डॉ.सुजाता चौधरी की अंतिम यात्रा कहानी केवल एक विधवा स्त्री की कथा नहीं है, बल्कि समाज की संवेदनहीन परंपराओं पर प्रश्नचिह्न है।यह कहानी पूछती है क्या सम्मान का अधिकार केवल मृतकों को है, या जीवित मनुष्यों को भी है।
अंतिम यात्रा\कहानी
डॉ सुजाता चौधरी
कल की ही तो बात है। सुदेवी मैया ने कहा था,“ ठाकुरजी अब उठा ही लेते तो अच्छा था.., बूढ़ी हड्डी को क्यों ढुलवा रहे हैं,पर बस एक बात की विनती है – अगहन, पूस, माघ छोड़कर जिस महीने में चाहें उठा ले, फाल्गुन से लेकर कार्तिक तक…। हाँ एक बात और, एकादशी के दिन मृत्यु न हो.., कितने मनोयोग से वे अपनी मृत्यु का प्लान बना रही थीं।
मुझसे रहा नहीं गया। इतनी गंभीरता से मृत्यु का प्लान बनाते देखकर हँसी आनी स्वभाविक थी, “मैया आप भी…क्यों ठाकुरजी को तंग कर रही हैं बुलाने के लिए..” मैंने उनके हाथों को अपनी हथेलियों में लेते हुए पूछा ।
-और कितने दिन भोगती रहूँ बेटा.. क्या अब भी भोग नहीं कटे होंगे., नब्बे पार कर गई.., जर्जर शरीर किस काम का है.? उनके पास भी तो जाना है।
सच में सूखी ठठरी ही तो रह गईं थी सुदेवी मैया..।मैंने पाउडर के डिब्बे से हाथ में पाउडर लेकर उनके शरीर पर लगाते हुए पूछा, लेकिन मैया अगहन, पूस, माघ इन तीन महीनों में क्या खास बात है, जो उनके पास नहीं जाना है?
-बात कुछ खास नहीं है फिर भी सोचती हूँ, तुम्हें अपयश नहीं मिले, सुदेवी मैया ने गंभीरता पूर्वक कहा|
– भला मुझे क्या अपयश मिलेगा? हैरान हो गई मैं।
- लोगों का क्या है, कुछ भी कहते रहते हैं? कितना भी अच्छा काम करो लोकनिन्दक उसमें भी दोष ढूँढ़ ही लेते हैं। तुमने मुझे इतने प्रेम से रखा है, इसे वे समझेंगे ही नहीं…, कहेंगे बुढ़िया ठिठुर कर मर गई..मैं मरते-मरते तुम्हें अपयश देकर मरूँ..? यह अपराध भगवान मुझसे न कराएँ..।
मेरी आँखें नम होकर ही नहीं रूकीं। आँसू ढलक ही पड़े।
मैं उन्हें देखती रह गई थी ,जब पहली बार वे मेरे पास आईं थीं.|अस्सी साल की थीं, पैर टूटे हुए थे.. पर किसी तरह घसीट-घसीटकर चल लेती थीं..| दुबली-पतली क्षीण सी काया पर मुखमंडल पर गजब की चमक। दुधिया गोरा रंग, वृन्दावन के कड़े धूप में तप्त होकर भी गुलाबी गोरापन तनिक भी कम नहीं हुआ था।
एकदम चुपचाप थीं…कुछ बोल नहीं रही थीं, आँखें थोड़ी सी तनी हुई थीं, होठ भी सिकुड़े हुए थे और भौंहों पर हल्का सा बल था।
’जीवन में बहुत संघर्ष किया है इन्होंने, बहुत भजन भी किया है.. संन्यासिनी बनकर पूरी जिंदगी काटी है, पर.. अब थक गई हैं, पैर टूटने से लाचार भी हो गई हैं…। द्रौपदी दीदी ने इनका परिचय देते हुए कहा था, वे ही उन्हें लेकर आई थीं।
सन्यासिनी इतनी क्षीण-हीन और दीन!.. टी.वी. की संन्यासिनी तो, कितनी गलैमरस दिखती हैं, और क्यों न दिखें इतना अथाह धन जो होता है उनके पास, पर सफेद धोती में लिपटी… इस संन्यासिनी के पास कुछ भी नहीं था…।
उनकी दृष्टि जब मुझसे मिली, तो वे धीरे से मुस्कुराई.. बहुत कंजूसी के साथ, फिर अगले ही क्षण गंभीर हो गईं।
