लाठी \कहानी - rashtrmat.com

  लाठी \कहानी

 परदेसी राम वर्मा की लाठी  कहानी  कच्चा बारूद है । सामाजिक व्यंग्य, सत्ता का दंभ, जाति-धर्म की राजनीति और भीड़ के न्याय का दर्द। विषय बेहद सामयिक है और ग्रामीण परिदृश्य में रखकर इसे और प्रभावशाली बना दिया है।यह कहानी सिर्फ घटना नहीं है ,यह सत्ता बनाम दोस्ती, धर्म बनाम इंसानियत, और भीड़ बनाम सच की कहानी है।

                                                                    लाठी \कहानी

परदेशीराम वर्मा

ये भइया, ये इलाहाबादी लाठी है । छूना नहीं । बहुत मेहनत से तैयार की गई है यह लाठी । घी पिलाई हुई है । धुँए की सिंकाई हुई है । तब जाकर इस रूआब में आयी है लाठी । मूँछों को उमेठते हुए कैलाश इलाहाबादी दिन में कई बार यह रहस्य खोलते ।

अगर कोई पूछ बैठता कि खासियत क्या है लाठी में, तो तुरन्त उत्तर पा जाता -हैं अब न पूछे हो मजे का सवाल । अरे खासियत तो भाई जान चलने पर बताती है लाठी । यहाँ तो तीन महीने से चलबे नहीं कर रही है । आपको खासियत का क्या अन्दाज होगा जी । चलेगी तब न बुझियेगा । और देखिए खासियतें खासियत तो है । पहले थी सुफैद फिर कुछ सँवला गयी धुवें से तपतपाकर और सध-बधकर अब जाकर निकल आयी लाल । ऊपर से नीचे तक ललिया गयी है लाठी । जित देखूँ तित लाल । है न मजे की चीज ।

पूछनेवाला पूछता भी है इसी अदा की खातिर ।

कैलाश रायपुर से इस गाँव में आये हैं । बड़े दाऊ के मुलाजिम बनकर । इलाहाबाद के हैं । इलाहाबाद से अपने चचेरे भाई के पास रायपुर आये और रायपुर से यहाँ ।

दाऊ अपने विरोधियों को हमेशा लठैतों का डर दिखाते हैं । गाँववाले जानते हैं कि रइपुरिया लठैतों से दाऊ की अच्छी जान-पहचान है । आना-जाना है । यारी-दोस्ती है । दाऊ ने कैलाश को परछी में टिकाया । कुछ दिनों के बाद परछी से लगे कमरे में कैलाश का माल-असबाब पहुँच गया ।

कैलाश दाऊ का सण्डा बनकर आया था इसलिए इलाहाबादी लाठी के बिना पल पर भी रह नहीं पाता था । देखने में सामान्य कद-काठी का कैलाश चलता था बहुत रूआब से । मूँछों पर हाथ फेरते हुए मस्त हाथी की चाल । कन्धे पर लाठी, सिर पर पगड़ी, कमर में कटार । गाँव के लोग उसकी धज देखकर सहम जाते ।

दाऊजी कैलाश को केवल छ: माह के लिए गाँव जाये थे । उनका काम छ: माह में पूरा हो जाता ।

इस बार खेती-बाड़ी का टण्टा नहीं था । मामला कुछ हटकर था धेनु-पानी का मामला । दाऊजी चाहते थे कि उनका चरवाहा दिवाली के दिन भी मवेशियों को चराने ले जाये । दूहे बाँधे । नाचना-कूदना अब बन्द कर दें ।

चरवाहा चाहता था कि दिन देवारी में कम-से-कम दो दिन नाचने दिया जाय । चरवाहा अपनी बात पर डटा रहा । दाऊजी तो चाहते ही थे कि तनातनी हो जाये । उन्हें अवसर की तलाश थी । परम्परागत तरीकों से चरवाजी-बरवाही की देनदारी में उन्हें अपना नुकसान दिख रहा था । किसी तरह पिण्ड छुड़ाकर अपना काम बनाना चाहते थे ।

चरवाजा दिवाली के दिन सोहई की तैयारी करता रहा और दाऊजी अपनी योजना में लग गये ।

उन्होंने चरवाहे को निकाल दिया । सब चरवाहे एकजुट हो गये । दाऊजी को दूसरा चरवाहा इलाके में नहीं मिला । कैलाश इलाहाबादी का अवतार इस गाँव में इसीलिए हुआ ।

कैलाश को गाँव में लाकर दाऊ ने इकतरफा जीत का ऐलान कर दिया । उन्होंने कहा कि यहाँ के चहवाहों से बीस ही पड़ेगा कैलाश । नहीं चराया भुखमरों ने तो अच्छा ही हुआ । दूध बचा, धान बचा । दाँते टूटिस, ते मुँहे बनिस ।

कैलाश नया चरवाहा बन गया । चार माह बाद छुट्टा दिन लग जाता । फिर चराने का झंझट नहीं । गर्मियों के महीने में तो मवेशी वैसे ही टहलते हैं । खुले में । चार महीने बाद दूसरा सत्र शुरू होगा । तब देख लिया जायेगा -दाऊ ने कहा ।

