डॉ.मुक्ति शर्मा की डिंक कहानी आधुनिक जीवनशैली, करियर और आर्थिक स्वतंत्रता की दौड़ में पीछे छूटते पारिवारिक रिश्तों तथा समय के महत्त्व को रेखांकित करती है। कहानी का मूल भाव यह है कि जीवन के फैसले सोच-समझकर लेने चाहिए, क्योंकि समय बीत जाने के बाद हर अवसर वापस नहीं आता। साथ ही, यह भी समझना जरूरी है कि संतान का निर्णय व्यक्तिगत है, लेकिन किसी भी निर्णय के दूरगामी परिणामों को समझना जीवन की परिपक्वता है।
डिंक\ कहानी
“सुनो मालती।”
मालती रसोई से बाहर आई। हाथ में चाय की ट्रे थी।
“जी, बोलिए। क्या हुआ?”
शर्मा जी ने चाय का कप उठाया, लेकिन पीने के बजाय उसे हथेली में थामे रहे।
“काव्य बड़ी हो गई है।”
मालती मुस्कुराई नहीं।
“यह बात तो आप कई साल से कह रहे हैं।”
“नहीं, मेरा मतलब… अब उसकी शादी की उम्र निकलती जा रही है।”
“उम्र कहाँ निकल रही है? उनतीस साल की तो हुई है।”
“उनतीस कम नहीं होते आजकल।”
मालती सोफे पर बैठ गई।
“आप भी न… रात-दिन इसी चिंता में लगे रहते हैं। मुझे तो कभी-कभी नींद नहीं आती। लड़की सुबह ऑफिस जाती है, रात को लौटती है। घर आते ही लैपटॉप खोलकर बैठ जाती है। शादी की बात करो तो कहती है—‘मम्मी, अभी बहुत काम है।’”
“और पूछो कि शादी कब करेगी तो जवाब मिलता है‘जब मेरे लेवल का लड़का मिलेगा।’”
मालती ने हल्की साँस छोड़ी।
“बात गलत भी तो नहीं है।”
“क्या मतलब?”
“मतलब यह कि लड़की पढ़ी-लिखी है, अपने पैरों पर खड़ी है। वह अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनना चाहती है तो इसमें बुरा क्या है?”
“मैंने कब कहा बुरा है? लेकिन कोई तो हो उसके जीवन में।”
“अगर कोई होता तो मुझे पता होता।”
“पक्का?”
मालती ने पति को घूरकर देखा।
“आपको याद है, कॉलेज में जब काव्य किसी लड़के का नाम भी ले देती थी तो आप क्या कहते थे?”
शर्मा जी चुप हो गए।मालती हँस पड़ी।
“‘लड़कों से दोस्ती मत रखना। पढ़ाई पर ध्यान दो। ये उम्र पढ़ने की है, प्यार-व्यार करने की नहीं।’ यही कहते थे न?”
शर्मा जी ने नजरें झुका लीं।
“वक्त बदल गया है मालती।”
“वक्त ही तो बदल गया है। अब बेटी भी बदल गई है।”
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।
फिर शर्मा जी बोले,“शर्मा जी का लड़का है न… गौरव।”
“कौन गौरव?”
“अरे, मेरे दोस्त शर्मा जी का बेटा। पुणे में नौकरी करता है। अच्छी कंपनी में है। इंजीनियर है। देखने में भी ठीक है।”
“उम्र?”
“बत्तीस।”
“और काव्य उनतीस।”
“तो?”
“कुछ नहीं। मिलवा दीजिए।”
रविवार की सुबह घर में असामान्य चहल-पहल थी।मालती ने ड्राइंग रूम के पर्दे बदले। सोफे के कुशन ठीक किए। रसोई में कई तरह के नाश्ते बन रहे थे।काव्य अपने कमरे में तैयार हो रही थी।
माँ ने दरवाजा खटखटाया।
“काव्य, बेटा।”
“हाँ माँ।”
“बस एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“तुम्हें कोई दबाव नहीं है। लड़का पसंद आए तभी बात आगे बढ़ाना।”
काव्य ने आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दी।
“माँ, मुझे पता है।”
“और अगर पसंद नहीं आया?”
“तो साफ कह दूँगी।”
“और अगर पसंद आ गया?”
काव्य ने माँ की तरफ देखा।
“तो शायद जिंदगी बदल जाएगी।”
माँ मुस्कुरा दी।
“आइए शर्मा जी! आइए।”
शर्मा जी अपने बेटे गौरव के साथ भीतर आए।कुछ औपचारिक बातचीत के बाद गौरव और काव्य को अकेले बात करने के लिए छत पर भेज दिया गया।दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर गौरव ने पूछा,“आप पुणे में ही रहना चाहेंगी?”
