डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी बता रहे हैं व्यक्ति को अपने आप को ही दांव पर लगाना पड़ता है। जीवन जीना मात्र खुशहाली के भरोसे संभव नहीं है। ज़िंदगी के हवाई अड्डे भी होते हैं और घंटा घर भी। तय करना होता है कि किसको कहाँ जाना है।यहाँ भी एक धोबिया पछाड़ ही रास्ता सिखाता है।लड़ – लड़ के जीने की भी एक धुन होती है।
ज़िंदगी के हवाई अड्डे और घंटा घर \ विशेष लेख
– डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी
“मेरी यही कोशिश रही /पत्थरों की तरह हवा में टकराएं मेरे शब्द /और बीमार की डूबती नब्ज़ को थामकर/ ताज़ा पत्तियों की साँस बन जाएं /मैं अच्छी तरह जानता हूँ/तीन बाँस चार आदमी और मुट्ठी भर आज/ बहुत होगी अंतिम अभिषेक के लिए /इसीलिए न तो मैं तुम्हें से डरता हूँ /न बेबजह शहीद होने का सपना देखता हूँ/”(चंद्रकांत देवताले)
हम औरों के बारे में नहीं सोचते बल्कि अपनी भी सही पड़ताल नहीं करते? ज़ाहिर है कि अपना जीवन केवल वाहवाही का नहीं होता।इसके न जाने कितने खट्टे – मीठे, चिरपिरे आस्वाद होते हैं।हम अपने आप को भी समय के चाक पर चढ़ाते हैं।
शायर हसरत मोहानी ने सच ही फरमाया है – “कुछ लोग थे जो वक्त के साँचे में ढल गए/कुछ लोग हैं, जो वक्त के साँचे बदल गए/मुश्किलों ने इस क़दर पीछा नहीं छोड़ा/पर मैंने भी तो शान से जीना नहीं छोड़ा/”ज़िंदगी न जाने कितने घाव देती है जो उसे मूल्यों और मानवीय विश्वासों के साथ जीना चाहते हैं।यहाँ भी एक धोबिया पछाड़ ही रास्ता सिखाता है।लड़ – लड़ के जीने की भी एक धुन होती है। अपने आप को ही दांव पर लगाना पड़ता है। जीवन जीना मात्र खुशहाली के भरोसे संभव नहीं है। ज़िंदगी के हवाई अड्डे भी होते हैं और घंटा घर भी। तय करना होता है कि किसको कहाँ जाना है।
चिन्तकों ने कहा है कि आत्मालोचन आदमी के लिए सबसे अच्छा उपयोगी रास्ता और शक्तिशाली टानिक भी है। कहते हैं जिसने जो ठान लिया वैसा वह करेगा ही। कोई उसकी राह नहीं रोक पाएगा।ऐसे लोगों ने ही तूफ़ान के पथ रोके हैं। तुम चाह लो तूफ़ान का मुँह मोड़ सकते हो। ऐसे ही लोगों ने ज़िंदगी का समूचा ज़हर एक चुल्लू में ही पी लिया। आत्मालोचन हमें अपने ऊपर हँसना सिखाता है।बहुत चोटें खाया हुआ आदमी हूँ। किसी का एक शेर है – “चोट जब तक लगी नहीं होती होश में ज़िंदगी नहीं होती/ सर है सजदे में दिल है और कहीं, इस तरह बंदगी नहीं होती/’
तथ्य यह है कि सुविधाओं के बगलगीर होने के कारण डाके, चोरी, हत्या, लूटपाट, शोषण, उत्पीड़न और मर्यादाहीनताओं के कृत्य होते रहते हैं। उसी की वजह से घूंसखोरी, झूठ – मक्कारी, दग़ाबाज़ी के दृश्य बार-बार देखने को मिलते हैं। इसके बरअक्स जिन्हें जो कहना है, वे डंके की चोट कहेंगे। जिन्हें धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता और घृणा का ज़हर उगलना है, वे उगल रहे हैं और उन्हें कोई भय नहीं है। जिन्हें धर्मनिरपेक्षता की बातें करनी है वे भी अपने हिसाब से करते रहेंगे। जो दुनियादार नहीं है, जो दो चेहरे नहीं रख पाता, दोमुंही बातें नहीं कर पाता है। दिखावटी प्रदर्शन नहीं कर सकता, वह ससुरा धोबी का कुत्ता हो जाता है जो- ‘न घर का होता और न घाट का‘। यदि सफलता पाना है तो आपके पास जो चीज़ है- उसकी नुमाईश लगाइये. उसका दिखावटी प्रदर्शन करिये जो लोगों को आसानी से भरमा ले।
आप जानते हैं कि सफलता प्राप्त करने के लिए प्रदर्शनों की होड है, जो प्रदर्शनों से चिढतें हैं वे कोल्हू के बैल की तरह अपनी धुरी पर निरंतर घूमते रहते हैं और जो सचमुच कोल्हू के बैल हैं उनसे तेली के अलावा कौन रिश्ता रखना पसंद करेगा?इसलिए कुछ संगी तेल देख रहे हैं और तेल की धार भी। वे तेली को भी देख रहे हैं। कुल मिलाकर वो तेलिया मसान हो गए हैं।कोई ज़रूरी नहीं कि आप प्रतिभाशाली ही हों, कोई ज़रूरी नहीं कि आप हमेशा काम में भिड़े ही रहें। हमेशा टुकडों-टुकडों मे काम करने वाले आदमी भी सफलता के शिखर पर पहुँच जाया करते हैं। ज़रूरी है तो सिर्फ़ यह कि आपके जीवन में महत्वाकांक्षी योजनाएं हों और जो सचमुच महत्वाकांक्षी नहीं होते उस दिशा में सक्रिय दिलचस्पी नहीं लेते। वे हमेशा बेचारे ही रहते है। यह ‘ बेचारापन’ उन्हें कहीं का नहीं रखता। हर कोई अपने लिये उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। कीर्ति व्यवसायियों के हाथ का वे खिलौना भी बन सकते हैं? महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा हाय-हाय और सख़्त अफसोस की मुद्रा में रहते हैं और सफलता उन्हें हमेशा पीठ दिखाती रहती है। वे अपने बाल – बच्चों को सामान्य सुविधायें भी नहीं जुटा पाते, कौन है जो अपने बच्चों के भरण-पोषण और लालन-पालन में कोताही बरतता हो।