कैलाश को समझते देर नहीं लगी ।

वह अपनी जाति नहीं बताना चाहता था । पूछने पर कहता-मुसलमान नहीं हूँ बस । मवेशी तो चरा सकता हूँ । गौ माता की सेवा तो किसन कन्हैया भी किये थे जी, हम भी करता हूँ और क्या । अनर्थ थोड़े ही कर रहा हूँ । आदमी हूँ, हत्यारा नहीं हूँ ।

कैलाश को कोई एक बात पूछता तो वह चार बात फेंक देता । चरवाहे उससे लड़ते नहीं । कैलाश को आश्चर्य होता । वह तो यही सोचकर आया था कि इनसे लड़ना पड़ेगा । मगर ये तो अजीब लोग हैं । अपने में मस्त । बात पर आ गये तो रोजी छोड़ दी । मगर मलाल नहीं । शिकायत नहीं । लगता नहीं कोई अन्तर है ।

एक दिन चराते-चराते कैलाश के पाँव में मोखला काँटा गड़ गया । पड़ोस के चरवाहे भागे-भागे आये । लोचनी से बड़े प्रेम से काँटे को निकाला । पुतली बनाकर सेंकाई हुई । नमक गोद-गोदकर सबने बारी-बारी घाव को सेंका ।

कैलाश दो दिन तक लँगड़ाता रहा । मगर इसी बीच उसके मन का लँगड़ापन ठीक होने लगा ।

चरवाहे दो दिनों तक उसकी सहायता करते रहे ।

कैलाश चरवाहों के मुहल्ले में जाने लगा । छोटे-छोटे खदर के घर । कुरिया डांड़ा । सूखे हाथ-पाँव वाले बच्चे । मरियल औरतें । चारों ओर गरीबी । फिर भी मस्ती ।

इधर दाऊ के यहाँ भारी भरकम भैसें । हुंकारते साँड । गायों की रेहड़ी । ऐंठकर चलते लड़के । थलथलाई गौंटनिन । कोठी-कोठी धान । पत्थर का मकान । दो एकड़ का खलिहान । तालाब के नीचे का पुश्तैनी सैंकड़ों एकड़ खेत । वह दो दिनों तक लँगड़ाता रहा मगर दाऊ ने पूछा तक नहीं । दाऊ से दूरियाँ बढ़ती गयीं । और चरवाहे करीब आते गये । चरवाहे उससे बतकहीं करते । साथ-साथ बाँसगीत गाते । वह पुरबिया झाड़ता, ये ददरिया पर उतर आते ।

दाऊ को भनक लगी । उन्हें बहुत बुरा लगा । उन्होंने एक दिन बुलाकर डाँटा-क्या सुनता हूँ पहलवान ?

– क्या दाऊ !

– यही कि तुम भी यहाँ के हरामखोरों के साथ हँसते-बोलते हो । – तो इसमें आपको घाटा तो नही न हो रहा है ।

– हो क्यों नहीं रहा है । तुम्हें दुगनी कीमत देकर इसलिए नहीं लाया कि तुम उनके साथ घुलो-मिलो । तुम्हारी लाठी में जोर है । इसलिए तुम्हारी कीमत है ।

– सो तो मान गये दाऊ । बाकी बतियाने भर से लाठी का जोर खतम थोड़े ही हो जाता है ।

– समझते हो नहीं । वे साले हमारे बैरी है । उनसे दूर रहो । धौंस से काम लो । अकड़कर रहो ।

कैलाश चुप रहा ।

वह सोचता कि आखिर ऊपरी दिखावा-भर है । भीतर से तो वह भी चरवाहों जैसा है । कैलाश को चरवाहे ही अपने लगते ।

वह दाऊ और चरवाहों के बीच फँसकर रह गया । दाऊ चाहते कि कैलाश चरवाहों से लड़ पड़े । कैलाश को लगता कि वह अपने ही भाइयों के खिलाफ साजिश में शरीक हो रहा है । धीरे-धीरे कैलाश जानने लगा कि दाऊ उससे बलवा करवाना चाहते हैं ।

एक दिन दाऊ ने कहा-कैलाश, रायपुर से चार-छ: आदमी अपने और ले आओ । कुम्हारी से लौटते हुए दस बोतल देसी भी ले आना । आज सालों का सर तोड़ ही दो बहाना बनाकर । पीटो सालों को ।

कैलाश ने विरोध नहीं किया ।

पैसा लेकर रायपुर गया और शाम तक अकेला ही वाप आ गया । घूम-घामकर । उसे यह सब पच नहीं रहा था ।

उसने तय क लिया कि अब गाँव में रहकर भले ही रोजी मजूरी करेगा । सण्डागीरी का चोचला नहीं पालेगा । दूसरे दिन उसने दाऊ से साफ कह दिया ।

दाऊजी बहुत कुनमुनाये । उन्होंने कहा – तुम्हारी इलाहाबादी लाठी में अब जोर नहीं है क्या ?