“हाँ। मेरा ऑफिस वहीं है।”
“मेरा भी।”
“तो फिर समस्या क्या है?”
गौरव हँस पड़ा।
“समस्या? अभी तो कुछ है ही नहीं।”
काव्य भी हँस दी।उस दिन पहली बार दोनों ने अपने भविष्य के बारे में बात की।
काव्य ने कहा,“मैं अपना करियर छोड़ना नहीं चाहती।”
गौरव ने तुरंत कहा,“मैं भी नहीं चाहता कि तुम छोड़ो।”
“और मैं शादी के बाद भी स्वतंत्र रहना चाहती हूँ।”
“रहोगी।”
“और बच्चे?”
गौरव कुछ क्षण चुप रहा।
“अभी इस बारे में सोचा नहीं।”
काव्य ने सिर हिलाया।
“मैं भी नहीं।”
दोनों नीचे लौट आए।शर्मा जी ने गौरव की तरफ देखा।गौरव ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
मालती ने काव्य की आँखों में जवाब पढ़ लिया।कुछ ही महीनों बाद घर में शहनाइयाँ बज रही थीं।
शादी के बाद पुणे का तीन कमरों वाला फ्लैट उनका संसार बन गया।सुबह दोनों एक साथ निकलते।
शाम को कभी गौरव पहले आता, कभी काव्य।कभी-कभी दोनों एक ही समय पर घर पहुँचते और दरवाजे पर ही एक-दूसरे से पूछते,“आज खाना कौन बनाएगा?”
फिर दोनों हँसते।
“स्विगी है न!”
और खाना आ जाता।
शुरुआत में जीवन बहुत सुंदर था।वीकेंड पर फिल्म।कभी लॉन्ग ड्राइव।कभी किसी रेस्तराँ में डिनर।
कभी अचानक गोवा।कभी विदेश यात्रा।फिर प्रमोशन आने लगे।काव्य की कंपनी ने उसे मलेशिया भेजने का फैसला किया।
“गौरव, मैं अगले हफ्ते मलेशिया जा रही हूँ।”
“कितने दिन?”
“दस।”
“जाओ।”
“बस इतना?”
“और क्या कहूँ?”
“तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”
गौरव ने उसे बाँहों में भर लिया।
“तुम स्वतंत्र हो काव्य। तुम्हें जो अच्छा लगे करो। अपनी जिंदगी जियो।”
काव्य ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।
“थैंक यू, माय डियर।”
दो दिन बाद गौरव को अमेरिका जाना था।दोनों के सूटकेस अलग-अलग कमरों में खुले पड़े थे।
एक ही घर में रहते हुए भी दोनों की यात्राएँ अलग थीं।शादी को दो साल हो गए।एक रात गौरव की माँ का फोन आया।काव्य ने फोन उठाया।
“नमस्ते मम्मी जी।”
“जीती रहो बेटा। गौरव कहाँ है?”
“यहीं हैं। बुलाऊँ?”
“पहले तुमसे बात करनी है।”
“जी, कहिए।”
दूसरी तरफ कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर आवाज आई,“बेटा, शादी को दो साल हो गए।”
“जी।”
“हम सोच रहे थे… अब घर में बच्चे की किलकारी सुनाई दे।”
काव्य चुप रही।
“काव्य बेटा, हम बूढ़े हो रहे हैं। पोते का मुँह देख लें तो…”
काव्य ने धीरे से कहा,“मम्मी जी, आजकल डिंक का जमाना है।”
“क्या?”
“डिंक।”
“ये डिंक क्या बला है?”
काव्य हँस पड़ी।
“रुकिए, गौरव आपको समझाएगा।”
उसने फोन गौरव को पकड़ा दिया।
“मम्मी।”
“बेटा, ये तुम्हारी पत्नी क्या डिंक-विंक बोल रही है?”
गौरव मुस्कुराया।
“मम्मी, DINK का मतलब है—Double Income, No Kids.”
कुछ क्षण फोन के दूसरी तरफ खामोशी रही।
फिर माँ की आवाज आई,“आग लगे इस डिंक-विंक को!”
गौरव हँस पड़ा।
“मम्मी, आप समझने की कोशिश करो।”
“हमें पैसा नहीं चाहिए बेटा। हमें पोता चाहिए।”
“मम्मी, अभी हमारा करियर…”
“करियर कब तक चलेगा?”
गौरव चुप हो गया।
“हम कल पुणे आ रहे हैं।”
फोन कट गया।वे आए।बहुत समझाया।काव्य ने भी समझाया।
“मम्मी जी, अभी हमारी जिंदगी सेट नहीं हुई है।”
सास ने पूछा,“कब होगी?”