इन्हें रखोगी अपने पास? द्रौपदी दी ने जब पूछा, तो न कहने का कहाँ सवाल था? इस छोटे से वृद्धाश्रम के लिए इनसे उपयुक्त पात्र भला कौन हो सकता था? उन दिनों मेरे मन में एक उमंग थी, वृद्धा माताओं की सेवा करने की उमंग। कभी-कभी जिंदगी भी, एकदम से सीधे-साधे रास्ते पर चलने से इंकार कर देती है। खाओ-पीओ और सो जाओ के अलावा..जिंदगी कुछ और भी माँगती है..जिंदगी की इसी माँग ने मुझसे बारह सीटों वाले एक छोटा सा वृद्धाश्रम खुलवा दिया..। ’नमक रोटी खाऊँगी, किसी से कोई आर्थिक मदद नहीं लूँगी…। गहने बेचने पड़ेंगे तो बेच दूँगी, पर वृद्धाश्रम अवश्य चलेगा’, संकल्प लेते समय मन कितना प्रमुदित था। उन दिनों कितनी उमंग थी..गजब की।
जिंदगी की इसी उमंग की उड़ान में सुदेवी मैया जब मिली तो उनके पैर टूटे हुए थे,जैसे किसी ने उनके पर कतर दिए हों ।…
मेरे ’हाँ’ कहते ही साध्वी ललिता दासी बोल पड़ी-सोच लो इन्दिरा, इतनी कठोर औरत! मैंने जिंदगी में अबतक नहीं देखी, सेवा का जो भूत तुम्हारे सिर पर चढ़ा है, इसकी कृपा से सब उतर जाएगा…। इसकी जिह्वा में कड़वा नीम भरा है।
पता नहीं मेरे किन कृत्यों का फल था, कि मैं उस वक्त जरा सी भी विचलित नहीं हुई। ईश्वर की इतनी बड़ी मेहरबानी कैसे हो गई.. यह तो वही जाने पर उसने कृपा करके आगे बढ़कर शायद मेरी बाँहें थाम रखी थी । तभी तो गुम-सुम चुपचाप सुदेवी मैया जो एकटक शून्य में देख रही थीं। उनके चेहरे पर कठोरता की झलक मुझे भी दिखाई पड़ रही थी पर मेरे मन में उनके लिए प्रेम… उमड़ रहा था।
पर मेरे प्रेम को विजयी होने का मौका कहाँ मिल पाया? सुदेवी मैया की कठोरता के बाद भी मेरा प्रेम बरकरार रहता तब., मैं समझती कि ललिता दासी ने जो कहा था,उसमें मैं उतीर्ण हो गई ? मेरे संकुचित प्रेम पर उनका वृहत प्रेमिल स्नेह इतना भारी पड़ा कि वह उसमें दब गया| उनकी प्रेममयी गंगा ने मुझे प्रेम से आप्लावित कर दिया।
सुदेवी मैया को जब मैंने पहली बार हंसते हुए देखा था,आश्चर्यचकित होकर कहा था – “कितनी सुन्दर दिखती हैं ,जब आप हंसती हैं |
गंभीर हो गई थीं सुदेवी मैया; – ’क्या हँसती, क्या मुस्कुराती? ग्यारह साल की उम्र में जो लड़की विधवा हो जाए उसे समाज हँसने-मुस्कुराने की इजाजत कहाँ देता है बेटा.?थोड़ी देर रुककर बोली-
“पर इजाजत नहीं देकर भी समाज ठीक ही करता है| हँसती हुई जवान विधवा को देखकर कौन पुरूष है जो उसे चरित्रहीन मान कर खींसें निपोरता हुआ अपनी अंकशायिनी बनाने का प्रयास नहीं करेगा । उसे इज्जत से जिन्दगी जीने दे,यह पुरूष समाज की फितरत नहीं है।”उनके चेहरे पर कितने भाव आ रहे थे ,जा रहे थे|
अब क्या है? अस्सी साल की हो गई हूँ, हसूँगी भी तो कौन चरित्रहीन मानेगा? फिर यहाँ पर कोई मर्द-मानुष भी तो नहीं है और सबसे बड़ी बात मेरे हँसने में तुम्हारा दोष भी है… तुम्हारे पास आकर ही इतनी प्रसन्नता मिली है। जवानी भर इस लिए नहीं हँसी कि किसी पुरुष को यह गलतफहमी न हो जाए कि अब हँसी है तो फँसेगी ही। और जवानी बीत जाने के बाद, अभाव में संघर्ष करती रही। और अंत में, पैर की हड्डी का टूटना जिन्दगी भर का नासूर बन गया| जो भी जमापूँजी थी, सब समाप्त हो गई| किराए देने के भी पैसे नहीं रहे।मकानमालिक से लाख कहा -कुछ दिन रहने दे पर बुढ़िया पर कैसे भरोसा करता,उसे गलत नहीं कहूंगी सच्चाई तो यही है ,कहाँ से उसे पैसे देती? आखिरकार अंतिम में भगवान ने तुम्हारे पास भेज दिया हँसने के लिए कहकर खिलखिलाकर हँस पड़ी थी सुदेवी मैया…।