– है क्यों नहीं । जरूरे है । जोर कहाँ जायेगा ।

– तो यह क्या बक रहे हो । भुखमरों से मेल की बात । वे साले तुम्हारे हो गये । कब से ?

– कब से क्या । हमेशा से । आप दस बीघा हमारे नाम नहीं करवा देंगे । हैं तो हम भी गरीब । आपने उन्हें नाजायाज तरीके से छुड़ाया है । मैं यह सब नहीं करना चाहता । अन्याय है यह ।

– तुम धर्मराज कब से हो गये ?

– यह सब जाने दीजिए । आपको तीन माह की चराई से न मतलब है ।

– कायर हो गये तुम भी न ।

– आगे अब मत बोलिए दाऊ वचन दिया है तो चार माह चरायेंगे । बाद में चल देंगे ।

बात यहीं खतम हो गयी ।

दूसरे दिन कैलाश ने अपना सामान गहिरापारा में कुरिया लेकर रख दिया ।

दाऊजी चुप रहे ।

उन्हें सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि कैलाश इस हद तक उतर जायेगा ।

एक पहर रात रहते ही कैलाश मवेशियों को हंकाल ले जाता । सबसे पहले नहर पार में चराता । धीरे-धीरे मउहारी से होकर दाऊ के चक की ओर बढ़ जाता । भैंसासुर के पास नाले पार सबेरा होता ।

शाम को वह मवेशियों के साथ वापस आ जाता ।

झुलु राऊत के साथ उसकी मितानी हो गयी । झुलु के लड़के उसे फूल-ददा कहते । धीरे-धीरे उसने इलाहाबादी उपनाम हटा दिया।

उसे लगने लगा जैसे वह पुस्तों से इस गाँव में बसा है । दाऊ और उसके बीच की दूरियाँ खतरे की सीमा के करीब पहुँचने लगीं ।

वचन न दिया होता तो वह कब से काम छोड़ चुका होता । दाऊजी अब गाँव भर में ऊट-पटाँग बातें कहते फिरते ।

कैलाश और झुलु के बीच वे सन्देह का जहर भी फैलाकर हार गये ।

जब सब ओर से निराश हो गये तो गुड़ी में ही बैठे-बैठे सार्वजनिक तौर पर कैलाश की चर्चा छेड़ते हुए कहते-परदेशिया बड़ा गद्दार होवे जी । जानत नइ रेहेंव । गाँव ला बिगाड़े बर शैतान ला लान परेंव । कैलाश गाँव के लिए दाऊ से ज्यादा विश्वसनीय हो गया । वह मवेशियों की बीमारी का अच्छा घरेलू इलाज जानता था इसलिए घर-घर में उसकी इज्जत होने लगी ।

एक दिन कैलाश मवेशियों को दाऊ के बाड़ा में पहुँचाकर घर भी नहीं पहुँचा था कि बुलावा आ गया ।

वह लपककर बाड़ा पहुँचा ।

एक बूढ़ी गाय कोठे में मरी पड़ी थी ।

बीस-पच्चीस लोग एकत्र थे ।

दाऊ ने चीखते हुए कैलाश से कहा- नानजात, हइतारा, अरे मारना था तो मुझे मारता । गौ माता को मार दिया । झगड़ा मुझसे हैं गद्दार । गाय ने क्या बिगाड़ा था ।

कैलाश हक्का-बक्का रह गया ।

पास जाकर देखना चाहता था मगर दाऊ के नौकरों ने उसे पकड़ लिया और लगभग धकियाते हुए गुड़ी की ओर ले चले ।

पंचायत में दाऊ ने सिद्ध कर दिया कि कैलाश की मार से गाय मरी है । गाय के शरीर पर इलाहाबादी लाठी के दस निशान दाऊ के नौकरों ने गिनकर बता दिया ।

कैलाश कुछ भी नहीं कह सका । वह उस दिन को कोसने लगा जिस दिन इलाहाबादी लाठी को कन्धे पर लादकर इस गाँव में दाऊ का लठैत होकर पहुँचा था ।

उसके मितान ने धीरज बँधाया ।

दाऊ चाहते थे कि कैलाश गाँव छोड़कर चला जाये ।

कैलाश ने हाथ जोड़कर गाँववालों से कहा – यहां की परंपरा के अनुसार मैं गले में रस्सी डालकर इक्कीस दिन तक भीख मागूँगा । बानबरत में लाठी के पाप से मुक्त होने के लिए स्नान करूँगा । भइया हो मगर इस जबरदस्ती के इल्जाम का खुलासा तभी होगा जब मैं इस गाँव में आखिरी साँस तक रहूँ ।

– अब यही मेरा गाँव है इक्कीस दिन बाद पवित्र होकर लौटूंगा । गाय के शरीर में झुट्टे ही दस निशान दाऊजी को दिख गये ।

– लौटकर ही लाठी पर हाथ धरूँगा । लाठी अपना रंग तब दिखायेगी ।

परदेशीराम वर्मा

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