’
मेरी बात सुनकर वह बोलीं- ‘मेरा भी आगे पढाई करने का इरादा था, मगर बहुत ढूंढने पर भी बी ए की अंक तालिका नहीं मिली। मम्मी पापा को भी लिखा, वहाँ भी नहीं मिली। अब यूनिवर्सिटी से निकलवाने में बहुत परेशानी होगी, पर मंगवाउंगी जरूर।’
उनके मन की बेचैनी देखकर मुझे लगा कि उनका जो काल्पनिक रूप मेरे मन में बस गया था और कई बार मैं उसे लेकर एक हीन भावना की शिकार होती जा रही थी, एक कुंठा सी पालने लगी थी । आज सब कुछ इतने करीब से देखकर लगा- ‘जैसे मैंने रंगीन दीवारें देखी हों। मैंने मुक्ति की सांस ली… जैसे कुंठाओं की जड़ों को पनपने से पहले ही उखाड़ फेंका हो।

बृज गोयल
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