उनकी खिलखिलाहट वैसी थी जैसी हरी-हरी दूब पर ओस की चमकती बूंदें , जैसी मंदिर की बजती मधुर घंटियाँ…जैसी मस्जिद की अजान…मैंने एक बार फिर सिर को ऊपर की ओर उठाकर इस खिलखिलाहट को सुनाने के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा किया।
जब मैं वृन्दावन से पटना वापस आ रही थी.. वे अपनी खाट पर बैठी थीं। मैं उनको प्रणाम करके उनके कमरे से निकल ही रही थी, तभी पीछे से किसी की पदचाप सुनाई दी। पीछे मुड़कर देखा तो सामने सुदेवी मैया थी। पैर घसीटती हुई, बैठी-बैठी ही आगे बढ़ रही थीं। उनके हाथ ऊपर उठे हुए थे जिसमें मिटटी की एक छोटी सी सुराही थी। उन्होंने चिल्लाकर कहा – इंदु गर्मी का महीना है,देखो दिन कितना तप रहा है प्लास्टिक की बोतल में पानी गर्म हो जाएगा मेरी छोटी सी सुराही लेती जा! मेरी आँखें नम हो गई यह सोचकर कि इस नवनीत हृदय मैया को कठोरता का आवरण ओढ़ने में कितनी तकलीफ हुई होगी।
साल में मैं तीन बार वृन्दावन जाती थी।सावन और होली में तो छोटी अवधि तक रूकती थी, कार्तिक में पूरे एक महीने गुजारती थी उनके साथ। कितना इन्तजार रहता था उन्हें… मेरे आने का..यह तो मुझे पता था, पर इतना अधिक रहता था यह तो सोच भी नहीं सकती थी। प्रेम की इतनी गहराई का एहसास मेरे अंदर कहाँ था..जो समझ पाती !
तभी तो जब मैं पटना से वृन्दावन पहुँची, तोरात्रि के आठ बज रहे थे। सुदेवी मैया रात्रि का भोजन करके लेट चुकी थीं..जब मैं उनके बेड के पास पहुँचीतो उन्होंने मुझे नहीं देखा। एक तो मच्छरदानी लगी थी, दूसरी शायद उनकी आँखें भी बंद थीं। मैं प्रणाम करके मुड़ गई यह सोचकर कि कल मिलूँगीं।
कौन.? आहट सुनकर वे बोली।
मैं..मैंने धीरे कहा था।
सुदेवी मैया अपनी मच्छरदानी को पीछे खींचकर आगे बढ़कर बैठ गई। अपनी आँखें मींचती हुई मुझे गौर से पहचानने की कोशिश कर रही थीं। पर जीरो पावर की रोशनी में देखने में कठिनाई हो रही थी.. तब तक उनकी सेवा में रहने वाली शबरी माँ ने मरकरी जला दी।
- तुम…उनकी आँखें खुली की खुली रह गई थीं..चेहरे पर प्रसन्नता नर्तन कर रही थी, और वे इतनी अधिक एक्साइटेड हो गईं, कि अपने शरीर को नियंत्रित करने के लिए एक क्षण बिछावन पर लेट जा रही थी, और दूसरे ही क्षण उठकर बैठ जाती थी। इस तरह कमसे कम चार-पाँच बार किया। तब जाकर उनका मन और शरीर स्थिर हुआ। उन्होंने काँपती आवाज में कहा, “जब तुम यहाँ से जाती हो, विश्वास नहीं होता कि अब तुमसे मुलाकात होगी। क्या पता अगली बार जब आओ मैं रहूँ या ना। वे रो रहीं थीं। मुझसे लिपटी हुई थीं और उनके आँसुओं से मेरे बाल भींग रहे थे। थोड़ी देर बाद जब वे शांत हुईं तो अफसोस भरे स्वर में वहाँ पर खड़ी शबरी माँ से कहा,“ आपलोगों में से किसी ने नहीं बताया कि इंदिरा आने वाली है। पहले से जानती रहती, तो तीन-चार दिन पूर्व से ही खुश रहती। शबरी मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? सेवा करना पड़ता है इसीसे गुस्साई रहती होगी मुझसे इसी से तो बदला ले लिया न। बुढ़िया थोड़ा खुश हो जाती, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता?
