घंटी\कहानी - rashtrmat.com

घंटी\कहानी

गोविंद सेन की कहानी घंटी से समझा जा सकता है कि आस्था और श्रद्धा से किसी का भरोसा नहीं टूटता। यह मायने नहीं रखता कि मंदिर में कौन से देवी- देवता विराजे हैं।मन में भक्ति और पत्थर पर विश्वास है कि यही ईश्वर हैं,इतना ही काफी है,व्यक्ति को धार्मिक होने के लिए।

                              घंटी\कहानी

गोविंद सेन

वह एक अभागा मंदिर था। तमाम मंदिरों के भाग्य खुल रहे थे। नए-नए मंदिर बन रहे थे। पुराने मंदिरों की मरम्मत हो रही थी। उन्हें सुन्दर बनाया जा रहा था। देवताओं की प्राण प्रतिष्ठाएँ हो रही थीं। पर उसका भाग्य अभी तक नहीं खुला था।

मैं बतौर पर्यटक दूसरी बार मंदिर आया था। वह उसी जीर्ण-शीर्ण हालत में था। शिखर टूटा हुआ था। ऊपर आकाश खुला था। धूप सीधे शिवलिंग पर आ रही थी।शिखर पर कुछ शिलाखंड ऐसे  लगे हुए थे जैसे गिरने को आतुर हों। अन्दर खड़ा होने पर लगता था कि कहीं कोई शिलाखंड ऊपर न गिर जाए। यदि एक शिलाखंड भी ऊपर आ गिरा तो मंदिर में ही जान निकल जाएगी। ये अलग बात है कि अभी तक कोई शिलाखंड अपनी जगह से खिसका नहीं था। लेकिन गिरेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं थी।

मंदिर बहुत पुराना था। कई बारिशें और कड़ी धूप झेल चुका था। कुछ जगहों पर काली काई जम चुकी थी। शिवलिंग में तीन-चार क्रेक थे। मंदिर के बाहर बड़ा सा नंदी बैठा था। उसकी कमर, गरदन और कन्धों पर क्रेक थे। मुँह के पास एक झाड़ी उग आयी थी। मंदिर की सीढ़ियों के पत्थर अपनी जगह से थोड़े खिसक गए थे। उन्हें जोड़ने वाली दर्जे खुल चुकी थीं।

मंदिर से निकले पत्थरों को चारों ओर जमाकर एक बेढंगी सी चहारदीवारी बना दी गई थी। इस दीवार को बनाने में कुछ पेड़ों ने भी सहयोग दिया था। पत्थरों को जैसे-तैसे जमा भर दिया गया था। उनके बीच दरारें मौजूद थीं। इन दरारों में साँप-बिच्छू अपना आवास बना सकते थे। कुछ का आवास तो वहां होगा ही।

इलाके में में पीले पत्थर पाए जाते थे। मंदिर को बनाने के लिए इन्हीं पीले पत्थरों का उपयोग किया गया था। मंदिर के हर खम्भे के सुगढ़ शरीर विभिन्न मुद्राओं में बने थे। पर सुन्दर नक्काशी थी। पुरुषों और स्त्रियों, पता नहीं ये कौन से देवी-देवता या भगवान थे। प्रवेश द्वार पर अज्ञात लिपि में कुछ लिखा हुआ भी था। उसे पढ़ना मेरे लिए मुश्किल था। शायद इसे कोई अभी तक पढ़ भी नहीं पाया था। अन्यथा इसके इतिहास के बारे में कुछ तो पता चलता। अभी तक तो मनमर्जी का इतिहास चल रहा था। कोई इसे पांडव कालीन मंदिर बता रहा था। कुछ बताते हैं कि इसे परमार राजाओं ने बनवाया था।

मंदिर से निकली हुई अधिकांश मूर्तियाँ खंडित थीं। कुछ ही साबुत थीं। उन्हें चहारदीवारी से टिकाकर रख दिया गया था।बबूल अपने पीले फूल इन पर बरसा रहे थे। ये मूर्तियाँ बबूल के फूलों और धूल से नहा रही थीं। परिसर में कुछ बकरियाँ घुसी हुई थीं। वे अपना खाद्य तलाश रही थीं। उनके लायक कुछ झाड़ियाँ वहां मौजूद थीं।

नदी के किनारे बसे उस आदिवासी गाँव की हालत भी मंदिर जैसी ही थी। धूल-धूसरित रास्ते और बेतरतीब झोंपड़ियों के छत्ते। मिट्टी की दीवारें और कवेलू वाली, एक या दो ढाल की छतें। एकाध घर ही पक्का होगा। लोग जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। ग्रामीण छोटी जोत के किसान और मजदूर थे। इक्का-दुक्का ही होंगे जो कायदे से किसी रोजगार में लगे होंगे। कुल मिलाकर एक गरीब बस्ती थी।

