ज़िन्दगी की शाम हो गयी मगर.. यादों का उजाला है \ विशेष लेख - rashtrmat.com

ज़िन्दगी की शाम हो गयी मगर.. यादों का उजाला है \ विशेष लेख

चन्द्रवती शुक्ला बता रही है,समकालीन उर्दू शायरी में बशीर बद्र एक ऐसे जगमगाते हुए नक्षत्र का नाम है, जिसने ग़ज़ल को आत्मसात करके उसे एक नयी दीप्ति और आभा प्रदान की है।

        ज़िन्दगी की शाम हो गयी मगर.. यादों का उजाला है \ विशेष लेख

चन्द्रवती शुक्ला

डॉक्टर बशीर ब्रद अपनी यादों का उजाला जो छोड़कर गए है,वो सदियों तक हिन्दी और उर्दू पाठकों के साथ रहेंगे। उनकी उजालों की परियां हर मंच पर हर गोष्ठी में अपने होने का एहसास दिलाती रहेंगी। वो एक ऐसे शायर थे जिनके शेर ट्रकों पर लिखे मिलते हैं,लोगों की डायरी में और संसद में कहे जाते हैं। लोग उनके लिखे एक शेर कहकर अपनी सारी बात कह देते थे। 91 बरस का यह शायर केवल महफिल की ही जान नहीं हुआ करता था बल्कि हर हिन्दुस्तानी की आवाज था।उनकी लिखी गजल ड्राइंग रूम से निकल कर आम आदमी की आवाज बन गया।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए

जैसे अनेक कालजयी शे’रों के रचयिता बशीर बद्र अपनी निजी शैली और ज़बान की सादगी के कारण हिन्दी जगत में भी बेहद लोकप्रिय और सम्मानित हैं।समकालीन उर्दू शायरी में बशीर बद्र एक ऐसे जगमगाते हुए नक्षत्र का नाम है, जिसने ग़ज़ल को आत्मसात करके उसे एक नयी दीप्ति और आभा प्रदान की है।

प्रेम जैसे शाश्वत विषय को अपनी ग़ज़लों का केन्द्रीय कथ्य बनाने वाले बशीर बद्र ऐसा नहीं कि अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों के प्रति जागरूक न हों। सामाजिक विसंगतियों ने उन्हें जब-जब आहत किया है, तब-तब उन्होंने प्रेम से इतर अनुभूतियों को भी अपने शे’रों में ढाला है और उसे काव्यात्मकता प्रदान की है-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

जिस सामाजिक, राजनीतिक चेतना की अपेक्षा एक कलाकार से की जाती है, उसे बशीर बद्र बेशक पूरा न करते हों लेकिन स्वार्थ और घृणा की आँधियों के वातावरण में प्रेम और मोहब्बत के जिन चिरागों को वे प्रज्जवलित किये हुए हैं, वह कोई आसान काम नहीं है। उनके जलाये हुए शे’रों के चिराग् लोगों की अँधेरी राहों में रोशनी किये हुए हैं और ऐसे बहुत से लोग हैं, जो नहीं जानते कि ये चिराग बशीर बद्र के जलाये हुए हैं। ये ख्याति की चरमसीमा है कि कोई बशीर बद्र ही से पूछे उजाले अपनी यादों के… ये शे’र किसका है, जवाब नहीं।

सर झुकाओगे, तो पत्थर देवता हो जायेगा

इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जायेगा

नज़र से गुफ़्तगू, ख़ामोश लब तुम्हारी तरह

ग़ज़ल ने सीखे हैं अन्दाज़ सब तुम्हारी तरह

अगर किसी को दस शे’र याद हैं, तो यकीन मानिए कि उनमें से कम से कम पाँच शे’र बशीर बद्र के होंगे। ऐसी जनप्रियता सदियों में कभी-कभी किसी-किसी को ही नसीब होती है।

बशीर बद्र अपने समकालीनों में शायद किसी से अपनी प्रतिद्वंद्विता नहीं मानते। उनका सीधा मुकाबला मीर और गालिब से होता है। उनका कहना है कि शे’र में एक शब्द भी अगर मुश्किल हो तो शे’र दो कौडी का। इस संकलन के सम्बंध में मेरी जब उनसे फोन पर बात हुई तो बोले-आप बेदर्दी से मेरे उन शे’रों को काट दीजिए, जिनमें एक शब्द भी मुश्किल हो। अपने पहले संग्रह ‘इकाई’ की अधिकांश ग़ज़लों को वे खारिज करते हैं। हिन्दी कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने कभी लिखा था-जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख और उसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। मुझे नहीं पता हिन्दी में कितने लोगों ने उनकी बात सुनी, लेकिन बशीर बद्र शायद शुरू से ही इस बात का ध्यान रखते आये हैं। इसीलिए उनके शे’र जनसाधारण की जुबान पर चढ़े हुए हैं।