काव्य के पास कोई जवाब नहीं था।
“अभी हम दोनों बहुत व्यस्त हैं।”
“और दस साल बाद?”
काव्य ने उस सवाल को हँसी में टाल दिया।समय भी हँसते-हँसते आगे बढ़ गया।
दस साल।बहुत लंबा समय नहीं होता।लेकिन जिंदगी में दस साल कब गुजर जाते हैं, पता नहीं चलता।
काव्य इकतालीस की हो गई।गौरव तैंतालीस का।उनका तीन बेडरूम का फ्लैट अब और सुंदर था।
नया फर्नीचर।महँगा टीवी।विदेश से लाए सजावटी सामान।दो गाड़ियाँ।बैंक बैलेंस।म्यूचुअल फंड।
बीमा।हर साल दो विदेशी यात्राएँ।कपड़ों से भरी अलमारियाँ।जूते रखने के लिए अलग कैबिनेट।
लेकिन उस घर में एक चीज नहीं थी,बच्चे की आवाज।न रोना।न हँसी।न खिलौनों की खनक।न स्कूल की फीस की चिंता।न किसी के देर से आने पर दरवाजे की तरफ उठती बेचैन निगाहें।
शाम को दोनों लौटते।काव्य लैपटॉप खोल लेती।गौरव मोबाइल।कभी दोनों एक ही कमरे में बैठकर अलग-अलग दुनिया में होते।
“खाना?”
“ऑर्डर कर दो।”
“क्या?”
“कुछ भी।”
बातचीत अब छोटे-छोटे वाक्यों में सिमट गई थी।
“कल मीटिंग है।”
“मेरी फ्लाइट है।”
“प्रमोशन की बात चल रही है।”
“क्लाइंट नाराज़ है।”
“बोनस कितना मिला?”
कभी-कभी रात को काव्य खिड़की के पास खड़ी होकर सामने वाले फ्लैट की बालकनी देखती।
वहाँ एक बच्चा रोज शाम को साइकिल चलाता था।उसकी माँ पीछे-पीछे दौड़ती।काव्य को जाने क्यों वह दृश्य अच्छा लगता।फिर वह पर्दा खींच देती।शर्मा जी और मालती अब इस दुनिया में नहीं थे।
माँ की आवाज फोन पर नहीं आती थी।
“काव्य, खाना खाया?”
अब कोई नहीं पूछता था।
पिता का वह पुराना संदेश भी कभी-कभी मोबाइल में दिखाई देता,
“बेटा, समय निकालकर घर आ जाना।”
अब घर ही नहीं था।एक दिन काव्य ने पुराने फोन में माँ की तस्वीर देखी।वह बहुत देर तक स्क्रीन देखती रही।गौरव ने पूछा,“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“रो क्यों रही हो?”
“मुझे पता नहीं।”
एक दिन काव्य को अचानक अस्पताल जाना पड़ा।गौरव उस समय जर्मनी में था।उसने फोन किया।
“गौरव… मैं अस्पताल में हूँ।”
“क्या हुआ?”
“कुछ खास नहीं। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट कराने को कहा है।”
“मैं वापस आ जाऊँ?”
काव्य कुछ क्षण चुप रही।
“नहीं। तुम्हारी मीटिंग है। तुम काम पूरा करो।”
फोन कट गया।
नर्स ने फॉर्म भरते समय पूछा,“मैडम, अटेंडेंट का नाम?”
काव्य ने गौरव का नाम लिख दिया।
“मैडम, वह यहाँ हैं?”
“नहीं।”
“कोई और?”
काव्य ने सिर हिला दिया।
“कोई नहीं।”
नर्स ने उसकी तरफ देखा।
“मैडम, कोई घर से आ जाएगा?”
काव्य के होंठ खुले।लेकिन आवाज नहीं निकली।उस रात अस्पताल के कमरे में उसे पहली बार लगा,
पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है, लेकिन किसी अपने की मौजूदगी नहीं।
मैं एक डॉक्टर हूँ।पिछले कई वर्षों में मैंने अपने क्लिनिक में ऐसे बहुत से दंपतियों को देखा है।
कुछ के पास समय नहीं था।कुछ के पास पैसे नहीं थे।कुछ के पास दोनों थे, लेकिन बच्चे के लिए सही समय नहीं था।
और कुछ ने तय किया था,“हमें बच्चे नहीं चाहिए।”
यह उनका अधिकार था।मैं उनके निर्णय का सम्मान करती थी।मगर जीवन हमेशा हमारी बनाई हुई समय-सारिणी से नहीं चलता।एक दिन काव्य मेरे क्लिनिक में आई।उसके साथ गौरव था।
दोनों बहुत चुप थे।मैंने रिपोर्ट देखी।फिर दूसरी रिपोर्ट।फिर तीसरी।
मैंने काव्य की तरफ देखा।
“आप लोग कब से कोशिश कर रहे हैं?”
