पोखर का पानी\ कहानी - rashtrmat.com

पोखर का पानी\ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी पोखर का पानी” हिंदी कहानी साहित्य की उन कहानियों में आती है जो साधारण ग्रामीण जीवन के माध्यम से गहरी सामाजिक सच्चाई सामने रखती हैं। यह कहानी यह ग्रामीण जीवन की उसी संवेदना से प्रेरित है जो फणीश्वर नाथ रेणु की प्रसिद्ध कृति मैला आंचल में दिखाई देती है। यह कहानी सिर्फ पोखर (तालाब) की नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता की कहानी है।“पोखर का पानी” बताती है कि समाज को गंदा पानी नहीं, गंदी सोच बनाती है।

    पोखर का पानी\ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’

बरसों पहले की बात है।गाँव बरईपुर बड़ा साधारण-सा गाँव था,कच्ची गलियाँ,खपरैल की छतें,और बीच में एक पुराना पोखरा। पोखरा मानो गाँव की साँस था।सुबह होते ही औरतें घड़ों के साथ वहाँ आतीं, मवेशी पानी पीते, बच्चे किनारे खेलते और शाम को बूढ़े लोग पीपल के नीचे बैठकर गपशप करते।

पोखरे का पानी पूरे गाँव के काम आता था। गाँव की असली जान वही पोखरा था।उसी पानी से मवेशी प्यास बुझाते थे, उसी से खेतों की मेड़ें सींची जाती थीं और गर्मियों में वही पानी पूरे गाँव की राहत बन जाता था। पोखरे के किनारे अक्सर एक दुबला-पतला बूढ़ा बैठा दिखाई देता था,लालू काका।काका का असली नाम शायद ही किसी को याद हो। सब उन्हें लालू काका ही कहते थे।उनके पास कोई पद नहीं था, पर पोखरे की रखवाली वही करते थे। कोई उन्हें चौकीदार नहीं कहता था,गांव वाले उनकी बड़ी इज्जत करते थे। क्यों की उन्ही की वजह से गाँव वालों को साफ पानी पोखरा का मिलता था। गाँव वालों को पानी के लिए दूर नहीं जाना पड़ता था। सब जानते थे कि अगर पोखरे में कोई गंदगी करेगा तो सबसे पहले लालू काका की आवाज़ गूँजेगी

“अरे ओ बबुआ, पानी सबके काम का है, इसे मैला मत करो!”

लालू काका खुद बहुत गरीब थे।छोटी-सी झोपड़ी, दो बकरियाँ और एक पुरानी लाठी  बस यही उनकी दुनिया थी।गाँव के बच्चे अक्सर उन्हें चिढ़ाते,“काका,पोखरा तो सरकार का है, तुम क्यों पहरा देते हो?”

लालू काका हँसते हुए कहते,“सरकार का होगा, पर पानी तो गाँव का है न!”

गाँव में एक आदमी और था,गजाधर साहू।कुछ साल शहर में व्यापार करने के बाद वह गाँव लौटा था।जेब में पैसा था,बात करने का ढंग भी शहर जैसा हो गया था।

एक दिन दोपहर में गाँव के पीपल के पेड़ के नीचे पंचायत जैसी बैठक लगी थी।

गजाधर साहू शहर से लौटकर अब बड़े ठाट से रहता था। नई घड़ी, चमचमाता जूता, और बोलने का अंदाज़ भी शहर जैसा।

उसने खड़े होकर कहा,“देखिए भाई लोगों, पोखरे के पास जो खाली ज़मीन है, वहाँ अगर मेरा गोदाम बन जाए तो गाँव का ही फायदा है।धान, गेहूँ, मक्का सब यहीं रखे जाएंगे। किसान को शहर नहीं जाना पड़ेगा।”

कुछ लोग सिर हिलाने लगे।तभी भीड़ के पीछे से लाठी टेकते हुए लालू काका आगे आए।उन्होंने धीमे पर ठोस स्वर में कहा,“साहू बाबू, फायदा किसका होगा ज़रा यह भी बता दीजिए।”

गजाधर हँस पड़ा,“अरे काका, सबका फायदा होगा।”

लालू काका ने पोखरे की ओर इशारा किया,“यह पोखरा देख रहे हैं? बरसात का आधा पानी उधर खेतों से बहकर यहीं आता है। अगर गोदाम की दीवार खड़ी हो गई तो पानी का रास्ता रुक जाएगा।”

भीड़ में खड़े किसान रामदेव बोले,“तो क्या होगा काका?”

लालू काका ने मिट्टी उठाकर हाथ में मसलते हुए कहा,“पहले पोखरा आधा सूखेगा। फिर गर्मी में खेतों को पानी नहीं मिलेगा।और जब पानी नहीं रहेगा तो फसल कैसी होगी?”