दो साल पहले महाशिवरात्रि पर यहां भव्य आयोजन हुआ था। आयोजन एक धार्मिक दल के कार्यकर्ताओं ने किया था। तब मंदिर में नयनाभिराम लाइटिंग की गई थी। बहुत भीड़-भाड़ हुई थी। भक्तों ने आकर धूमधाम से पूजा-अर्चना की थी। विधायक जी अपनी पत्नी सहित इस आयोजन में पधारे थे।

उन्होंने यहां पूजा की थी। विधायक जी के राजसी चेहरे पर फरफरी मूँछें थीं। बाल डाई किए हुए थे। हालाँकि खोपड़ी पर गोल चमकीला टीला बन चुका था। वे पायजामा कुरता पहने हुए थे। गले में दुपट्टा डला हुआ था। स्थानीय चैनल के पत्रकार को बाईट देते हुए उन्होंने कहा था- ‘यह बहुत प्राचीन मंदिर है। हमारे बूढ़े-बाड़े कहते थे कि ये महाभारत के समय का मंदिर है। यहां से एक सुरंग थी जो पांडव की गुफा और मांडव से जुड़ी हुई थी। इस सुरंग से पांडव आते-जाते थे। मंदिर किसी भूकंप के आने से टूटा होगा। या आक्रान्ताओं ने इसे तोड़ा है। यहां साक्षात महादेव विराजमान हैं। महादेव की ही कृपा से मैं तीन बार विधायक बन चुका हूँ। मैं इसके जीर्णोद्धार के लिए भरपूर कोशिश करूँगा। पुरातत्व विभाग की सूची में इसका नाम जुड़वाऊँगा। राजधानी में भी इसके पुनर्निर्माण के सवाल को उठाऊँगा। जय भोले बाबा। हर हर महादेव !’ कुछ लोग बताते हैं कि रानी रूपमती मांडव से नर्मदा के साथ इस मंदिर के शिखर के भी दर्शन किया करती थीं। निश्चित ही यह बहुत पुराना और महत्वपूर्ण मंदिर था।

सीढ़ियों पर एक बुजुर्ग मिले थे। वे उसी गाँव के लग रहे थे। उनकी हालत भी मंदिर जैसी ही थी। किन्तु चेहरे पर आस्था की भोली सी दीप्ति थी। लगता था कि ये यहीं मंदिर के आसपास बने रहते हैं। सीढ़ियों पर उनके कपड़े सूख रहे थे। पीठ झुकी हुई थी। सिर पर पुराना सफेद गमछा लपेटा हुआ था। बदन पर घूसर रंग की सस्ती और पुरानी स्वेटर झूल रही थी। घुटनों तक जाती सफेद-मटमैली घोती थी। वे सभी मूर्तियों को कंकु लगा रहा थे। मैंने ‘राम-राम’ करते हए उनका नाम मंदिर के हर खम्भे पर सुन्दर नक्काशी थी। पुरुषों और स्त्रियों के सुगढ़ शरीर विभिन्न मुद्राओं में बने थे। पता नहीं ये कौन से देवी-देवता या भगवान थे।

पूछा। बोले- ‘गोबीन।’

जब मैं जाने को हुआ, वे बोले- ‘एक बात कहूँ?’

‘हाँ, कहो गोबीन काका।’

‘घंटी के लिए सौ रुपये दे दो। मेरे पास घंटी नहीं है।’

वे घंटी बजाकर शायद भगवान को जगाना चाहते थे। घंटी न होने से भगवान अभी जाग नहीं पाए थे। जागते ही वे अपने भक्त गोबीन काका की जरूरत का संज्ञान जरूर लेंगे।

मैं चुप था। जो महादेव जब एक मामूली आदमी को तीन बार विधायक बनवा सकते हैं। निर्बल को बलवान बना सकते हैं। पंद्रह साल में उसकी संपत्ति पंद्रह गुना बढ़वा सकते हैं। उनकी सात पीढ़ी का इंतजाम करवा सकते हैं। उसे फर्श से अर्श तक पहुँचा सकते हैं। मर्डर के केस से बेदाग बरी करवा सकते हैं। वे गोबीन काका को घंटी भी दिलवा देंगे। इतनी ताकत तो उनमें होगी ही। मैं उनके लिए घंटी की चिंता क्यों करूँ? या गोबीन काका ही घंटी की चिंता क्यों करें?

‘गोबीन काका धीरज रखो। महादेव की कृपा से एक दिन आपको घंटी जरूर मिल जाएगी।’ मैं बस इतना ही कह पाया। मैंने अपनी मोटर साइकिल वापस अपने कस्बे की ओर मोड़ ली।

गोविंद सेन,193 राधारमण कालोनी,मनावर 45446

जिला- धार मध्यप्रदेश, मो- 9893010439