डॉ. सेवाराम त्रिपाठी के लेख का मूल संदेश यह है कि आज समाज में मानवीय मूल्यों, भाईचारे, समानता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के सामने अनेक चुनौतियाँ खड़ी हैं। सत्ता और समाज में बढ़ती अवसरवादिता, सिद्धांतों और व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी तथा गंभीर सवालों से बचने की प्रवृत्ति समस्याओं का समाधान नहीं होने देती।
लेखन, लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों के सामने खड़े अनगिनत सवाल\ विशेष लेख
सामाजिक और मानवीय सरोकारों के बल पर भारतीय जीवन मूल्यों में रची बसी मनुष्यता, भाईचारा, शांति – सद्भाव और सौहार्द ने, सबको एक साथ मिलकर काम करने और साझापन के साथ ज़िंदगी जीने की प्रेरणा दी है। उसने सामाजिक मूल्यों को बहुत ताक़त दी है। हमारे सरोकारों उम्मीदों,लेखन और समग्र कलात्मकता ने हमें ठीक ढंग से जीना सिखाया है। सद और असद वृत्तियां हमेशा रही हैं। सदवृत्तियों का विशाल भंडार है हमारे पास। पुरा काल में भी खल पात्र हमारे सादे जीवन को अत्यंत कष्टकर बना देते थे । सार्वजनिकता को ख़त्म करने की कोशिश करते थे। वे हमारी अस्मिता और सांस्कृतिक मूल्यों को निरंतर खोखला साबित करने में जुटे रहते थे। आज तो सामूहिक तौर पर खल वंदना ही चल रही है। खलत्व के आंधी तूफ़ान बह रहे हैं। नफ़रत के तूफ़ान हमारे भाईचारे और सौहार्द को खोखला कर रहे हैं.मानवीय मूल्यों की गरिमा ख़त्म की जा रही है.उसकी प्रतिष्ठा कायम करने के पक्ष में काम किए जा रहे हैं? पूर्व में उन्हें सामाजिक शक्ति के रूप में उभरने का मौका कभी नहीं मिला?यदि उभार हुआ भी तो सामाजिक – सांस्कृतिक संरचना ने उसे साहसहीन बनाने और तिरस्कृत करने में कहीं कोई कोताही नहीं बरती। आज ऐसा नहीं है। इसके बावजूद और कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें छेंकने के लिए संघर्ष जारी है। सम्भवतः इसीलिए हम पहले से ज्यादा बेहतर समाज बनाए जाने का प्रयत्न करते रहे? हो सकता हैपूर्व में हमसे कोई भूल हुई हो और अब जो हो रहा है वह तो अत्यंत घृणास्पद व भद्दे तरीके से गाजे बाजे के साथ संपन्न हो रहा है।
एक दिन एक मित्र से बात हो रही थी। चिंता इस मामले में जताई जा रही थी कि अब डाकू जंगलों – पहाड़ों की हदबंदियों से बाहर आ गए हैं और अत्यंत संपन्न इलाकों में और राजनीतिक – सामाजिक – सांस्कृतिक और धार्मिक फिज़ाओं में विद्यमान हैं? पूर्व में शौकिया डाकू बन जाने के इक्का- दुक्का उदाहरण तो हैं? लेकिन थोक में नहीं? इस दौर में राष्ट्रभक्ति के कोहराम में सब ख़राब चीज़ों और तानाशाही मनोविज्ञान की राह पर सब अच्छे मूल्यों की चटनी पीसी जा रही है। देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटें जा रहे हैं। इसी क्रम में नक्सली समस्या पर विचार विमर्श किया जा रहा था। दरअसल हम इतनी विषमताओं में हैं कि लोगों को न्याय नहीं मिलता? नक्सली आंदोलन के मूल रूपों और उसकी असलियत को चेतना को रेखांकित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हम उसकी