राष्ट्रमत न्यूज,रीवा(ब्यूरो)।डिप्टी सीएम के रीवा जिले में सबसे गंदा गांव कौन सा है। यहां किसी से पूछो तो जवाब मिलेगा पहड़िया गांव। पहड़िया गांव सबसे अधिक गंदा गांव इसलिए बना क्यों कि यहां रीवा शहर का कचरा पहड़िया में डंप होता है। पहड़िया में कचरे के ढेर से बिजली बनाने का प्लांट है। रीवा शहर की गंदगी को डंप करने से इस गांव की आबोहवा जहरीली हो गयी है। पानी प्रदूषित हो गया है। यहां घर घर में बीमारी मेहमान बनकर रहती है। इतना ही नहीं अब इस गांव को कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता। गांव के युवा लड़कों की शादी नहीं हो रही है। यहां जिधर भी नजर डालों गंदगी का ढेर ही नजर आता है। मुंह पर रूमाल ढक के ही यहां चल सकते हैं। पहड़ियां गांव की बेबसी और बर्बादी का आलम यह है कि यहां जीवन नरक है।
असहनीय बदबू से जीना मुश्किल
शहर को साफ रखने के लिए कचरा पहुंचाया गया गांव में, लेकिन अब उसी कचरे से गांव की आबोहवा बिगड़ने के आरोप लग रहे हैं। कहीं असहनीय बदबू से जीना मुश्किल है, तो कहीं जमीन और भूजल के दूषित होने की आशंका। रीवा के पहाड़िया में स्थापित कचरे से बिजली बनाने वाले प्लांट को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट के आसपास रहने वाले लोगों को त्वचा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, खेती की जमीन प्रभावित हो रही है और अब गांव की पहचान भी बदलने लगी है लोग इन गांवों को कचरे वाला गांव कहकर बुलाने लगे हैं। यहां तक कि शादी-विवाह के रिश्ते आने में भी परेशानी होने लगी है, बदबू के कारण लोग वापस लौट जाते हैं।
रूमाल ढक कर बात करनी पड़ी
रीवा के पहाड़िया में स्थापित कचरे से बिजली बनाने वाला प्लांट अब विवादों के घेरे में है। जिस प्लांट से शहर के कचरे के निस्तारण और बिजली उत्पादन की उम्मीद की गई थी, उसी के आसपास रहने वाले ग्रामीण इसके संचालन पर सवाल उठा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्लांट से निकलने वाली तेज दुर्गंध ने आसपास के गांवों में रहना मुश्किल कर दिया है। लोगों का दावा है कि बदबू का असर इतना ज्यादा है कि घरों में रहना और रोजमर्रा के काम करना भी परेशानी भरा हो गया राष्ट्रमत की टीम जब पहुंची तो वहां रुमाल लगाकर बात करनी पड़ी।
पर्यावरण मानकों की अनदेखी
ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट के आसपास रहने वाले लोगों को खुजली और त्वचा संबंधी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ ग्रामीणों ने गंभीर बीमारियों, यहां तक कि कैंसर का खतरा होने की आशंका भी जताई है। हालांकि, कैंसर या अन्य बीमारियों का प्लांट से सीधा संबंध स्थापित करने के लिए चिकित्सकीय जांच और वैज्ञानिक साक्ष्य जरूरी हैं। सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग ने प्रभावित आबादी के स्वास्थ्य की जांच कराई है? क्या पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप प्लांट का संचालन हो रहा है?
वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी
ग्रामीणों का कहना है कि कचरे से निकलने वाला दूषित तरल पदार्थ, जिसे लीचेट कहा जाता है, आसपास की जमीन को नुकसान पहुंचा रहा है। उनका दावा है कि खेतों की उपजाऊ क्षमता प्रभावित हो रही है और भूमिगत जल की गुणवत्ता पर भी खतरा मंडरा रहा है। यदि दूषित तरल जमीन में रिस रहा है, तो यह मिट्टी और जल स्रोतों के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। इसकी वास्तविक स्थिति जानने के लिए मिट्टी और पानी के नमूनों की वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी है।
मुश्किलों का सामना कर रहे
प्लांट के आसपास कचरे के प्रसंस्करण से निकलने वाले अवशेषों को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि फ्लाई ऐश जैसे दिखने वाले अवशेष खुले में फेंके जा रहे हैं और आसपास बच्चे खेलते नजर आते हैं। हालांकि, इन अवशेषों की वास्तविक प्रकृति और उनमें मौजूद संभावित हानिकारक तत्वों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। अगर औद्योगिक या कचरा प्रसंस्करण के अवशेष खुले में पड़े हैं, तो उनके सुरक्षित निस्तारण और बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। मीडिया की टीम उन तमाम लोगों तक पहुंची जो वहां स्थानीय के तौर पर मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
कचरे के अवशेष फैले हुए हैं
ग्रामीणों का दावा है कि प्लांट में सिर्फ रीवा ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी कचरा लाया जाता है। विस्तार न्यूज़ की टीम को मौके पर बिहार के पटना से कचरा लेकर आने का दावा करने वाला एक ट्रक चालक मिला। यह बातचीत दूसरे राज्यों से कचरा लाए जाने की पड़ताल का अहम सुराग है। हालांकि, कचरे के वास्तविक स्रोत, मात्रा और परिवहन की अनुमति की पुष्टि के लिए ट्रक के दस्तावेजों और प्लांट के रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।

शहर साफ मगर पहड़िया गंदा
ग्रामीणों के मुताबिक, अब इस इलाके की पहचान कचरे वाले गांव के रूप में होने लगी है। लोगों का दावा है कि शादी के लिए रिश्ते देखने आने वाले परिवार बदबू के कारण यहां संबंध करने से पीछे हट जाते हैं। यह सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीणों के सामाजिक जीवन और सम्मान से जुड़ा सवाल भी है। हालांकि, शादी के रिश्तों पर पड़ रहे प्रभाव के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि शहर को साफ रखने की कीमत अब गांव के लोग चुका रहे हैं।
सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे
इस पूरे मामले पर नगर निगम कमिश्नर से भी बात की गई। उनका कहना है कि उन्हें प्लांट से दुर्गंध आने की शिकायत मिली है और इसे दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। कमिश्नर के मुताबिक, अन्य समस्याओं को लेकर उनके पास शिकायत नहीं आई है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन केवल दुर्गंध दूर करने तक सीमित रहेगा या ग्रामीणों की जमीन, पानी और स्वास्थ्य से जुड़े आरोपों की भी जांच कराएगा?
कौन कौन सी हो रही बीमारियां
सांस की समस्याएं: कचरे के सड़ने से निकलने वाली मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सांस फूलना और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने से फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है।
पेट और पाचन संबंधी रोग: कचरे पर बैठने वाली मक्खियों और दूषित पानी/भोजन के कारण हैजा (Cholera), टाइफाइड, डायरिया (दस्त) और पेचिश जैसी बीमारियां होती हैं।
मच्छर जनित रोग: कचरे के पास पानी भरने से वहां मच्छर पैदा होते हैं, जिससे मलेरिया, डेंगू और कालाजार जैसी गंभीर बीमारियां फैलती हैं।

त्वचा और आंखों के संक्रमण: कचरे में मौजूद रासायनिक पदार्थों, धूल और फफूंद के संपर्क में आने से चर्म रोग (स्किन एलर्जी) और आंखों में जलन व संक्रमण हो जाता है।
गंभीर आंतरिक अंग की क्षति: कचरे से रिसने वाले जहरीले तत्व (लीचेट) जब जमीन के नीचे जाकर पीने के पानी के स्रोतों को दूषित करते हैं, तो उससे किडनी फेलियर और पीलिया (हेपेटाइटिस / जांडिस) जैसी घातक समस्याएं होने लगती हैं।