समाज में बदमाशियाँ हमेशा सक्रिय रही हैं, यह कोई नई बात नहीं हैं। पूर्व में भी होता आया है और आज भी ऐसा हो रहा है। ज़्यादातर बदमाशी, छल-प्रपंच, धोखाधड़ी चतुराई और बातों की कारीगरी के द्वारा ही आदमी आज के जमाने में अपना परिवार चला रहा है या यूँ कहें कि चला सकता है। यूँ तो ईमानदारी से भी परिवार चलते हैं लेकिन कष्ट के साथ। अपनी दिक्कतों के साथ.आप जानते हैं कोई-कोई परिवार दौड़ते हैं, कोई चलते हैं और कोई काँखते-कराहते हैं। ज़्यादातर परिवारों में पैसों की हाय-हाय मची रहती है। यह हमारे मध्यवर्ग की भयावह त्रासदी है। यह हाय-हाय हमेशा आदमी को हलूसती और विचलित करती रहती है।
यूँ हलूसना एक देशज शब्द है.जो आदमी को कभी-कभी इतना विचलित करता है कि हाहाकार और मायूसी का स्थायी वातावरण छा जाता है। परिवार के लोग अपनी सामान्य इच्छायें तक कुचल डालने को मजबूर हो जाते हैं। वे अपने घर में ही गट्ठर बन जाते हैं। यह हाय-हाय आदमी को बाल-बच्चों, पत्नी, माँ -बाप, भाई-बहन से भी अलग फेंक देती है, एक भीषण यातना की शक्ल में। जाहिर है कि आज भी चुनौती यह है कि सीधे सच्चे आदमी अच्छे पिता, अच्छे पति, अच्छे पुत्र, अच्छे भाई, अच्छे पड़ोसी और अच्छे रिश्तेदार, अच्छे मित्र, अच्छे नागरिक नहीं रह पाते। सच से बचने का भी एक रोग है। डरे हुए लोग सच से भागते हैं।सच्चा आदमी लोगों की, ख्वाहिश में, लोगों की अपेक्षाओं में कभी खरा नहीं उतर पाता। बदमाशियाँ उसे रास नहीं आती। आप जानते हैं कि दुनिया का दस्तूर है कि जो काम का न हो, जो आपको बदले में कुछ देने के लायक न हो, उसे या तो फेंक दीजिए या किसी कोने में चुपचाप रख दीजिए या फि़र उससे किनारा ही कर लीजिए। ऐसे फेंके हुए या कोने में रखे हुये आदमियों की तादाद हमारे समाज में बहुत ज़्यादा है और सच तो यह है कि उनकी कोई वकत या कीमत लगभग नहीं है। जो इस फिज़ा से बाहर आ गए उनकी पौ बारह है।
हमारे जमानें में जो कुछ घट रहा है, उसका हमें ईमानदारी से सामना करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हम छिटककर और पल्ला झाड़कर एक ओर खड़े हो जायें- जैसे इस घटना में हमारी कोई भूमिका नहीं है, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। दरअसल हम हर जगह शरीक है। जब काली ताक़तें पीछे की ओर लौटने के इरादे से मंच में सज रहीं थी- तब हमने उन्हें ललकारा क्यों नहीं? हम अपने-अपने बिलों में क्यों घुस कर बैठ गये? हम कई-कई खानों से बचकर क्यों निकल गये? हमने अपने आपको तमाशबीनों की भीड़ में क्यों शामिल कर लिया? हम ज़्यादातर उनकी या उन जैसों की बोली में क्यों बोलने लगते हैं? क्यों नहीं है हमारे पास वैसा साहस, जहाँ हम साफ़-साफ़ कह सकें कि तुम मक्कार, झूठे, फरेबी और अतीत की दुहाइयां देने वाले ठेकेदार हो। धर्म के नाम पर, तुम प्यार- सहिष्णुता और भाईचारे की भावना का कत्ल कर रहे हो। जाहिर है मित्रों मैं भी गुनहगार हूँ। यह सब कुछ जो घट रहा है, भले ही उसमें मेरी भूमिका न हो लेकिन मैं रामायण के ‘ भरत ‘ जैसा अपराधी हूँ। जो अपराधी नहीं है निर्दोष है। लेकिन वो ये मानता है कि मेरी ही वजह से यह हुआ।इससे मेरा छुटकारा नहीं है। भरत को राजपाट दिलाने में और राम को जंगल भिजवाने में भरत की कोई भूमिका नहीं थी। उनकी माँ कैकेयी का सब कुछ किया धरा था, लेकिन भरत हमेशा अपने आपको अपराधी मानते रहे और इसी अपराध बोध में रहे। उन्होंने अपनी सगी माँ कैकेई तक को नहीं बख्शा। उनके शब्द हैं – “वर माँगत तोही भई न पीरा/गर न जीभ मुख परे न कीरा /”
– डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी
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