किसी की राह में चौखट पे दिये मत रक्खो

किवाड़ सूखी हुई लकड़ियों के होते हैं।

बाद में उन्होंने पहली पंक्ति को ‘किसी की राह में दहलीज पर दिये न रखो’ करके छपवाया।  उनके पाँच उर्दू संग्रहों इकाई, इमेज, आमद, आसमान और आस से इस संकलन की गजलों का चयन किया गया है। यद्यपि हिन्दी में उनके अनेक संकलन आ चुके हैं। समग्र भी छप चुका है। फिर भी इस संकलन की अपनी विशिष्टताएँ हैं। जिसे पाठक स्वयं अनुभव करेंगे।

डॉक्टर बशीर ‘बद्र’ एक ऐसे शाइर हैं, जिन्होंने अनेक मज़बूत चट्टानों के बीच से अपनी एक अलग राह निकाली है, जिसका सुबूत उनकी शाइरी में मिलता है। उनकी ग़ज़लों से उठती मिट्टी की सोंधी गन्ध आज आम आदमी की सांसों में रच-बस गयी है। यही कारण है कि उनका नाम आज उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां बड़े से बड़ा शाइर भी मुश्किल से ही पहुंच पाता है। अब तक उन्होंने लगभग हज़ार-बारह सौ गज़लें कही हैं, जो इतनी लाजवाब हैं कि एक बार पढ़ने के बाद उन्हें बार-बार पढ़ने को दिल चाहता है और हर बार उनका एक नया ही भावार्थ सामने आता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि मौजूदा दौर में वाकई कोई ग़ज़ल का शाइर है, तो वह डॉक्टर बशीर ‘बद्र’ ही हैं। अगर आपने उनको अभी तक कभी नहीं पढ़ा, तो नमूने के तौर पर उनके कुछ अश्आर प्रस्तुत हैं-

थके थके पेडल के बीच चले सूरज

घर की तरफ लौटी दफ्तर की शाम।

वो जाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है,

कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये

हिन्दी की ग़ज़ल की परम्परा में, जो उर्दू से ही आई है, डॉ. बशीर बद्र का स्थान मीर तक़ी मीर की विरासत है। यों तो आज ग़ज़ल को हिन्दी और उर्दू के दायरे में देखना ही अनुचित है, क्योंकि सांस्कृतिक आदान-प्रदान के युग में मात्र लैपिकीय प्रयोग के प्रति यह दृष्टिकोण संकीर्ण और अप्रासंगिक ही है। भाषाओं के सम्मिश्रण से जब भाषिक विकास होता है, तो यह सम्मिश्रण केवल शब्दों का ही नहीं, वरन् उन भाषाओं के पीछे की समूची सांस्कृतिक अवधारणाओं का होता है। इस प्रक्रिया में एक भाषा दूसरी भाषा के नजदीक, केवल अपना स्थूल शब्दकोष लेकर नहीं आती, बल्कि एक पूरी की पूरी दुनिया अपने साथ लेकर आती है। उर्दू का हिन्दी में प्रवेश कोई आकस्मिक घटना नहीं है, यह भारत में स्वातंत्र्योत्तर काल में विकसित हुई एक संस्कृति की कथा है। कठिनाई यह है कि हम जिस तरह खड़ी बोली की कविता-यात्रा में उर्दू अदब के किंचित प्रभाव को भी विचार में नहीं लेते, उसी तरह हिन्दी गजल की प्रकृति का फैसला करते वक़्त पूरी गम्भीरता से दुष्यन्त कुमार के पीछे भी नहीं जाना चाहते। आज आम बोलचाल में उर्दू अंग्रेजी का प्रयोग अबोध विधि व निष्कपट भाव से कुछ इस प्रकार हो रहा है, कि इन भाषाओं के अनेकों शब्द अपनी सत्ता को पीछे छोड़कर हिन्दी से एकात्म हो गये हैं. दरअसल इसी प्रक्रिया के चलते ही कविता की भाषा और बोलचाल में भाषा के कम्पार्टमेंट भी टूटते हैं। अपनी आन्तरिक जरूरत के तहत् रचना को बोलचाल के जिस शब्द की जरूरत होती है, वह उसे निस्संकोच अपना लेती है। अपनी कथित चरित्रगत स्वच्छता बनाये रखने और भाषा की मूल सत्ता खो जाने के भय से वह अभिव्यंजना को अधूरा नहीं छोड़ती। यही हिन्दी के बड़े कवियों ने किया है और मीर तकी मीर और कुछ उर्दू शायरों ने, जिनमें डॉ. बशीर बद्र का नाम सबसे ऊपर लिया जाना जरूरी है। डॉ. साहब ने इस सिलसिले में अंग्रेजी से भी कोई परहेज नहीं किया है। उन्होंने पहली बार उन अंग्रेजी शब्दों को गजल बनाया, जो हमारी भाषा का हिस्सा हो गये थे। उनके पहले गजल में ये करतब सोचा भी नहीं जा सकता था। कुछ उदाहरण देखिए_

कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से

ये नये मिजाज का शहर है, जरा फासिले से मिला करो

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ

ये ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ, न सुना हुआ

मकां से क्या मुझे लेना, मकां तुमको मुबारक हो

मगर ये घास वाला रेशमी क़ालीन मेरा है

किसने जलायीं बस्तियां, बाज़ार क्यों लुटे

मैं चांद पे गया था, मुझे कुछ पता नहीं

चन्द्रवती शुक्ला,प्रयागराज,यूपी

मो. 9300244876

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