असलियत और औकात को उसकी जड़ों को देखना ही नहीं चाहते बल्कि उसकी पत्तियां छांटने में रमे हैं। यह दौर ऐसा है कि न्याय -व्यवस्था वाले भी कई प्रकार की संकीर्णताओं में गाड़े जा रहे हैं? वे भी प्रश्नांकन कर रहे हैं फिर सामान्य आदमियों की तो बात ही छोड़िए? बड़े पैमाने पर दल बदल हो रहे हैं। रिसॉर्ट लीला जारी है और उसे पुष्ट करते हुए उसे असरदार तरीके से मान्यता प्रदान कराई जा रही। वे चेहरे न तो शर्माते न पछताते बल्कि राष्ट्रीय शर्मिंदगी को ही श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे हैं। और कायदे से फ़ोटो शूट करने में जुटे हैं? सरकारें सज संवर रही हैं? राष्ट्रीय शर्म को सफलता के दायरे में सिद्ध किया जा रहा है।
मुझे लगता है कि हमारा समूचा जीवन-समाज और राजनीति प्रश्न के अनंत आकाश में उड़ रहे हैं । प्रश्न ज्यादा हैं उनके उत्तर बेहद गंभीर और ज़रूरी होते हुए भी लगभग न के बराबर हैं।जो भी मुद्दे उठाए जाते हैं, सोच समझकर ही उठाए जाते हैं। आज आवश्यकता है कि उनके तर्कसंगतऔर ज़रूरी हल सुझाए जाएं लेकिन बेहद गंभीरता से। हमें हर हाल में मुद्दों को कूटना नहीं चाहिए। लेकिन मुद्दे जमकर कूटे जा रहे हैं। उन्हें न तो पीठ दिखानी चाहिए और न अवहेलना। प्रश्न ज़िंदगी की हक़ीक़त और जरूरियात से आते हैं। इसलिए यदि किसी भी तरह की गफलत या मनमानी किसी के द्वारा की जाती है तो उसके भयावह परिणाम भी हो सकते हैं? किसी भी कीमत में दोगलापन नहीं किया जाना चाहिए। जब कि जहां तक आपकी नज़र जाएगी। यही दिखेगा।यदि ऐसा करते हैं तो इसके असर अच्छे नहीं होते ? देखा और अनुभव किया जा रहा है कि हमारे सिद्धांत और व्यवहार में एक लंबी दूरी आ रही है । कहा कुछ जा रहा है और ठीक इसके उलट- पलट किया जा रहा है।और इस मानसिक प्रवृत्ति से पर्याप्त मात्रा में झोल भी आ रहे हैं।मुद्दे झूलते झालते रहें और उसका कोई निष्कर्ष न निकले। यह जिम्मेदारों के द्वारा प्रयास हो रहे हैं। सत्ता व्यवस्था ही नहीं बल्कि शक्तिशाली समूह ऐसा बार – बार कर रहे हैं? यह कोई अच्छी बात नहीं है? मुद्दे मात्र मुद्दों के लिए नहीं रखे जाएं। उनका सक्षम तरीके से निराकरण भी हो। यह भी हो कि सोचें उनकी असलियत से क्या व्यापक परिवर्तन हो सकते हैं ? यह भी सोचा – समझा और विचारा जाए तो बेहतर। मुद्दों को हुद्द्दों की तरह न देखा जाए।
यह बात लेखकों, कलाकारों और चिंतकों की ओर भी जाती है। शिक्षक, लेखक को आदर्श माना जाता रहा है लेकिन जब वही चहले में फंसा हो तो किससे उम्मीद की जा सकती है।हम लेखक हैं। हमें सरकारों की तरह मुद्दे पीटने नहीं चाहिए? उसकी तर्कसंगतता और व्यावहारिकता को हर हाल में प्राप्त करने की अहम कोशिश करनी चाहिए। जैसे सरकारें अपनी बातों को बार – बार रेलेऔर धुंआधार तरीके से पेले जा रही हैं? कुछ वैसा नहीं हो तो किन्हीं वास्तविकताओं तक पहुंच मार्ग बन सकता है? लेकिन यदि यह समझ लिया जाए कि आख़िर में इन्हें टालना है तो यही हाल होगा? ज़िम्मेदार टालने में लगे हैं और ऊपर से लीपापोती करते हुए पुन्नेठी झाड़ रहे हैं?
