डॉ. शबनम आलम की कविता बताती है अहंकार स्वयं में पूरी तरह बुरा नहीं है; उसका नकारात्मक रूप विनाशकारी है, जबकि उसका रूपांतरण स्वाभिमान में हो जाए तो वही मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाता है।यह कविता आत्मचिंतन, विनम्रता, स्वाभिमान और मानवीय संवेदनाओं का संदेश देती है।
डॉ. शबनम आलम की कविता
अहंकार : दर्प से दर्पण तक
ख़ुद को सबसे अलग मान लेना
या एक ऊंची मीनार पर खड़े होकर
दुनिया को छोटा देखना
और ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ समझना
अपनी प्रतिध्वनि को सत्य मान बैठना
और दूसरे के अस्तित्व को मिथ्या
सरलता से दूरी और सहजता का अभाव
चेहरे पर कुटिल मुस्कान
वाणी में अनसुना सा अभिमान
या दृढ़ता के साथ अकड़ जाना
मानो झुकना हार हो और विनम्रता कमजोरी
जब स्वार्थ संवेदना को ढक कर
धन और ऐश्वर्य पर इठलाए
और जब दूसरों के घावों पर नमक का लेप लगाए
अंह काल कुष्ठित होकर पूर्णता पर पहुंच जाए
तो क्या ये अहंकार है?
पर यह सच है कि अहंकार हम सब में होता है
परछाई की तरह हमारे साथ चलता है
यह बुरा तब हो जाता है
जब नकारात्मक होकर पहले स्वयं को जलाता है
फिर औरों को आहत करता है,
पर इस नकारात्मक अहंकार को तोड़ें मत
अपने भीतर झांकें, पहचानें और पूछें ख़ुद से;
अहंकार करने पर हमें सुख मिलता है?
हम सबके साथ सरल और आत्मीय रह पाते हैं?
लोग हमारे क़रीब आते हैं या दूर भागते हैं?
जिस दिन यह यक्ष प्रश्न; हमारे मन पर दस्तक देगा
उस दिन यही अहंकार; दर्प से दर्पण बन जाएगा
नकारात्मक से सकारात्मक और संवेदनहीन से संवेदनशील
यही अहंकार स्वाभिमानी बन ख़ुद से वादा करेगा;
अन्याय न करना और न अन्याय के आगे झुकना
अपनी गरीमा के साथ दूसरों की गरीमा की रक्षा करना
फिर यही अहंकार; शांति देगा, धैर्य देगा
और चुनौतियों से जुझने का ज़िद भी देगा
और एक दिन सात्विक रूप से रचनात्मकता का दीप जलाएगा
अंततः यही अहंकार दर्प से दर्पण बन जाएगा।
डॉ. शबनम आलम,अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
मोबाइल & व्हाइटस्एप नम्बर- 7983406102
ईमेल – shabnamtabssum1980@gmail.com