वही सुदेवी मैया जब अपनी मृत्यु का प्लान बना रहीं थीं,मैंने हँसते हुए पूछा था,“ आज एकादशी है, आज आप नहीं मरेंगी यह पक्का है पर एकादशी को नहीं मरने का क्या पेंच है?
’मरने के दिन कांधा महोत्सव होता है न, उसमें पूआ प्रसाद बनता हैएकादशी के दिन महात्माओं का उपवास रहेगा तो कोई मेरे काँधा महोत्सव में पुआ पाएँगे नहीं। पेट काटकर दो पैसे बचाकर रखी हूँ ताकि काँधा महोत्सव में महात्मा प्रसाद ग्रहण कर सकें..। कैसी करूण याचना थी।
हे भगवान…! मैंने सिर पर हाथ ठोंका, कैसे गहरे संस्कार पड़े हैं इनके अंदर, जिंदगी भर जिन महात्माओं ने इन्हें सिर्फ स्त्री होने के कारण हीन माना, और आज भी मान रहे हैं। साधु की विधिवत दीक्षा लेने के बाद भी, संन्यास ग्रहण के बाद भी, साधुओं ने इन्हें पुरुष साधुओं के समकक्ष मानकर अपनी जमात में शामिल नहीं किया। कितनी ही बार इन्होंने दुत्कार सहा है , तो कितनी ही बार अपने शरीर की पवित्रता को बचाने के लिए संघर्ष भी किया है । कितनी ही बार काली की तरह प्रचंड रूप भी अख्तियार किया तो कितनी ही बार… इस समाज से अपने को बिल्कुल अलग-थलग कर लिया।
लेकिन आज उनकी आँखो में प्रबल लालसा दिखाई पड़ रही थी, कम से कम मरने के दिन ही सही, काँधा महोत्सव में शरीक होकर महात्माओं की टोली इन्हें अपनी जमात में शामिल कर ले। तभी तो उन साधुओं की टोली में शामिल होने की कल्पना से इनकी आँखें इतनी चमक रही थीं।
मुझे क्या पता था,उनकी चाहत इतनी जल्दी ईश्वर पूरी कर देगा, उन्होंने मुझे अपयश नहीं होने दिया। आश्विन महीने में ही अपने प्रियतम के पास चली गईं। सुदेवी मैया की मृत्यु की खबर सुनकर ढेर सारे महात्मा हरि-बोल… हरिबोल गाते बजाते ढोल ,हारमोनियम, झाल-मंजीरे के साथ उनकी ठठरी के सामने इकठ्ठे हो गये ।
सुदेवी मैया पूर्ण समाधि में चली गई थीं. योगनिद्रा में…परम शांत हो गई थीं। उनकी आँखें बंद थीं।वे कुछ भी देखने की स्थिति में नहीं थीं। मैं नहीं जानती कि उनके शरीर से निकली आत्मा क्या देख पा रही थी,पर यदि देख रही होगी तो क्या सुदेवी मैया खुश हो रहीं होगी इन साधुओं को हर्षोल्लास मनाते देखकर…?
मेरी माँ का चेहरा भी खिल गया था। हरि बोल हरि बोल की तुमुल ध्वनि सुनकर.| उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा, – क्या जरूरत है घर-परिवार की? क्या जरूरत है अपने बंधु-बांधवों की और समाज की…? देखो तो इन लोगों को, कितने प्रेम से अर्थी बना रहे हैं…।
नहीं रोक पाई अपने आपको, बोल ही पड़ी – माँ, जो समाज प्रेम से अर्थी बनाता है वह प्रेम से जीने क्यों नहीं देता?