प्रश्न अनंत हैं। उन्हें हल करने वाले प्रश्न पूछने वालों को सावधान रहने को कहते हैं। इस प्रश्न में कई तरह की चीज़ें छिपी हैं? कैसे और किस तरह?मुझे लगता है कि समूचे लेखन को व्यंग्य को हमें किसी भी तरह असंभव और मनोवांछित खाते में नहीं रखना चाहिए ? यह इलाका मन की उड़ान का किसी भी सूरत में नहीं है।यह एक तरह की अनावश्यक , हास्यास्पद मांग भी है और एक विशेष किस्म का सनसनाता हुआ यूटोपिया भी है? हमारी समूची दुनिया के विभिन्न अनुशासनों, कलाओं, विज्ञानों एवं सामाजिक- सांस्कृतिक एवं अन्य तमाम रूपों का इतना बड़ा संघर्ष, चिंतन- मनन सामाजिक बराबरी और मानवीय सरोकारों को चुस्त-दुरुस्त करने का ही तो संघर्ष है। यह अंधेरे से उजाले के लिए ही तो संघर्ष है- जिसे पूर्व में तमसो मा ज्योतिर्गमय कहा गया था या उसे असतो मा सद्गमय कहा गया था।
क्या हमारे लिखने पढ़ने से पहले किसी भी तरह ऐसा कोई वृहत्तर समाज बनाया जा सकता है, जिसमें इस तरह के प्रश्न कभी भी न रहे हों? हां ,यह एक यूटोपिया या मनगढ़ंत बात तो हो सकती है।एक आदर्श कल्पना तो हो सकती है लेकिन इसकी कोई ठोस या यथार्थ ज़मीन किसी भी तरह संभव होती हुई सी नहीं दिखती है?लेखन या अन्य कला माध्यम मात्र कल्पनाओं की चीज़ नहीं हुआ करते? उनकी पुख्ता ज़मीन भी होती है। उनका एक अति महत्वपूर्ण विस्तृत आकाश मंडल भी होता है।यह सोच एक विशेष प्रकार का दुस्साहस और चमत्कारी आकांक्षा के अलावा और क्या हो सकता है? इस विषय को विचार विमर्श के लिए प्रस्तुत करते वक्त इसके अन्य पहलुओं को क्या सोचा समझा गया है? इसकी वास्तविक दुनिया के अंदरूनी इलाकों को देखा भाला और पहचाना गया है? यह कोई गप्प तो है ही नहीं? लेखक और कलाकार अपने शब्दों कलाओं, चिंताओं और प्रस्तुतियों के लिए हमेशा जवाबदेह होते हैं? या अनिवार्यता में उन्हें होना चाहिए? लेखन कोई जादू टोना नहीं है और वह सत्ता व्यवस्था की तरह लोकप्रियता का डिठौना लगाकर बरी नहीं हो सकता? लेखन राजनीतिज्ञों की तरह कोई झांसा- पट्टी की दुनिया भी नहीं हो सकता?
इस विषय के दो पहलू हैं?क्या कोई ऐसी सामाजिक सरोकारों वाली सामाजिक इकाई रही होगी जहां ऐसा होता रहा है? यदि मान भी लिया जाय कि ऐसा होता भी रहा है तो क्या इसे किसी भी सूरत में अभिव्यक्त किया जाना किसी भी तरह संभव है? हमारे सोच और चिंतन का दायरा मात्र हवाई कल्पनाओं के किले बांधने की सीमा में नहीं आता और न हमें कोई वोट कबाड़ना है। न लेखकों को महा झूठ का वितान सजाना है? इसलिए लेखक कलाकार किसी भी कीमत में अगड़म- बगड़म दलीलें पेश नहीं कर सकता। यहां मैं उन होशियारचंदों की बात नहीं कर रहा हूं जो पुरस्कार कबाड़ने में, किताबें प्रकाशित करवाने में, या चमक- दमक में तल्लीन हैं और उसी के लिए मरे जा रहे हैं। वे हर तरह की प्रसिद्धि प्राप्त करने के पजामें में घुस कर मनोवांछित हो रहे हैं। और न जाने कहां कहां घुन घुने की तरह बज रहे हैं। उन्हें किसी तरह की गिरावट से कोई परहेज नहीं। वे लेखन की ज़मीन, असलियत और औकात को अंगूठा दिखा रहे हैं? वे हर चीज़ को प्राप्ति के गणित से साधते हैं? जो किसी भी सूरत में संभव ही नहीं है? उसे भी वे ग्रहण करने में परमानंद का अनुभव करते सतत देखे जाते हैं?
डॉ. सेवाराम त्रिपाठी
रीवा,मध्यप्रदेश
मो.7987921206