गजाधर साहू थोड़ा झुँझलाया,“अरे काका, आप तो बस डराते रहते हैं। आजकल जमाना बदल गया है। गोदाम होगा तो किसान अपना अनाज सुरक्षित रख पाएगा।”

लालू काका मुस्कुराए,“सुरक्षित किसका अनाज रहेगा बाबू? किसान का या व्यापारी का?”

लेकिन गजाधर ने बात टाल दी,“काका, आप पुरानी सोच के आदमी हैं। अब गाँव को भी आगे बढ़ना चाहिए।”

भीड़ में हल्की खुसर-पुसर होने लगी।लालू काका बोले,“आज किसान अपना धान सीधे बेच देता है।कल गोदाम बनेगा तो साहू बाबू धान सस्ता खरीदकर यहीं रखेंगे,फिर शहर में महँगा बेचेंगे।”

रामदेव किसान ने सिर खुजाते हुए पूछा,“तो हमारा फायदा?”

लालू काका ने साफ कहा,“फायदा बस इतना कि खेत सूखेंगे, पानी घटेगा और हम अपने ही धान को महँगा खरीदेंगे।”

कुछ देर के लिए पूरा माहौल शांत हो गया।गजाधर साहू ने बात सँभालते हुए कहा,“काका, आप पुराने जमाने के आदमी हैं। विकास रोकना ठीक नहीं।”

लालू काका ने लाठी जमीन में टिकाई और बोले,“विकास वही अच्छा होता है बाबू, जिसमें गाँव जिए।अगर पोखरा मर गया तो समझिए गाँव की आधी साँस बंद हो जाएगी।”

पीपल के पत्ते हवा में सरसराने लगे।गाँव वाले चुप थे,पर उस दिन पहली बार कई लोगों को लगा कि गोदाम का फायदा उतना सीधा नहीं जितना गजाधर साहू बता रहे थे।

गोदाम की नींव पड़ने से एक दिन पहले गाँव के चबूतरे पर फिर भीड़ जमा थी।कुछ मजदूर ईंटें उतार रहे थे।गजाधर साहू हाथ में नक्शा लिए खड़ा था।“देखिए,यह दीवार यहाँ से जाएगीऔर यह पूरा हिस्सा गोदाम का होगा। बरसों तक काम आएगा।”

पास खड़े किसान भोला ने पूछा,“साहू जी, अगर पानी इधर से आया तो?”

गजाधर ने लापरवाही से कहा,“अरे, पानी तो रास्ता ढूँढ़ ही लेता है।”

तभी लाठी टेकते हुए लालू काका आ पहुँचे।उन्होंने जमीन की तरफ इशारा किया,

“पानी रास्ता ढूँढ़ता है, पर जब आदमी रास्ता बंद कर दे तो पानी क्या करेगा?”

गजाधर मुस्कुराया,“काका, आप फिर वही शुरू हो गए।”

लालू काका बोले,“सुनो सब लोग,यह पोखरा सिर्फ पानी का गड्ढा नहीं है।यह खेतों की प्यास बुझाता है, मवेशियों की जान बचाता है, और गाँव की बरकत है।”

भीड़ शांत हो गई।काका ने धीरे-धीरे कहा,“आज गोदाम बनेगा,कल पोखरा सूखेगा,

परसों खेत प्यासे रहेंगे,और चौथे साल किसान अपना खेत बेचने को मजबूर होगा।”

भोला किसान की आँखें फैल गईं,“इतना बड़ा नुकसान?”

लालू काका ने सिर हिलाया,“नुकसान धीरे-धीरे आता है बेटा,पहले पानी जाता है, फिर खेती जाती है, और आखिर में गाँव की रौनक चली जाती है।”

गजाधर साहू ने बात खत्म करते हुए कहा,“बस-बस, बहुत हो गया। काम शुरू करो!”

मजदूरों ने ईंटें जमानी शुरू कर दीं।लालू काका पोखरे की तरफ देखते रहे,जैसे किसी अपने को बीमार होते देख रहे हों।

एक साल बाद वही हुआ जिसका डर था।बरसात में पानी गोदाम की दीवार से टकराकर इधर-उधर फैल गया, पर पोखरे में पहले जैसा पानी नहीं भर पाया।गर्मी आई तो पोखरा आधा सूख गया।गाँव की औरतें दूर के कुएँ से पानी लाने लगीं।मवेशी प्यासे रहने लगे।

लोगों को धीरे-धीरे लालू काका की बातें याद आने लगीं।लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

इसी बीच एक सुबह खबर फैली,“लालू काका नहीं रहे।गाँव वाले जब उनकी झोपड़ी पहुँचे तो देखा,काका की चारपाई के पास वही पुरानी लाठी रखी थी।और चारपाई के सिरहाने एक पुरानी कॉपी पड़ी थी।

कॉपी में काका ने टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था,“अगर कभी पोखरा सूखने लगे,तो गोदाम की दीवार का एक हिस्सा तोड़ देना।पानी को रास्ता मिल जाएगा।”

