हेमेन्द्र क्षीरसागर, मानते हैं शारदेय नवरात्र हमारी सांस्कृतिक जड़ों, नैतिक मूल्यों और नारी शक्ति के सम्मान की सामूहिक अभिव्यक्ति है। जन-मन में शक्ति की जीती-जागती अलख है।शारदेय नवरात्र का पावन पर्व पूरे देश में आत्मीयता, आस्था और सांस्कृतिक ऊर्जा का संचार करने लगता है।
शारदेय नवरात्र: जन-मन में शक्ति की अलख \ विशेष लेख
अश्विन मास के आगमन के साथ ही शारदेय नवरात्र का पावन पर्व पूरे देश में आत्मीयता, आस्था और सांस्कृतिक ऊर्जा का संचार करने लगता है। यह केवल नौ दिनों के धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों, नैतिक मूल्यों और नारी शक्ति के सम्मान की सामूहिक अभिव्यक्ति है। जन-मन में शक्ति की जीती-जागती अलख है।
स्तुत्य, सत्य की असत्य पर और धर्म की अधर्म पर विजय। पौराणिक कथाओं में माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध वास्तव में हमारे भीतर छिपी नकारात्मकताओं। काम, क्रोध, लोभ और अहंकार को समाप्त करने का आह्वान है। इस पर्व की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि यह ईश्वर को ‘माता’ के रूप में पूजने की परंपरा सिखाता है। जहाँ शक्ति का आधार करुणा और रक्षण है।

अतुल्य, नवरात्र का असली सौंदर्य भारत के गाँवों और जनजातीय अंचलों में झलकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में नवरात्र नई फसल की आमद और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का समय है। घटस्थापना में बोए जाने वाले ‘जवारे’ सीधे तौर पर कृषि और समृद्धि से जुड़े हैं। जनजातीय बहुल क्षेत्रों जैसे मध्य भारत के गोंड, बैगा, बस्तर या बालाघाट का प्रसिद्ध दशहरा में माँ दुर्गा को बूढ़ी माई, खेरमाई या ग्राम देवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प के साथ पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकनृत्यों के बीच माँ की आराधना होती है। जो हमारी सबसे प्राचीन और अखंड आध्यात्मिक परंपरा है।
यथेष्ठ, पंडालों में सजती माँ की प्रतिमाएँ, जश, भजन, रामलीला, ड्रामा, डंडियार, डांडिया-गरबा का उल्लास और जगराते केवल मनोरंजन नहीं हैं। ये समाज को ऊँच-नीच, भेद-भाव से ऊपर उठाकर एक सूत्र में पिरोने का काम करते हैं। यह जन-जन में जागृति लाने का अवसर है कि हम एकजुट होकर बुराइयों से लड़ें। व्रत और उपवास का वास्तविक अर्थ केवल खान-पान का संयम नहीं, बल्कि मन और आचरण की शुद्धता है। नवरात्र के दौरान किया जाने वाला कन्या पूजन समाज को सीधा संदेश देता है कि नारी का सम्मान ही माँ की सच्ची आराधना है। जिस घर या समाज में बेटी और स्त्री का सम्मान नहीं, वहाँ माँ दुर्गा की कृपा संभव नहीं।
अभिभूत, चाहे गुजरात का गरबा हो, बंगाल की दुर्गा पूजा, उत्तर भारत की रामलीला हो दक्षिण भारत का बोम्मु गोलू या ग्रामीण चौपालों के लोक-अनुष्ठान। यह शारदेय नवरात्र भारत की ‘विविधता में एकता’ को जीवंत करता है। नवरात्र पर्व हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करता है। जिससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। आइए, इस शारदेय नवरात्र पर न केवल पूजा-पंडालों में माँ का स्वागत करें। अपने भीतर की बुराइयों का अंत करने और समाज में सौहार्द, पर्यावरण संरक्षण, नशा मुक्ति, बाल देखभाल, शिक्षा व नारी-सुरक्षा का वातावरण बनाने का संकल्प लें। जय मां जगदम्बे!

हेमेन्द्र क्षीरसागर,
बालाघाट,मध्यप्रदेश
मो.9174660763