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संदीप पांडे “शिष्य की अविवाह कहानी प्रेम, स्वतंत्रता और सामाजिक मान्यताओं से परे जीवन जीने के विचार को प्रस्तुत करती है। प्रेम का अर्थ अधिकार जमाना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की स्वतंत्रता, विचारों और भावनाओं का सम्मान करना है। समाज की परंपराओं से अलग अपना रास्ता चुनने के लिए साहस और परिपक्वता आवश्यक है।

      अविवाह\ कहानी

बारह वर्ष की वय से ही उसने अपने पिता की सब्जी की दुकान पर बैठना शुरू कर दिया था। छठी कक्षा में जब दो बार फेल हो गया तो माता-पिता ने मान लिया का पढ़ना-लिखना प्रदीप के बस का नही है। सब्जी के काम मे अतिरिक्त हाथ की सदा आवश्यकता रहती ही है इसलिए उन्होने प्रदीप को सब्जी का काम सिखाना शूरू कर दिया। बरसो से उसके पिता एक ठेला सब्जी से परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे जिसमे उसकी मां भी कभी-कभी हाथ बंटाती थी। अब प्रदीप के रोज मदद करने से मां का समय और ऊर्जा अन्य कार्यो के लिए बचने लगी।

प्रदीप बहुत जल्दी सारे काम सीख लिए। कंहा से लेना, कितनी लेना, दाम कितने रखना , सब कार्य सीखने के लिए कुछ महीने ही लगे। सब्जी बेचने के लिए जिस वाचालता की आवश्यकता थी वो उसेमें थी जो उसे अपने पिता से बेहतर विक्रेता बनाती जा रही थी। ग्राहक की संख्या के साथ आय में भी इजाफा होता जा रहा था। एक साल बाद ही उसने अपने पिता को एक और ठेला लगाने के लिए राजी कर लिया था। उसके लिए उसने थोड़ी दूरी पर एक नया ठिकाना ढूंढ लिया था। वंहा पहले से ही एक सब्जी वाली अपने खेत से लाकर सड़क किनारे दुकान लगा कर ताजी सब्जी बेचती थी और तीन – चार घंटे मे बेचकर चली जाती थी। वंहा पर जमने मे प्रदीप को कुछ महीनो का समय लगा।

कुछ समय तो वो सब्जी वाली के चले जाने के बाद ही अपना ठेला लगाता पर अक्सर शाम तक सारी सब्ज़ियां बिक नही पाती। फिर अपनी मोहक बातो से उसने ग्राहको और उस सब्जी वाली से अपनेपन का रिश्ता गांठ लिया। उसके पिता उसे उस स्थान को छोड़कर कही और ठेला लगाने की सलाह देते पर वो अपने निर्णय पर डटा रहा। धीरे-धीरे कमाई अच्छी होने लगी तो उसका वो ठिकाना भी स्थाई हो गया। अब आसपास के दुकानदार और बहुत सारे ग्राहक उसके मित्र हो गए थे। सब्जी वाली उससे उम्र में करीब दस वर्ष बड़ी होगी पर वो अपनी सीमित आय मे भी प्रसन्न रहती थी। साथ ही गायो की सेवा और कम दाम मे सौदा देने मे अक्सर उदार दिखती। प्रदीप उससे आश्चर्य से पूछता कि वो ऐसा क्यों करती है तो वो हंसकर टालते हुए कहती कि कभी मेरे घर आओगे तो तसल्ली से बताऊंगी। वो उससे हंसी ठिठोली खुल कर करने लग गया था जिसमें वो भी आनंदित होती। प्रदीप का बेचान साल भर में दुगना हो गया था पर सब्जी वाली अभी भी लगभग वैसे ही अपनी दिनचर्या मे खुश दिखती।

एक दिन सब्जी वाली अपनी दुकान लगा कर बैठी थी कि दो बैल अचानक लडते हुए आए और सब्जी वाली को अपनी चपेट मे लेकर घायल कर गए। प्रदीप पास ही खड़ा था। उसने दौड़कर सब्जी वाली को संभाला। उसका एक हाथ तेजी से मुडने के कारण टूट गया था। प्रदीप उसे तुरंत सब छोड़कर आटो में बैठाकर नजदीक के अस्पताल ले गया। प्लास्टर चढ़ाने और कुछ दवा देने के बाद वंहा से छुट्टी मिल गई तो प्रदीप जिद करके उसे छोड़ने घर तक गया। घर क्या एक छोटी सी झोपड़ी थी जिसमे वो अकेली रहती थी। उसी के आगे सब्जी की कुछ क्यारीया बनी थी जिसमे टमाटर, मिर्ची, लौकी, टिंडे, तौरई, बैंगन आदि लगे थे। घर के भीतर बहुत कम जरूरी सामान के अलावा कुछ ना था। सब्जी वाली बिस्तर पर लेट गई और प्रदीप एक कुर्सी उसके नजदीक सरका कर बैठ गया। “तुम यंहा अकेली रहती हो” बैठते ही उसने पूछा। “हां दो साल से ज्यादा हो गए ऐसे अकेले रहते” उसने गहरी सांस छोड़ते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कंहा। “पर तुम्हारे घरवाले?” प्रदीप की वाणी में घोर आश्चर्य था। “चार साल पहले एक लडके के साथ भागकर शादी कर ली थी। मेरे घर वालो ने तो मुझसे नाराजगी में दूरी बना ही ली थी, उसके घरवालो ने भी यह जमीन देकर हमें अलग कर दिया था” शांत स्वर में उसने जवाब दिया। “तो अब वो लड़का कंहा है?”