काव्य ने नजरें झुका लीं।
“लगभग डेढ़ साल से।”
“पहले कभी कोशिश नहीं की?”
उसने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
गौरव कुर्सी पर बैठा रहा।
मैंने पूछा,“कोई विशेष कारण?”
काव्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा
“हम डिंक कपल थे।”
मैं चुप रही।वह खुद ही बोलती गई,“हमें लगता था कि बच्चे के बिना जिंदगी आसान होगी।”
“थी?”
काव्य ने मेरी तरफ देखा।उसकी आँखों में पानी था।“हाँ… बहुत आसान थी।”
“और अब?”
वह कुछ कह नहीं पाई।गौरव ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
“अब हमें लगता है कि शायद हमने जिंदगी को बहुत आसान समझ लिया था।”
कमरे में खामोशी भर गई।मैंने रिपोर्ट फिर से देखी।उम्र, समय और शरीर की अपनी सीमाएँ थीं।
मैं डॉक्टर थी।मुझे सच बताना था।लेकिन कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें डॉक्टर भी बहुत धीरे बोलता है।
मैंने काव्य के कंधे पर हाथ रखा।
“हम कोशिश करेंगे।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“हो जाएगा?”
मैंने कोई झूठा भरोसा नहीं दिया।
“हम पूरी कोशिश करेंगे।”
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“आंटी… अगर दस साल पहले हम आ जाते तो?”
मेरे पास इस सवाल का कोई चिकित्सकीय उत्तर नहीं था।क्योंकि वह सवाल सिर्फ शरीर का नहीं था।
वह समय का सवाल था।और समय कभी पीछे नहीं लौटता।मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
उसी तरह…जैसे कभी मेरी दादी ने मेरे माथे पर हाथ रखा था।काव्य कुछ देर मेरी हथेली से अपना सिर लगाए बैठी रही।
उस क्षण मुझे लगा,इंसान अपनी जिंदगी में बहुत कुछ चुन सकता है।
करियर चुन सकता है।शहर चुन सकता है।घर चुन सकता है।विदेश चुन सकता है।यहाँ तक कि अकेलापन भी चुन सकता है।लेकिन समय को नहीं चुन सकता।समय जब अपनी मुट्ठी बंद कर लेता है, तब करोड़ों रुपये भी उसकी एक उँगली नहीं खोल पाते।
काव्य और गौरव के पास आज भी सब कुछ है।तीन बेडरूम का घर।दो गाड़ियाँ।बैंक बैलेंस।
विदेश यात्राओं की तस्वीरें।महँगे कपड़े।सफल करियर।लेकिन उस घर में अब भी तीसरी आवाज नहीं है।कभी-कभी रात में उनके फ्लैट की बालकनी की बत्ती देर तक जलती रहती है।काव्य बाहर खड़ी रहती है।
सामने वाले घर की बालकनी में कोई बच्चा खिलौना लेकर खेलता दिखाई देता है।काव्य उसे देखती रहती है।और शायद मन ही मन सोचती है,“काश… जिंदगी में कुछ फैसलों के आगे भी ‘री-ट्राई’ का बटन होता।”
लेकिन जिंदगी कंप्यूटर नहीं है।उसमें डिलीट के बाद रिकवर का विकल्प नहीं होता।और कुछ फैसले…बहुत देर से समझ में आते हैं।
डॉ.मुक्ति शर्मा,कश्मीर
मो.9797780901








वर्तमान संदर्भों को चित्रित करती हुई सशक्त कहानी। विषय वस्तु नवीन और कहानी की कहनी रोचक। संवाद भी सरल सहज अपनी बात को व्यक्त करते हुए। so called Dink शब्द मैं भी इन दिनों अपने आस-पास सुन रही हूँ। हालाँकि ऐसा भी लगा कि कहानी को एक मोड़ पर लाकर छोड़ देना चाहिए था। बालकनी में बैठकर सामने किलकारी मारते हुए बच्चे के दृश्य को देखते हुए वो क्या सोच रही है, यह बताना ज़रूरी नहीं था। हर कहानी निष्कर्ष पर पहुँचे यह भी आवश्यक नहीं होता। कहानी में प्रवाह है और कहानी बाँध कर रखने में सक्षम है।
बहुत बहुत आभार अनिता जी