यह पढ़ते ही कई लोगों की आँखें भर आईं। बूढ़े मुखिया ने धीरे से कहा,“लालू काका चले गए,पर जाते-जाते गाँव को बचाने का रास्ता बता गए।”

पोखरे के किनारे अब एक छोटा-सा पत्थर लगा है।उस पर लिखा है,“गाँव की असली दौलत उसका पानी है।”

पंचायत ने जब तय किया कि बरसात से पहले गोदाम की दीवार का एक हिस्सा तोड़ दिया जाएगा ताकि पोखरे का पानी फिर से भर सके।

यह खबर गजाधर साहू तक पहुँची तो वह आग-बबूला हो गया।वह  उसी शाम थाने जाकर दरोगा से कहा,“दरोगा जी, गाँव वाले मिलकर मेरा गोदाम तोड़ना चाहते हैं। लाखों का नुकसान कर देंगे।”

दरोगा कुर्सी पर पान चबाते हुए बोला,“अच्छा! ऐसा है क्या?”

गजाधर साहू ने धीरे से एक लिफाफा मेज पर सरका दिया। दिया।अगले ही दिन पुलिस की जीप गाँव में आ गई।दरोगा ने लाठी घुमाते हुए कहा,“सुन लो सब लोग,जिसने भी गोदाम की दीवार तोड़ी, सीधे जेल जाएगा।”

भीड़ में खड़े किसान भोला ने हिम्मत करके कहा,“दरोगा जी, पानी का रास्ता बंद हो गया है,खेत सूख रहे हैं।”

दरोगा ने डाँट दिया,“बहुत कानून मत सिखाओ!गोदाम साहू जी की जमीन पर बना है। जिसने दीवार तोड़ी, वही अंदर जाएगा।”

गाँव में सन्नाटा छा गया।उस रात पीपल के नीचे गाँव की बैठक हुई।

भोला किसान बोला,“अगर पुलिस दीवार नहीं तोड़ने दे रही तो अब क्या करें?”

कुछ देर चुप्पी रही।

फिर बूढ़े मुखिया ने कहा,“गाँव की बात गाँव में दब जाएगी।चलो शहर चलते हैं,कलेक्टर को बताते हैं।”

भोला किसान ने तुरंत कहा,“हाँ, हम सब चलेंगे।”

अगली सुबह आधा गाँव बैलगाड़ियों में भरकर शहर की ओर निकल पड़ा।कलेक्ट्रेट के सामने गाँव वालों की भीड़ देखकर लोग चौंक गए।नारे लग रहे थे,“पोखरे का पानी वापस दो!“किसानों के खेत बचाओ!”

कलेक्टर ने प्रतिनिधियों को बुलाया।रामदेव किसान ने हाथ जोड़कर कहा,“साहब, गोदाम की दीवार से पोखरे में पानी नहीं जा रहा।खेत सूख रहे हैं।”

भोला ने जोड़ते हुए कहा,“हमने पंचायत में दीवार का हिस्सा तोड़ने का फैसला किया था, पर साहू जी पुलिस बुला लाए।”

कलेक्टर कुछ देर चुप रहे।फिर उन्होंने अपने अफसर से कहा,“तुरंत जांच राइए।देखिए यह गोदाम कहीं जल निकासी के रास्ते पर तो नहीं बना है।अगर नियम के विरुद्ध बना है तो दीवार हटवा दी जाए।”

बाहर खड़े गाँव वालों तक जब यह खबर पहुँची तो उनमें उम्मीद की हल्की रोशनी जग गई। कुछ ही दिनों में सरकारी टीम गाँव पहुँची।नक्शे देखे गए, जमीन नापी गई।और तब पता चला,गोदाम सचमुच बरसाती पानी के पुराने रास्ते पर खड़ा था। सरकारी आदेश आया,“दीवार का हिस्सा हटाया जाए।”

गाँव के लोगों को उस दिन पहली बार लगा कि लालू काका की दूर की सोच सच साबित हो रही है।जब मजदूरों ने दीवार तोड़ी और बरसात का पानी फिर पोखरे में भरने लगा, तो गाँव वाले देर तक उसे देखते रहे। उसी शाम खबर आई,लालू काका नहीं रहे।गाँव वाले उनकी झोपड़ी पहुँचे।चारपाई के पास उनकी पुरानी लाठी पड़ी थी।और सिरहाने एक पुरानी कॉपी।कॉपी में टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था,“अगर कभी पोखरा सूखने लगे तो पानी का रास्ता खोल देना।पानी रुका तो गाँव भी रुक जाएगा।”

पोखरे के किनारे आज एक छोटा-सा पत्थर लगा है।उस पर लिखा है,“पानी सबका है, इसे मैला मत करो।”और गाँव वाले जब भी उस पोखरे का भरा पानी देखते हैं, उन्हें लगता है,लालू काका अभी भी वहीं बैठे पहरा दे रहे हैं।

रमेश कुमार ‘रिपु’

MO-7974304532