उन महात्माओं की ओर देखा,कितनी हलचल मचा रहे थे, सुदेवी मैया को यमुना में प्रवाहित करने के लिए। मैंने जब टोका उन्हें – इस तरह हाथ पैर बाँधकर यमुना में फेंक देना, न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि दण्डनीय अपराध भी है, पर वे लोग कहाँ से सुनते, अतिउत्साह में जो थे । हलचल बढ़ती ही जा रही थी। एक तरफ उन्हें यमुना के घाट पर ले जाने की हलचल थी, तो दूसरी ओर घाट से लौटने के बाद काँधा महोत्सव में भोग लगाने के लिए पुआ बनाने की तैयारी करने की भी हड़बड़ी थी। हर कोई हलचल में था बस एक सुदेवी मैया के चेहरे पर शाँति नहीं – चिर शाँति – विराजमान थी।
मेरी भीगीं आँखें बरस गई। महात्मा सीताराम दास हँसते हुए मुझ रोती हुई मूर्खा को समझाने लगे – ’बहन, यही जीवन है।’
मन हुआ जोर से चिल्लाऊँ – यदि सिर्फ यही जीवन है तो वो नब्बे साल क्या था , जिस जीवन को वे भोग रही थीं? एक-एक पल को उन्होंने किस तरह काटा है, एक पल जीती रहीं और दूसरे पल मरती रहीं,वो क्या था? ग्यारह साल की एक मासूम लड़की को विधवा बनने का पाप और अपराध को अपने सिर पर रखे सलीब को घसीटते हुए जीना पड़ा। यदि सिर्फ मरना ही जिन्दगी है तो क्यों नहीं यह ज्ञान आप लोगों को अपने शरीर के लिए होता है…?
पर मैं चुप रही,कुछ भी बोलकर सुदेवी मैया की महायात्रा में क्या विघ्न विक्षेप डालती? हर्षित होकर ऊँचे स्वर में महात्माओं ने आवाज दी हरि बोल… और दुबली पतली क्षीण काया वाली बच्चों सी हल्की सुदेवी मैया की अर्थी अपने कंधे पर उठाकर चल दिए…।
माँ लपक कर मेरे पास आईं – तुम नहीं चलोगी उन्हें यमुना में प्रवाहित करने? सुदेवी मैया शोक मनाने योग्य नहीं हैं, भाग्यवती हैं। देखो कितने लोग आए हैं उनकी अंतिम यात्रा में..जल्दी चलो सभी निकल गए। माँ के पैरों में तकलीफ थी, पर उसकी परवाह नहीं करके चल पड़ीं उस भीड़ के साथ, भाग्यवती सुदेवी मैया की अंतिम यात्रा में..।
मैं नहीं गई,वहीं खड़ी-खड़ी सुदेवी मैया से माफी मांग ली। मन में हजार सवाल उठ रहे थे – मैया, अबतक कहाँ थे ये लोग..जिन लोगों ने आपकी जिन्दगी को नरक बना दिया वही लोग आज आपकी अंतिम यात्रा में शामिल हो गए, तो आप भाग्यवती कैसे हों गईं..?
क्या आप भी इनके आने से अपने को भाग्यवती समझ रही हैं…? मैं असमंजस में हूँ। मुझे नहीं पता आप क्या चाहती हैं,और मुझे यह भी नहीं पता, कि मैं अपने आवेश और क्रोध को काबू में रख सकूँगी या नहीं…? मेरे मुँह से कुछ निकल गया, और मेरे कारण आप अपनी अंतिम यात्रा में दुखी हो जाएँ, मैं ऐसा नहीं चाहती हूँ।
मैं सूनी आँखों से उनकी सूनी खाट निहार रही थी.। दूर से उल्लसित ध्वनि सुनाई पड़ रही थी – हरि बोल,हरि बोल । मैंने भी ’हरिबोल’ की उस आवाज में अपनी आवाज को मिलाना चाहा, परंतु कंठ ने साथ नहीं दिया, आँखों से प्रवाहित अविरल अश्रु धारा ने गले को अवरूद्ध कर दिया था।
डॉ. सुजाता चौधरी,भागलपुर,बिहार
मो.9431871677