प्रदीप का स्वभाविक प्रश्न उसके मुख से बाहर आया। बिस्तर से उठने की कोशिश करते हुए वो बोली, “दो साल पूर्व खेत में काम करते एक सांप ने उसे काट लिया और इलाज तक पंहुचने से पहले ही उसकी मौत हो गई। ” वो उठकर कोने मे बनी रसोई की तरफ बढ़ने लगी तो प्रदीप ने कहा “क्या चाहिए मुझे बताओ ?” “तुम्हे गुडहल के फूल की चाय पिलाती हूं, तुम बाहर से ताजे चार फूल तोड़ लाओ” प्रदीप बाहर लगे पेड से चार ताजे लाल फूल लेके आया तब तक उसने पानी गरम करने रख दिया था। फूल को धोकर गरम पानी मे थोड़ी देर पकाने के बाद गिलास मे छानकर थोड़ा नींबू और शहद मिलाकर प्रदीप की ओर बढ़ा दिया। पहला घूंट पीते ही प्रदीप आनंदित हो गया। वो पहली बार ही यह चाय पी रहा था।

अपनी चाय पीते हुए सब्जी वाली फिर बताने लगी, ” पति के जाने के बाद से अकेले ही जीवन कांट रही हूं पर किसी के सामने हाथ नही फैलाती” “पर सबकुछ अकेले संभालने के बावजूद तुम हमेशा प्रसन्न दिखती हो, कोई शिकायत नही जीवन से? ” प्रदीप ने संजीदा होकर पूछा। “शिकायत कैसी? अपने लिए निर्णय के परिणाम मे अन्य को दोष तो नही दे सकते। अब जैसा भी है जीवन अच्छा कट लहा है। जरूरत को सीमित रखा जाए जीवन आसान लगने लगता है। ” उसके विचार प्रदीप को बहुत प्रभावित कर रहे थे, वो बोला ” तुम आज पूरा आराम करो कल सुबह तुम्हारी सब्जी तोडने मे मदद के लिए मे आ जाऊंगा, और खाना भी बनवा के ले आऊंगा। ” ” नहीं खाना मत लाना मै खाली बैठे क्या करूंगी? हां सब्जी तुड़वाने में मदद करने आओगे तो मुझे खुशी होगी। “दो आत्मीय मुस्कान ने एक दूसरे को विदा दी। अगले पंद्रह दिन तक प्रदीप रोज सुबह जल्दी सब्जी वाली के घर पंहुच जाता और उसके काम मे मदद कराता और फिर उसे उसके स्थान पर बैठा कर अपना ठेला लेकर आ जाता। सब्जी वाली भी अब अपना सामान बेच कर उसकी मदद करती और शाम तक लौटती। तीन महीने की निकटता अब प्रणय का रूप ले चुकी थी। दोनो को एक दूसरे से बात करना , मदद करना , साथ मे खाना सभी गतिविधि भाने लगी थी। यह निकटता शारिरिक आकर्षण मे बांध कर एक कर चुकी थी। मात्र सोलह बरस के प्रदीप ने उसे विवाह कर लेने का प्रस्ताव दिया तो छब्बीस बरस की सब्जी वाली खिलखिला पड़ी। ” बिना विवाह के हम ज्यादा आजादी से जी सकते है।

तुम मुझे चाहते हो और मैं तुम्हे , यह सत्य है पर इस प्रेम को ऐसे ही चलने देना ज्यादा अच्छा है। अभी तुम्हारी उम्र भी कम है, इसलिए तुम मेरे प्रेमी बने रहो। पति के बाद तुम मेरे स्वामी बनने का सहज प्रयास करोगे जो शायद हमारे प्रेम मे एक बाधा का कारण बन जाए। ” प्रदीप एक बार फिर अवाक होके उसके चेहरे को देख रहा था। एकदम सच्ची और सुलझे मन वाली लड़की को वो जो पाने का ख्वाब संजो रहा था अब उसके खोने के डर से सिहर उठा। “क्या तुम किसी और से भी प्रेम करती हो?” उसने अटकते हुए उससे प्रश्न किया। मैं सबसे समान रूप से प्रेम करने में यंकी रखती हूँ, हां पर मेरा ज्यादा वक्त और ज्यादा ध्यान तुम्हारे लिए ही रहेगा। तुम मुझे थोड़ा अधिक प्रिय हो। मै अब किसी भी बंधन से मुक्त होकर जीना चाहती हूँ और आशा करती हूँ कि मेरी भावनाओ को तुम समझ पा रहे होगे।” तुम परिवार और बच्चे की चाहत नही रखती?” प्रदीप अब भी अपने प्रयास नही छोडना चाहता था। ” अभी तक बच्चा करने के बारे मे विचार नही कर पाई हूँ। जिस साल मन बनेगा तो पहले तुम्हे ही अपने बच्चे का बाप बनाना चाहूंगी। अगर तुम बिना शादी ऐसा करने के लिए राजी ना हुए तो फिर मै किसी ओर सुपात्र को भी इस काज के लिए राजी करने का प्रयास करूंगी। ”

अब प्रदीप भी अपने विचारो के खोल से बाहर निकल कर उसके विचार से सहमती प्रकट करने लगा। ” समाज की इस बंधी-बंधाई सोच से परे भी सोचने और करने का जीवट भी सबमें नही हो सकता। तुम्हारे विचारो से मैं पूरी तरह सहमत हूँ पर अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए तुम्हारे तय किए पथ का संगी बन सका तो अपने को खुशकिस्मत समझूँगा। ” दो कम पढ़े लिखे लोग समाज का नया पाठ्यक्रम रचने की ओर पहला कदम बढ़ा चुके थे।

संदीप पांडे “शिष्य ” अजमेर

दुर्गेश, पसंद नगर, पुष्कर रोड,कोटडा, अजमेर, 305004

ph 9414070143

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